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ओम पुरी को जितना मैंने जाना ‘एक कलाकार के लिए कहानी और किरदार ही सबकुछ’

समानांतर सिनेमा आज बचा नहीं लेकिन यहां से निकला जो एक किरदार लंबे समय तक सिल्वर स्क्रीन पर राज करता रहा वो बेशक ज़िंदादिल लेकिन बेहद सहज ओम पुरी ही था. इस संवेदनशील कलाकार को आपने हाल में ही फूट फूट कर रोते देखा होगा. सीमा पर मारे जाने वाले जवानों पर की गई अपनी ही एक टिप्पणी से ओम इतने आहत हुए कि इसके बाद वो बार बार सफाई देने को मजबूर हो गए. पहले भी उनके बयानों को लेकर विवाद हुए लेकिन वो बयान देश की सियासत से जुड़े उनके विचार थे, चाहे कांग्रेस के बारे में, चाहे मोदी के बारे में या फिर आमिर खान के बारे में.

बिहार और पश्चिम बंगाल के भूमि संघर्ष और पुलिस उत्पीड़न के साथ साथ सियासत और अपराध के गठजोड़ पर जो फिल्में उस दौर में बनीं, उसके लिए लोगों को सबसे बेहतर किरदार ओम ही लगते थे. अपनी आवाज़ की बदौलत, अपनी संवाद अदायगी की वजह से, आंखों और चेहरे की अपनी सख्ती की वजह से. लेकिन ओम पुरी निजी ज़िंदगी में कितने सहज थे, इसका अंदाज़ा उनसे मिलने के बाद पता चलता था.

कुछ साल पहले इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एक कार्यक्रम के दौरान जब समानांतर और व्यावसायिक हिन्दी सिनेमा पर एक सेमिनार में हिस्सा लेने वो आए तो मंच पर आते ही उन्होंने वहां बैठे तमाम कथित बुद्धिजीवियों पर चुटकी ली. कहने लगे कि सिनेमा तो सिनेमा है, इसे कला सिनेमा, समानांतर सिनेमा या व्यावसायिक सिनेमा तो बुद्धिजीवी लोग बना देते हैं. हम कलाकारों के लिए किरदार और कहानी अहम है. हम अपना काम करते हैं लेकिन आप उसे खांचे में बांट देते हैं.

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में अक्सर ओम पुरी आते रहते थे. इसलिए कि यहां से उनका गहरा नाता रहा और हर साल होने वाले यहां के बड़े नाट्य समारोहों में ओम भले ही कुछ देर के लिए सही, आते ज़रूर थे. इसी दौरान उनके साथ एक बार एनएसडी की घास पर बैठ कर बातें हुईं और लेकिन चंद ही पल में लोगों ने ऐसा घेरा कि वो कहने लगे, अरे भई, बड़े बड़े कलाकार हैं, मैं तो कुछ भी नहीं. बस नाटकों में अपनी गहरी दिलचस्पी शुरू से रही है, इसलिए आज भी भागा चला आता हूं.

एक बार एक चैनल के लिए रंगमंच से जुड़ा एक कार्यक्रम बनाने के दौरान ओम पुरी से कई बार फोन पर बात हुई. खासियत ये कि अगर आप उन्हें फोन करें तो कॉल बैक वो ज़रूर करते. कभी खुद को बड़ा नहीं माना. कार्यक्रम के सिलसिले में जानकर उत्साहित हुए और कहने लगे, कहां आजकल टीवी वाले रंगमंच और थिएटर पर कार्यक्रम बनाते हैं, इसमें मसाला तो होता नहीं... फिर एक ज़ोरदार ठहाका लगाया फिर कहने लगे... आपका चैनल तो बहुत पैसे वालों का है, कुछ हमें भी मिलेगा क्या, फिर ठहाका लगाया और कहा, यार मैं मज़ाक कर रहा था... दिल्ली आ रहा हूं तब आराम से बात करते हैं, मेरे पास बहुत कुछ है कहने को थिएटर के बारे में. बहरहाल वो मौका नहीं आया.

एक और वाकया है ओम पुरी के साथ का. दिल्ली के सिरी फोर्ट में कुछ साल पहले फिल्म फेस्टिवल था और ओम वहां सिनेमा के तमाम पहलुओं पर बोलने के लिए बुलाए गए थे. तमाम सेशन हुए लेकिन ओम ने आते ही कहा कि सिनेमा क्या अवार्ड जीतने या फेस्टिवल में दिखाए जाने के लिए बनाया जाना चाहिए या फिर इसमें कोई मास अपील होनी चाहिए. उनका कहना था कि जो लोग कला या समानांतर सिनेमा के दायरे से बाहर नहीं निकलेंगे वो सिनेमा के शिल्प और आम लोगों की मांग के साथ न्याय नहीं करेंगे. जाहिर सी बात है कि सिनेमा को लेकर ओम का नज़रिया बेहद सुलझा हुआ था और उन्होंने जो भी किरदार निभाया, उसमें जान फूंक दी.

उनकी निजी ज़िंदगी, जीवन शैली या शराब पीने की आदत पर बहुत से लोग अक्सर टिप्पणियां करते हैं, लेकिन काम के वक्त ओम पुरी हमेशा एक कलाकार होते थे और खाली वक्त में दोस्तों के साथ देश की राजनीति से लेकर सामाजिक व्यवस्था के अलग अलग पहलुओं पर बेबाक और दिलचस्प चर्चाएं भी करते थे. बल्कि उनके दिमाग की ये उलझनें ही कई बार उनके बयानों को कुछ ऐसी तल्खी दे देती थीं कि वो विवादों में घिर जाते थे और उन्हें फिर फूट फूट कर रोना भी पड़ता था. सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पिछले अक्टूबर में उनके बयान और उसके बाद उनके खिलाफ हुई मोर्चेबंदी की उस घटना के बाद से ओम पुरी इतने आहत थे कि उन्होंने उसके बाद फिर किसी मुद्दे पर बोलना लगभग बंद ही कर दिया था. शायद सार्वजनिक जीवन में उनका ये जो अपमान था, उसे वो बर्दाश्त नहीं कर पाए. बहरहाल इस महान कलाकार की 200 से ज्यादा फिल्में लोगों के बीच हमेशा रहेंगी और उनके तमाम किरदार भी उनकी याद दिलाते रहेंगे.

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