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हिंसा का लाल रंग देख सकते हो, ‘पीरियड’ का लाल रंग क्यों नहीं?

पीरियड्स को लेकर तमाम टैबूज़ में एक टैबू यह भी है कि हम सैनिटरी नैपकिन्स के एक से विज्ञापन ही देखते हैं. भले ही ‘वो वाले दिन’ को अब विज्ञापनों में पीरियड्स कहा जाने लगा है, पर अब भी पीरियड ब्लड नीले रंग का ही होता है. ऐसे तमाम विज्ञापनों के बीच एक नया विज्ञापन इस वर्जना को तोड़ता है. ऐक्ट्रेस राधिका आप्टे के रिओ सैनिटरी नैपकिन्स के नए एड में पीरियड ब्लड नीला नहीं, रेड है और भारतीय विज्ञापनों के स्टीरियोटाइप से बाहर निकलता है. किसी को यह भदेस लग सकता है, पर सच तो सच है. जाहिर सी बात है, विज्ञापन का काम सिर्फ प्रोडक्ट को बेचना नहीं, ग्राहकों को जागरूक करना भी है. खासकर, मैन्स्ट्रुअल प्रॉडक्ट्स के एड्स, पीरियड्स से जुड़ी शर्म और झिझक को तोड़ने का काम भी करते हैं. दर्शकों को सूचनाएं देते हैं और सशक्त भी बनाते हैं. रिओ का यह विज्ञापन इस लिहाज से काफी अलग है कि वह उन अनुभवों के बारे में भी चर्चा करता है, जिनसे महिलाएं पीरियड्स के दौरान गुजरती हैं.

कभी विज्ञापनों में प्रॉडक्ट का जिक्र तक नहीं होता था

शायद कोई यकीन न करे, लेकिन सैनिटरी पैड्स के विज्ञापनों में कभी पीरियड्स का जिक्र तक नहीं होता था. 1926 में जॉनसन एंड जॉनसन के मॉडेस ब्रांड के प्रिंट एड में हाई फैशन मॉडल्स शानदार गाउन्स में सिर्फ खड़ी दिखती थीं और नीचे लिखा होता था, मॉडेस... बिकॉज. इनमें प्रॉडक्ट का कोई विवरण नहीं होता था. मानो एड देखने वाला खुद ही सब समझ लेगा. इसके बाद मॉडेस को भूरे रंग के कागज के डिब्बों में बेचा जाने लगा ताकि किसी को उसे खरीदने से शर्मिन्दगी न हो- ठीक वैसे ही जैसे हमारे यहां दुकानदार सैनिटरी नैपकिन्स को काली थैलियों में बांधकर देते हैं. चूंकि पीरियड्स हर जगह टैबू टॉपिक है. 1985 में कर्टनी कॉक्स जैसी ऐक्ट्रेस ने सबसे पहली बार एक टीवी कमर्शियल में पीरियड शब्द का इस्तेमाल किया. फिर 2010 में कोटेक्स ने ब्रेक द साइकिल नाम का एड कैंपेन चलाया जिसमें कहा गया कि टैम्पन्स को आप पारदर्शी हैंडबैग में भी कैरी कर सकती हैं.

इसके अलावा एड्स में मैन्स्ट्रुएशन को हाइजीन इश्यू से भी जोड़ा गया है- सारा ध्यान इस पर दिया गया है कि साफ-सफाई और दुर्गन्ध दूर करना जरूरी है, क्योंकि पीरियड्स गंदे और स्मेली होते हैं. इस तरह वेजाइनल डिओडेरेंट इंडस्ट्री अपना माल बेचती रही. यह बात और है कि शरीर के अंदरूनी हिस्सों की गंध कोई असामान्य बात नहीं, और न ही पीरियड्स गंदे होते हैं.

