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'EC फैसले से कमजोर नहीं पड़े उद्धव, मिलेगी जनता की सहानुभूति लहर, खत्म होगी शिंदे की राजनीति'

उद्धव ठाकरे के हाथ से भले ही शिवसेना का चुनाव चिन्ह और पार्टी का नाम छिन गया हो, लेकिन ये समझना जरूरी है कि इसका महाराष्ट्र की राजनीति और उद्धव के सियासी भविष्य पर क्या असर होगा. मुझे लगता है कि जो कुछ भी है वो उद्धव के पास ही है. उद्धव के पास संगठन है, कार्यकर्ता हैं, शाखाएं हैं और जो हार्ड कोर वोटर है, वो ठाकरे परिवार के साथ ही है, क्योंकि ठाकरे परिवार एक ब्रांड है. ठाकरे परिवार के साथ शिवसेना का नाम जुड़ा है.

जो भी शिवसेना परिवार छोड़कर गए, चाहे वो छगन भुजबल हों, नारायण राणे हों या फिर राज ठाकरे, किसी को भी वो राजनीतिक ऊंचाइयां नहीं मिली. आपके पास राजनीतिक रूप से बहुमत है, लेकिन जब जनता की अदालत में आप जाओगे तो क्या होगा?

शिवसेना परिवार से अलग होकर नहीं मिली ऊंचाइयां

अंधेरी ईस्ट विधानसभा में जो उप-चुनाव हुए, अगर एकनाथ शिंदे अपने आप को ऑरिजनल शिवसेना मानते तो जरूर चुनाव लड़ते. क्योंकि शिवसेना के विधायक के निधन के कारण ये सीट  खाली हो गई थी. लेकिन एकनाथ शिंदे के पास न उम्मीदवार था, न संगठन था और न मतदाता. यही वजह है कि उन्होंने वो सीट बीजेपी को सरेंडर कर दी. लेकिन, बीजेपी को ये पता लगा कि इतनी बड़ी सहानुभूति शिवसेना के साथ है तो वो भी बैकआउट कर गई.

बार-बार लोग हिन्दुत्व की बात करते हैं. हिन्दुत्व की बात करने के लिए आपको शिवसेना की स्थापना और उसके इतिहास में झांकना पड़ेगा. मराठियों के खिलाफ जो साउथ इंडियन और नॉर्थ इंडियन का जो एक हुजूम चला था, मुंबई में उसके खिलाफ आवाज उठाते हुए बाल ठाकरे ने मराठी अस्मिता को लेकर शिवसेना की स्थापना की थी.

मुस्लिम लीग के साथ बाल ठाकरे ने लड़ा था चुनाव 

बाल ठाकरे ने मुस्लिम लीग के साथ म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन का चुनाव लड़ा था क्योंकि बालासाहेब सिर्फ मुंबई और ठाणे का कॉर्पोरेशन चुनाव लड़ते थे. विधानसभा में ज्यादा इच्छुक नहीं थे, वो तो बीजेपी से हाथ मिलाने के बाद उन्होंने विधानसभा चुनाव में ज्यादा दिलचस्पी लेना शुरू किया. नहीं तो वे कभी मुंबई और ठाणे से बाहर जाना उचित नहीं समझते थे. बाल ठाकरे ने मुस्लिम लीग के साथ चुनाव लड़ा, इमरजेंसी में कांग्रेस का समर्थन किया. उन्होंने जॉर्ज फर्नांडिस के साथ जो समाजवादी का बड़ा ग्रुप था, उसके साथ मिलकर चुनाव लड़ा. 

उनके सामने कांग्रेस जो एक बड़ा पक्ष था, जिसको हराने के लिए वे अलग-अलग समय पर राजनीतिक गठबंधन करते रहे. लेकिन, उनका हिन्दुत्व मुस्लिम लीग के साथ जाने के बावजूद भी कमजोर नहीं हुआ. तो अगर उद्धव ने अगर अपने पिता को ही फॉलो किया तो फिर उनका हिन्दुत्व कमजोर कैसे हुआ? 

