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मुकुल की घरवापसी या बीजेपी पर चोट?

ऐसा लगता है कि ममता बनर्जी ने बंगाल को बीजेपी मुक्त करने की ठान ली है. यह अपने तरीके की आक्रामक राजनीति है, जिसे बीजेपी करती आई है. लेकिन बीजेपी नेता भी हैरान होंगे कि उन्हें ममता से जूझना पड़ रहा है. मुकुल रॉय की टीएमसी में वापसी हो गई है. ममता ने जब टीएमसी बनाई थी तो सबसे पहले मुकुल रॉय ही उनके साथ जुड़े थे. कहा तो यहां तक जाता है कि चुनाव आयोग में पार्टी का रजिस्ट्रेशन कराने भी मुकुल रॉय गए थे और वहां उन्होंने की हस्ताक्षर किए थे. 2019 में लोकसभा चुनाव के समय मुझे एक बंगाल के पत्रकार ने कहा था कि टीएमसी एक तरह से मुकुल रॉय के नाम पर रजिस्टर्ड पार्टी है, ममता के नाम पर नहीं. अगर मुकुल रॉय चाहें तो टीएमसी पर अपना हक जता सकते हैं. खैर, इस बात में कितनी सच्चाई है यह तो पता नहीं लेकिन मुकुल रॉय वापस आना चाहते थे और दीदी उन्हें वापस लेना चाहती थीं. आखिर पुराने साथी ठहरे. ममता जब दिल्ली छोड़ कर कोलकाता आईं थीं तो दिल्ली के दौरे के दौरान मुकुल रॉय के सरकारी निवास पर ही ठहरती थीं जो एक तरह से मुकुल रॉय ने दीदी के लिए ही रख छोड़ा था. ऐसे में मुकुल रॉय की वापसी के सियासी अर्थ भी निकाले जा रहे हैं.

मुकुल रॉय बीजेपी में खुश नहीं थे. ताजा गम तो यह था कि शुभेन्दु अधिकारी को विपक्ष का नेता बीजेपी ने बना दिया जो जुम्मा जुम्मा चार दिन पहले पार्टी में आए हैं और मुकुल रॉय को हाशिए पर छोड़ दिया. मुकुल रॉय तभी से नाराज चल रहे थे. इस बार विधानसभा चुनाव में वह खुद जीते, लेकिन बेटे को चुनाव नहीं जितवा पाए. ऐसे में हो सकता है कि मुकुल रॉय को लगा हो कि बेटे का भविष्य टीएमसी में ही सुधर सकता है. वैसे संकेत तो तभी से मिल गए थे जब ममता के कहने पर उनके भतीजे मुकुल रॉय की बीमार पत्नी का हालचाल पूछने अस्पताल गए थे. उस समय तक बीजेपी के एक भी नेता ने सुध नहीं ली थी. उसके बाद खुद प्रधानमंत्री मोदी ने मुकुल रॉय को फोन किया, बीजेपी नेताओं का अस्पताल में तांता लगा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. मुकुल रॉय को वापस पार्टी में लेना ममता के लिए कतई जरूरी नहीं था, लेकिन वह इस बहाने बीजेपी को चोट पहुंचाना चाहती हैं. इसके साथ ही बीजेपी को संकेत दे दिया है कि ममता के घर पर पत्थर उछालने से पहले बीजेपी को चाहिए कि वह अपना घर संभाले. कहा तो यहां तक जा रहा है कि बीजेपी के दो दर्जन से ज्यादा विधायक और लगभग इतने ही अन्य नेता घर वापसी चाहते हैं. आपको ध्यान होगा कि विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ममता को छोड़ कर गईं एक महिला नेता ने हाल ही में रोते हुए ममता से गुहार लगाई थी.

बड़ा सवाल उठ रहा है कि आखिर ममता बगावत करने वाले नेताओं को वापस क्यों ले रही हैं या मुकुल रॉय की वापसी के बाद ऐसे संकेत क्यों दे रही हैं. सीधी सी बात है कि ममता समझ रही हैं कि बीजेपी से पीछा छुड़ाना है तो बीजेपी को बंगाल में जड़ से खत्म करना जरूरी है. कुछ ऐसा करना है कि बीजेपी का तंबू उखड़ जाए, कैडर छिन्न भिन्न हो जाए और कार्यकर्ता सड़क पर उतरने की हिम्मत नहीं करें. इस वजह से हो सकता है कि आने वाले दिनों में बंगाल में घर वापसी का सिलसिला तेज हो. आखिर ऐसे नेताओं को ममता को कुछ देना नहीं है. न मंत्री बनाना है और न ही निगम बोर्ड का अध्यक्ष. कोने में पड़े रहेंगे. लेकिन ममता बीजेपी को कमजोर करना चाहती हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भी ममता यह काम कर सकती हैं. हो सकता है कि योजना यह बन रही हो कि बीजेपी की हालत इतनी पतली कर दी जाए कि पिछली बार की तरह 18 सीटें जीतना उसके लिए सपना बन कर रह जाए. बीजेपी के पास अच्छे उम्मीदवारों का संकट पैदा हो जाए और ममता 42 में से 40 लोकसभा सीटें जीतकर राष्ट्रीय स्तर पर दम खम दिखा सकें. आज की तारीख में देखा जाए तो कांग्रेस के बाद ममता और स्टालिन ही ऐसे नेता दिखते हैं, जो लोकसभा में तीस से ज्यादा सीटें निकालने की क्षमता रखते हैं. अगर 2024 में बीजेपी का गणित बिगड़ता है तो चालीस सीटें बहुत काम आ सकती हैं.

लेकिन बीजेपी एक दम से सरेंडर कर देगी ऐसा नहीं कहा जा सकता. बीजेपी को प्रदेश ईकाई को सक्रिय करना होगा. राष्ट्रीय नेताओं के उसी अंदाज में दौरे करवाने होंगे जैसे कि विधानसभा चुनाव के समय हुए थे. एक बात तो तय है कि ममता और मोदी के बीच अब तलवारें खिंच गई हैं. ममता की मदद केन्द्र नहीं करने वाला यह जानकार कह रहे हैं. लेकिन अगर केन्द्र ममता सरकार के काम में रोड़े डालता रहेगा तो उससे भी बीजेपी के खिलाफ माहौल बंगाल में बनेगा. इसलिए हो सकता है कि लोकसभा चुनाव तक तो बीजेपी को सतुंलन बनाकर चलना ही होगा. खैर, बंगाल की राजनीति दिलचस्प हो गई है.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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