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BLOG: दिवाली पर शुभकामनाओं की थाली में दफन है भूखे पेट की चीख

मुंहबाए खड़े सरकारी विज्ञापन और 200 के खरीद पर 10 परसेंट कैश बैक देने वाले पोस्टर से नजर हटाकर एक औरत की गोद में लाश देखना शायद हमारे आंखों को पसंद ना आए. शहर में उड़ती धूल और आंखों पर लगे महंगे चश्में हमारी आंखों को इस बात की इजाजत नहीं देते हैं.

दूधिया क़ुमक़ुमों की महताबी रोशनी से नहाए हुए शहरों को, चमकती दमकती फ़िज़ाओं को, गुमसुम खड़ी खिड़की से झांकती ऊंची-ऊंची इमारतों को, चौड़ी सड़कों पर चिल्लाती गाड़ियों के बीच हांफती जिन्दगी को, अट्टालिका में अट्टहास करने वाले अफसरों को, सेवक बनने का झांसा देकर रेशमी कालीन पर चहलकदमी करने वाले नये शासकों को, चकचक सफेद कुर्ते पाजामे पहने नई चकाचौंध को, रेशमी साड़ी में लिपटी महिलाओं को, 'भात' और मीठे पकवान से कैलोरी बढ़ने की चिंता करने वालों को---- शुभ दीपावली......

'भात' की सुगंध से वंचित उस वंचित वर्ग की बेटी के लिए, पूर्वांचल में हर साल सैकड़ों की तादात में बूझते चिराग को क्या कहा जाए, तारीख में दर्ज हो चुके अपने गांव के उस बच्चे की मां को क्या कहा जाए जिसके बच्चे के मासूम गर्दन सरकारी 'मेहरबानियों' ने मरोड़ दिया, उन महिलाओं को क्या कहा जाए जिनकी आंचल को हटाकर 'गिद्ध' नोच देते हैं. उस परिवार को क्या शुभकामनाएं दिया जाए जिनका बच्चा हंसता हुआ ट्रेन पकड़ा और लिपटे हुए तिरंगे में वापस आया. उस पिता को क्या कहा जाए जो बेटे को कंधा दिया.. सोचिए उस मां को क्या शुभकामनाएं दी जाए, अपने बेटे के मुरझाए और गोलियों से छलनी शरीर को देखकर जिसकी सूखी छाती में दूध उतर आया.. बेटी की डोली नहीं उठने की वजह से जिन किसानों ने गले में रस्सी डाली, शरीर झटका खाया और आंखें बाहर आ गईं, उन चौंड़ी आंखों में झांक कर देखिए.. फिर शुभकामनाएं देने की सोचने भरने से गला रेत की तरह सूख जाता है और शब्द बंजर पड़ जाते हैं.

खबरों की दुनिया में रहने का आलम यह है कि आप समाज का विभत्स रूप देखते हैं. आपके सामने भ्रष्ट व्यवस्था रोज संवेदनाओं का बलात्कार करती है. दिल तड़पता है..फड़फड़ाता है..सिर्फ कलम चलाने के अलावे कुछ ना कर पाने का दंश झेलता है. आंकड़ों की जुबानी बात करना कभी-कभी लूट की मानिंद लगता है जब कोट पैंट वाले अधिकारी रोज शासकों के मुताबिक मनमोहक रूप से इसे जबर्दस्ती हमारे कानों में ठूंस रहे होते हैं...आज दीपावली संदेश में चहकते चेहरों को देखकर हृदय में उमंग नहीं है. हर बार की तरह भूख से जंग हार गई जिंदगी की विदाई की एक और खबर आंखों को तर कर गई.

‘भात भात’..चार दिनों से भूख से तड़प रही 11 साल की संतोषी ने जब अपने जीवन की अंतिम सांस ली तो ये शब्द उसकी जुबां पर थे. दरअसल भात झारखंड में उबले हुए चावलों को कहते हैं. संतोषी की मां कोयली देवी बताती हैं कि आधार से राशन कार्ड लिंक न होने के कारण उन्हें राशन नहीं मिला और उनकी बेटी भूख से मर गई. कोयली देवी की कमाई हफ्ते में 80 रूपए की है जो वो दातून बेच कर कमाती हैं. कोयली देवी बताती हैं, “मैं जब वहां चावल लेने गई तो मुझे बताया गया कि राशन नहीं दिया जाएगा.” वो आगे कहती है, ”मेरी बेटी ‘भात-भात’ कहते कहते मर गई.”

