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'अरे ओ सांभा कितना इनाम रखे है सरकार हम पर?'

व्यवस्था पर विश्वास की तुलना में आम जनता के बीच लूटने वाले का डर भारी मालूम पड़ता है. इसीलिए गांव वाले गब्बर सिंह के कहर को अपनी किस्मत और नियति मान कर बैठे होते हैं.

भात..भात...भात.. एक निवाले के लिए तरसती आंत से पेट में मरोड़ होती है, आंत के दर्द को सहते-सहते आंखों से आंसू और होठों से सिसिकियां गायब हो जाती हैं, फिर नजर धीरे-धीरे मद्धिम पड़ने लगती है. मौत आहिस्ता-आहिस्ता उसके पास कदम बढ़ाती है. शरीर में ऐंठन होती है फिर एक छोटा सा झटका और आंखें उबल कर बाहर...! व्यवस्था के दोष की वजह से ऐसी ही मौत झारखंड़ की संतोषी जैसी हजारों बेटियां और बेटों को नसीब है. भूल गए होंगे...कानों में शीशे की तरह पिघलते इन शब्दों की मियाद कम होती हैं. इसलिए आपका भूल जाना जायज है.

'अरे ओ सांभा कितना इनाम रखे हैं सरकार हम पर?' फिल्म 'शोले' के लुटेरे गब्बर सिंह का यह डॉयलॉग तो आपको जरूर याद होगा. चलिए फिर इस डॉयलॉग की गाठों को खोला जाए. इसी के सहारे शायद आप आसानी से समझ लें जो कहने की कोशिश की जा रही है. याद करिए वह सीन.. कितना अहंकार है लुटेरे गब्बर सिंह को.. सोचिए किस बात का अहंकार है. अपने बाहुबल का या व्यवस्था के लिजलिजेपन का. व्यवस्था को ठेंगे पर रखने का दंभ उसके अट्टाहस में साफ झलकता है.

व्यवस्था पर विश्वास की तुलना में आम जनता के बीच लूटने वाले का डर भारी मालूम पड़ता है. इसीलिए गांव वाले गब्बर सिंह के कहर को अपनी किस्मत और नियति मान कर बैठे होते हैं. ये सवाल हमेशा मुंह बाए खड़ा है कि जब व्यवस्था के पास हर तरह के हथियार मौजूद हैं तो इन लुटेरों के सामने वे निष्क्रिय क्यों हो जाती है? क्या व्यवस्था सिर्फ आम आदमी की पीठ पर लाठी के गहरे निशान छोड़ने के लिए है? नौकरी मांगने वाले बेरोजगारों के गालों पर थपकी देने के बजाय थप्पड़ रसीद कर व्यवस्था अपने को दंडविधान का ज्ञाता समझती है. क्या सिस्टम की गोलियां जल, जंगल, जमीन के लिए लड़ने वाले अधनंगी चमड़ी को छेदने के लिए हैं?

लिखते वक्त.. यूपी के महोबा से लेकर देश के तमाम हिस्सों के किसानों का आंदोलन आंखों के सामने तैर रहा है. टमाटर, आलू.. सड़क पर फेंकते किसानों को आप अक्सर टीवी पर देखते होंगे. फिर किसी दिन बैलों के गले की रस्सी को फंदा बना कर अपनी गर्दन को घोंट चुका एक बूढ़ा भी आपको दिखता होगा. बर्बादियों की बंजर जमीन पर बिलखता हुआ वह किसान जब आंदोलन कर रहा होता है तब सिस्टम की चौकसी देखने लायक होती है. राज्य अपना पूरा तंत्र सड़क पर उतार देता है किसानों पर गोलियां और लाठियां रसीद की जाती हैं. लेकिन नीरव मोदी, विजय माल्या जैसे लोग टीवी पर अक्सर कमसिन काया की कमर में हाथ डाले इस सिस्टम पर गब्बर जैसी अहंकारी अट्टाहस करते दिख जाते हैं.