पर पीरियड ब्लड नीला ही रहा

विज्ञापनों में तमाम बदलाव आते रहे, पर पीरियड ब्लड का रंग वही रहा- नीला. कम से कम भारत में तो. हां, कई साल पहले एक विज्ञापन में यह बदलाव लाने की कोशिश की गई थी. यह मामला यूके का था. वहां की एक कंपनी बॉडीफॉर्म ने तीन साल पहले अपने कैंपेन ब्लड नॉर्मल में पीरियड ब्लड के रंग के लिक्विड को नैपकिन पर डालकर दिखाया था. इसके पीछे यही आइडिया था कि पीरियड्स को नॉर्मल दिखाया जाए और उससे जुड़े टैबूज को तोड़ा जाए. इसकी टैगलाइन थी- पीरियड्स सामान्य बात है तो उसे दिखाना भी सामान्य बात होनी चाहिए. इस एड में एक आदमी को दुकान से पैड्स खरीदते भी दिखाया गया था. हमारे यहां यह और बोल्ड बात है. बॉडीफॉर्म के एक और विज्ञापन में कंपनी ने अपने पहले के विज्ञापनों के लिए माफी मांगी थी कि कैसे उसने सैनिटरी पैड्स के सिर्फ भ्रामक विज्ञापन ही चलाए हैं. इसमें एक औरत नीले रंग का लिक्विड पीकर भी दिखाती है- जाहिर सी बात है, नीला रंग कोई पेय पदार्थ तो हो सकता है, पर पीरियड ब्लड बिल्कुल नहीं हो सकता.

किसी को नीले रंग की बजाय लाल रंग का इस्तेमाल घिनौना लग सकता है. रिओ के विज्ञापन पर लोगों ने शुरुआत में आपत्ति भी जताई थी. कुछ लोगों ने एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया में इसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी. लेकिन सिनेमा और अब वेबशोज़ ने तो छोटे-बड़े परदे को रक्त रंजित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है. जब परदे पर हिंसा में खून का तीखा लाल रंग दिखाने में गुरेज नहीं तो पीरिय़ड ब्लड को देखना इतना घृणास्पद कैसे हो सकता है- जाहिर सी बात है, इससे पीछे मानसिकता का ही हाथ है. ट्विस्ट यह भी है कि अगर किसी का पीरियड ब्लड सचमुच नीला हो तो उसे डॉक्टर को दिखा लेना चाहिए. क्योंकि यह खतरे का संकेत भी हो सकता है.

पीरियड्स की असल सच्चाई

पीरियड्स की असल सच्चाई यह है कि यह एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है. पर इसे ऐसे देखा नहीं जाता. लड़कियां अपनी सखियों से इसे फुसफुसाकर मांगती हैं. अल्मारियों में छिपाकर रखती हैं ताकि लड़के और मर्द न देख लें. वॉशरूम्स में भी स्मगलिंग के सामान की तरह छिपाकर ले जाया जाता है. इसीलिए मैन्स्ट्रुअल हेल्थ के बारे में कोई बात नहीं की जाती. स्वच्छ भारत अभियान में भी इसे शामिल नहीं किया गया है. लॉकडाउन की शुरुआत तो इसे अनिवार्य वस्तुओं की सूची में भी शामिल नहीं किया गया था. हां, यह एक अनिवार्य चीज है. पर मैन्स्ट्रुअल हाइजीन के सुरक्षित तरीके ज्यादातर औरतों को भारत में उपलब्ध नहीं है. एनएफएचएस के सर्वेक्षण 4 के अनुसार, भारत के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से सिर्फ सात में 15 से 24 साल की 90 प्रतिशत लड़कियां सुरक्षित और स्वस्थ साधनों का इस्तेमाल कर पाती हैं. चूंकि पीरियड्स को गंदा और शर्मनाक माना जाता है, इसीलिए ग्रामीण इलाकों की 23 प्रतिशत लड़कियां पीरियड्स की वजह से स्कूल जाना छोड़ देती हैं.

इस टैबू को खत्म करने का काम नीति निर्धारकों का भी

यूं यह जिम्मेदारी नीति निर्धारकों की भी है कि पीरियड्स से जुड़ी शर्म को खत्म किया जाए. इसी साल जून में न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न ने कहा था कि उसकी सरकार संसद में ऐसा बिल लाएगी जो पीरियड पावर्टी को खत्म करेगा. इसके बाद वहां लड़कियों को मुफ्त सैनिटरी पैड मिलेंगे. जेसिंडा ने यह भी कहा था कि मासिक धर्म में सैनिटरी पैड्स का इस्तेमाल कोई लग्जरी की बात नहीं- एक बहुत जरूरी चीज है. वहां भी बहुत सी लड़कियां पीरियड्स के दिनों में स्कूल जाने से कतराती हैं क्योंकि वे महंगे पैड्स या टैम्पन्स नहीं खरीद पातीं. पर यहां मामला सिर्फ उपलब्धता का नहीं, उससे जुड़े लांछन और वर्जनाओं का भी है. अगर राष्ट्रीय स्तर पर इस पर चर्चा होगी तो लोगों के नजरिये में भी बदलाव होंगे. शुक्र है, यह शुरुआत हुई है जहां औरतें ब्ल्यू नहीं, रेड ब्लीड करती हैं.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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