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नीतीश कुमार का ये अभियान क्या बिहार को नशामुक्त बना पायेगा?

Bihar Social Reform Yatra: जब हमारे देश में बादशाहों की हुकूमत हुआ करती थी, तब उस जमाने के शायरों-कवियों ने लिखा था कि कुर्सी पर बैठने वाले को जब अचानक समाज को सुधारने की याद आने लगे, तो समझिए कि उसकी हुकूमत में कहीं कुछ गड़बड़ है, लिहाजा फिर वही बादशाह उसी अवाम के बीच जाने को भी अपनी तौहीन नहीं समझता, जिसे वो अपने पैरों की धूल समझता है.

लेकिन एक सच ये भी है कि भारत को आजादी मिलने से पहले देश में कई तरह के सामाजिक आंदोलन हुए हैं. उन्हें देखने के बाद ही फ्रांसीसी समाजशास्त्री एलां तूरेन ने 'द रिटर्न ऑफ द एक्टर' नाम से एक किताब लिखी थी जिसमें उन्होंने रैडिकल रवैया अख्तियार करते हुए अपील की थी कि समाजशास्त्रियों को सामाजिक आंदोलनों की केवल व्याख्या तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि उनमें भागीदारी करते हुए उनकी गहरी पड़ताल भी करनी चाहिये. 

हम नहीं जानते कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने फ्रांस के समाजशात्री एलां तूरेन की किताब को पढ़कर ही ये प्रेरणा ली है या नहीं लेकिन उन्होंने कल यानी बुधवार से राज्य में समाज सुधार अभियान की यात्रा शुरू करने का ऐलान कर दिया है. नीतीश की इस यात्रा की नीयत और नजरिये पर शक करने की कोई खास वजह नहीं होनी चाहिए लेकिन वे एक ऐसे प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, जहां विधानसभा के चुनाव अभी बहुत दूर हैं, लिहाजा विपक्ष को ये सवाल पूछने का इतना हक तो बनता ही है कि आखिर ये तमाशा किस लिए हो रहा है. सवाल ये भी उठ रहा है कि इस यात्रा के बहाने नीतीश आखिर अपनी सियासी इमेज पर लगे किस दाग को धोना चाहते हैं?

वैसे भी लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व जनता से जुड़े मुद्दों को लेकर सरकार से सवाल पूछना और उसका जवाब लेना होता है. हालांकि इतिहास गवाह है कि सरकार किसी भी पार्टी की हो, वह अक्सर इसमें फेल होने में ही अपनी बेहतरी समझती आईं हैं क्योंकि सच और सियासत का आपस में मेल न कभी हुआ और शायद हो भी नहीं सकता. अपनी इस यात्रा को लेकर विपक्षी दलों की आलोचना और उसके हमलों का जवाब देने के लिए नीतीश कुमार सोमवार को जब मीडिया से मुखातिब हुए तो उन्होंने सबसे पहली और बड़ी बात ये कही, "समाज सुधार अभियान चलाकर हम लोग नशा मुक्ति चाहते हैं." उन्होंने और भी कुरीतियों के खिलाफ लोगों में जागरुकता लाने की बात कही है. लेकिन आज बिहार में शराबबंदी एक बड़ा मुद्दा है, जिसके नफ़े से ज्यादा नुकसान देखने को मिल रहे हैं.

अगर सच कहा जाए तो नीतीश ने बिहार को नशा मुक्त करने का जो बीड़ा उठाया है, वो हकीकत में कितना असरदार हो रहा है, उसे नापने का पैमाना शायद उनकी सरकार के पास भी नहीं है. गुजरात के बाद बिहार ही देश का दूसरा ऐसा राज्य है, जहां पूरी तरह से शराबबंदी लागू है. बिहार की सियासी नब्ज समझने वाले जानकार मानते हैं कि ये कानून बन जाने के तुरंत बाद के शुरुआती कुछेक महीने में जरूर सख्ती दिखाई दी थी लेकिन अब ये पूरे सरकारी अमले के लिए कमाई का सबसे मोटा जरिया बन गया है, चाहे वो एक्साइज विभाग हो या फिर पुलिस. उनका तो ये भी दावा है कि गुजरात में शायद ही तस्करी के जरिये इतनी शराब आती हो, जितनी अब रोजाना बिहार में आ रही है.

पीने का शौक रखने वालों के लिए कोई कमी नहीं है, फर्क सिर्फ इतना है कि उन्हें अब पहले के मुकाबले दोगुनी या ढाई गुनी कीमत अदा करनी पड़ती है लेकिन शराब के हर चर्चित ब्रांड यहां उपलब्ध हैं. इससे जाहिर होता है कि गुजरात की तर्ज पर नीतीश सरकार ने शराबबंदी का क्रांतिकारी फैसला लेकर इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने की कोशिश तो कर ली लेकिन सरकार को सालाना मिलने वाले करोड़ों रुपयों के राजस्व से अपने हाथ धोकर तस्करों की पौ बारह कर दी. शायद इसीलिये देश-दुनिया के तमाम विचारकों ने इस तथ्य को दोहराया है कि समाज को सुधारने के लिए जब आप किसी खास चीज का निषेध कानूनी रूप से लोगों पर थोपते हैं, तो उसे पाने की लालसा और भी ज्यादा बढ़ जाती है और समाज से वो बुराई खत्म होने की बजाय तेज रफ्तार से आगे की तरफ जाने लगती है.

ऐसा नहीं है कि इन विचारों के जरिये हम समाज में नशे की कुरीति को बढ़ावा देने के पक्षधर हैं लेकिन जब किसी प्रदेश की सरकार इतना अभूतपूर्व फैसला लेने की हिम्मत जुटाती है, तो पहले वे इसके हर पहलू के बारे में सोचती है कि सरकार को होने वाले आर्थिक नुकसान के अलावा समाज में इसका कितना व्यापक असर हो सकता है. ऐसा तो हो नहीं सकता कि ये फैसला लेने से पहले नीतीश सरकार इतनी अनजान रही हो कि इसके बाद पड़ोसी राज्यों से शराब की कितनी तस्करी होगी और खुद अपने ही राज्य में अवैध रूप से मिलावटी शराब बेचने और उसे खरीदने की किस कदर मांग बढ़ जाएगी.

तस्करों पर लगाम कसने के सरकारी दावे चाहे जितने किये जाते रहें हो लेकिन गुरबानी के एक अध्याय में जिक्र आता है कि "माया (यानी धन) मोहिनी है और अगर इसके मोहपाश में आने से जो बच गया, तो समझ लीजिये कि उस इंसान को संत होने का दर्जा अपने आप ही मिल गया." क्या आप यकीन कर सकते हैं कि बिहार की पुलिस या वहां का एक्साइज विभाग कभी ये दर्जा हासिल करना चाहेगा? लिहाजा, बड़ा सवाल ये है कि नीतीश के इस समाज सुधार अभियान से क्या बिहार नशामुक्त हो जाएगा?

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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