विजय माल्या हो या नीरव मोदी...इनकी घोटालेबाजी का 'शुक्रगुजार' होना चाहिए क्योंकि उसने बदबूदार व्यवस्था को उघाड़कर रख दिया. व्यवस्था ने अपनी कुर्सी बरकरार रखने के लिए आम जन को ऐसा बना दिया है कि जब इस तरह के घोटाले सामने आते हैं तो वे एक दूसरे का मुंह देखते हैं..खुसुर फुसुर करते हैं. लोग खुद को बेसहारा पाते हैं.

सियासत की मंडी के मंजे हुए व्यापारी हर तरह के कुतर्कों से 'तेरे कुर्ते से ज्यादा सफेद मेरा कुर्ता' का खेल खेलने में लग गये हैं. ये घोटाला तेरा वो घोटाला मेरा.. ये 'तेरा मेरा' का खेल असली कोढ़ है. इस तेरे मेरे के खेल में आम लोगों का कार्यकर्ता बन जाना इस कोढ़ में खाज की तरह हो जाता है. आंकड़ों की जुबानी बात करना कभी-कभी लूट की मानिंद लगता है जब कोट पैंट वाले अधिकारी रोज शासकों के मुताबिक मनमोहक रूप से इसे जबर्दस्ती हमारे कानों में ठूंस रहे होते हैं. ऐसे दौर में देश में बेरोजगारी, सुरक्षा, स्वास्थ्य जैसे विषयों पर सत्ता को घेरना मुझे अब थोड़ा भी नहीं सुहाता है. सच तो यही है कि सियासत में कुर्सी ही सर्वश्रेष्ठ है और जनता बेसहारा छोड़ दिए जाने के लिए 'अभिशप्त'.

दरअसल सिस्टम में सियासी दल भी सिर्फ मोहरा हैं. धन कुबेर को जब लगता है कि सफेद वाले को हटाकर अब काली वाली गोटी से शतरंज खेलना है तो वह शतरंज का रूख बदल देता है. सत्ता कभी भी आपकी मूल समस्या से आपको जोड़ती नहीं है. उससे आपको दूर रखती है. जैसे रोजगार, शिक्षा और सुरक्षा जैसे मूल मुद्दे कभी चुनावी खांचे में फिट नहीं बैठते. जनता को इन विषयों से विषयांतर करने के लिए गाय, गोबर, गो मूत्र, हिन्दू, मुसलमान, उत्तर, दक्षिण, जाति इत्यादि कई ऐसे निगेटिव मुद्दों से आपको जोड़ दिया जाता है. आप खुशी खुशी इससे जुड़कर अपने भूख और सुरक्षा की मांग को पीछे छोड़ देते हैं. फिर यह सिस्टम आसानी से अपना शोषण शुरु कर देता है. फिर कोई नीरव मोदी, विजय माल्या जैसा बड़ा गब्बर दूर देश में आपको लूटकर अट्टाहस करता है.. और आप माथा पीट लेते हैं.

वंचित वर्ग को भूखे बच्चों का मुरझाया चेहरा देखने लत लग गई है. वह पेट के भूगोल से बाहर कहां निकल पाता है. अरे उसकी बात क्या करूं.. खुद मैं भी सिर्फ सवाल पूछने के अलावा क्या कर सकता हूं. बस दर्द साझा करने के अलावा भ्रष्ट सिस्टम के भेंट चढ़ जाने वाले ऑक्सीजन से वंचित नौनिहालों के लाशों को बस रुआंसे गले से विदाई देने के अलावा क्या कर सकता हूं. हम सभी लाचार है.. यह सिस्टम सच में सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ा है और हमें निगल रहा है आहिस्ता आहिस्ता.. हालत तो ये है कि जितना ज्यादा लिखा जाए उतना कम है. घोटाला पहली बार नहीं हुआ है और ना ही ये आखिरी है. जनता तो बस इस इंतजार में है कि कोई और घोटाला सामने आए ताकि एक दूसरे का मुंह देख सकें. तब तक हमें क्या करना है ये हम सब जानते हैं, क्यों?

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(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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