दूसरी बात शरद पवार और कांग्रेस के साथ जाने से हिन्दुत्व कमजोर होता है तो भारतीय जनता पार्टी ने 80 घंटे की सरकार तो अजीत पवार के साथ भी बनाई थी. वहां तो उनका हिन्दुत्व  कमजोर नहीं हुआ था. महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता पर राजनीति होती है न कि हिन्दुत्व पर. तो मराठी अस्मिता पर 2 बड़े प्रोजेक्ट्स महाराष्ट्र से गुजरात निकल गए हैं. कहीं न कहीं इससे राज्य के लोगों में गलत मैसेज गया है.

गुजरात-महाराष्ट्र के बीच लड़ाई पुरानी 

मुंबई महाराष्ट्र में रहे या मुंबई गुजरात में जाए इसके लिए भयानक संघर्ष हुआ. 107 लोग शहीद हुए. तब जाकर मुंबई महाराष्ट्र के हिस्से में आया. महाराष्ट्र और गुजरात के बीच बहुत पुरानी अदावत है. बीजेपी का केन्द्रीय नेतृत्व गुजरात से आता है. महाराष्ट्र के लोगों के मन में ये फीलिंग है कि इसलिए हमारे प्रोजेक्ट्स गुजरात जा रहे हैं. हमारे मुंबई के कई ऑफिस गुजरात शिफ्ट हो रहे हैं. इसलिए वहां पर लोग आंदोलित हैं.

जो एकनाथ शिंदे हिन्दुत्व के नाम पर अलग हो गए वो इसी सरकार में ढाई साल तक सत्ता भोग रहे थे. उस वक्त उनका हिन्दुत्व कहां गया था? जब शिंदे महाविकास अघाड़ी सरकार में थे, उस वक्त तो उन्होंने ये एक बार भी नहीं कहा कि ये हिन्दुत्व की लड़ाई है और वे सरकार में नहीं आना चाहते हैं. हम सरकार नहीं बनाना चाहते. तो एकनाथ शिंद मुख्यमंत्री पद के लिए गए हैं. हिन्दुत्व की लड़ाई ये सब बोलने की बात है. महाराष्ट्र में हिन्दुत्व के नाम पर वोट पड़ रहे होते तो अभी विधान परिषद के चुनाव हुए और उसमें बीजेपी और एकनाथ शिंदे गुट का सूपड़ा साफ हुआ है.

अभी उप-चुनाव हुआ, जिसमे वॉकओवर कर दिया, अभी दो उपचुनाव पुणे में हैं, इसके क्या नतीजे आते हैं ये बताएँगे कि असली शिवेसना कौन है. चुनाव चिन्ह तो जाते रहते हैं. कांग्रेस के चुनाव चिन्ह तो दो-दो बार गए. कांग्रेस का चुनाव चिन्ह बैल की जोड़ी थी वो चला गया, गाय-बछड़ा था वो चला गया. चुनाव आयोग ने संगठन नहीं देखा, उसने विधानसभा सदस्य कितने हैं और उनको मिला हुआ मत प्रतिशत कितने हैं, ये देखा है और इस पर ही चुनाव आयोग ने ये फैसला किया है. 

बढ़ गई उद्धव के प्रति सहानुभूति

ताजा घटनाक्रम और चुनाव आयोग के फैसले के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में ये हुआ कि उद्धव के प्रति सहानुभूति और बढ़ गई है. महाराष्ट्र की राजनीति में देख रहा हूं कि ऐसे जगहों और जिलों में जहां पर शिवसेना का कोई अस्तित्व नहीं था, उन जिलों में भी लोगों के पास उद्धव ठाकरे को लेकर सहानुभूति है. तो ऐसा लगता है कि वहां तक उद्धव की पहुंच हो रही है. ऐसे में जितना उद्धव को हाशिए पर धकेलेंगे उतना उद्धव और ऊपर उठते जाएँगे. जब-जब उद्धव पर हमला होगा, उनका कैडर और इकट्ठा होता जाएगा.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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