बस यह खबर जरा ठहर कर सोचने के लायक है. इस चमकते न्यू इंडिया में.. जो पकवान की थाली डाइनिंग टेबल तक पहुंचाती है उसकी बेटी की आंत एक निवाले के लिए तरस गये. पेट पीठ में सट गया होगा, पेट में भूख से मरोड़ हुई होगी, आंत में कितना दर्द हुआ होगा... आंखें धीरे-धीरे मद्धिम पड़ी होगी.. मौत आहिस्ता-आहिस्ता उसके पास कदम बढ़ा रही होगी.. शरीर में ऐंठन हुआ होगा.. फिर एक छोटा सा झटका और आंखें उबल कर बाहर.. यह मौत सिर्फ उस बच्ची की नहीं हुई. इस मौत के साथ ही माएं इंसानियत की वो कहानियां अपने बच्चों को सुनाना बंद कर देंगी जिसमें एक आदमी दूसरे आदमी की मदद करता है.

मैं आखिर में खुद को जोड़ता हूं. बताना मुनासिब समझुंगा कि मैं उसी पूर्वांचल से हूं.. बचपन से देख रहा हूं..जहां हर साल हजारों मां अपने लाल को सरकारी अस्पतालों के बिस्तर से लाशों के रूप में उठाती हैं. मुझे निर्लज्ज शासकों से कुछ उम्मीद नहीं है जो भ्रष्ट व्यवस्था को निर्दोष साबित करने के लिए आंकड़ों की जुगाली करते हैं. दशकों से आंचलों को कफन बनते देख रहा हूं. यह सब सरकारी मेहरबानियों का नतीजा है. यह गरीब बेसहारे बेचारे हर उस पार्टी का झंडा उठा लेते हैं जो इन्हें रोटी और दवाई की उम्मीद दिखाते हैं. लेकिन चुनाव बाद ठगे जाते रहने के लिए मजबूर हैं. ऐसे दर्दनाक मौकों पर मुझे अक्सर मशहूर कवि अशोक धन्वा याद आते हैं. वह अपनी कविता में कहते हैं.... आदमीयत को जीवित रखने के लिए अगर एक दरोग़ा को गोली दागने का अधिकार है तो मुझे क्यों नहीं ?

बेरोजगारी से त्रस्त युवा, हालातों से पस्त मजदूर, एंबुलेंस तक से महरूम अपने कंधे पर बेटे की लाश ढ़ोने को मजबूर पिता, भूख से मरी बेटियों की मां, दवाई की कमी से काल की गाल में समाने वाले बच्चे की मां, सवाल नहीं कर पाती है. क्योंकि उसके आंखों में आंसू तो हैं लेकिन उसके पास शब्द नहीं है. शब्द हैं तो व्यवस्था से लात खाते खाते वह आजाद देश का नागरिक है. यह भूल चुका है. अंदर के इस रिसते घाव पर मरहम लगाने की फरियाद किससे करे, उसे यह तक पता नहीं. जीवन की यह परीक्षा जितनी बड़ी है उतना ही बड़ा है उसे जीने का भय.

मुंहबाए खड़े सरकारी विज्ञापन और 200 के खरीद पर 10 परसेंट कैश बैक देने वाले पोस्टर से नजर हटाकर एक औरत की गोद में लाश देखना शायद हमारे आंखों को पसंद ना आए. शहर में उड़ती धूल और आंखों पर लगे महंगे चश्में हमारी आंखों को इस बात की इजाजत नहीं देते हैं. अखबार में आने वाली 'भूख से मौत' की खबर चाय के ठंडे होने के साथ ही बासी हो जाती है और हम क्रेडिट कार्ड के अगले किश्त का मैसेज देखते हुए अपना सर खुजाते हैं. लेकिन यह भी सच है कि हम कितना भी भाग लें, ये समाज अपने इस चेहरे के साथ हमारे दरवाजे पर आकर खड़ा हो जाएगा. जिसकी गोद में एक लाश होगी.

शहरों में चीखों की आवाजें दीवारों से टकराती हैं लेकिन गांवों में, छोटे कस्बों में दुसरों की सिसकियां भी सुनी जाती हैं. यही तो मेरा बचपन से अब तक अनुभव था. अब सच में समाज बदल रहा है. सिसकियों पर जहां भीड़ इकट्ठी हो जाती थी वहां अब देखिए श्मशान तक शव को कंधा देने वाला कोई नहीं है. भूखी बच्ची को एक निवाला देने वाला कोई बगलगीर नहीं है.

हल चलाने वाले, उस अनाज को मंडी से उठाकर थाली तक पहुंचाने वाले पहचान के मोहताज 'भारत भाग्य विधाता' शुभकामनाओं से महरूम है. उसके रूखे हुए हाथों में अगर कुछ है तो वो है वोट देने का अधिकार, जिसे वो खर्च करता है या नहीं उसे मालूम नहीं...!

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(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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