EV से बचेंगी 17 लाख जानें, रिपोर्ट में बड़ा दावा
ICCT Report EV Adoption: आईसीसीटी की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अगर भारत 2045 तक शत-प्रतिशत EV को अपना लेता है. तो 2050 तक वाहन प्रदूषण से होने वाली 17 लाख अकाल मौतों को रोका जा सकता है.

ICCT Report EV Adoption: हमारे देश में पेट्रोल-डीजल गाड़ियों की तादात सालों से बढ़ती ही जा रही है. जिसके चलते गाड़ियों से निकलने वाला जहरीला धुआं अब लोगों के फेफड़ों को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है. यह सिर्फ पर्यावरण के लिए संकट नहीं है बल्कि लोगों पर भी इसका असर हो रहा है. इस बीच इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन ICCT की नई रिपोर्ट हेल्थ बेनिफिट्स ऑफ जीरो-एमिशन ट्रांसपोर्ट थ्रू 2050 में बेहद बड़ा दावा किया गया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, अगर भारत 2045 तक सभी पेट्रोल-डीजल की जगह इलेक्ट्रिक वाहनों में बदलने का लक्ष्य हासिल कर लेता है तो साल 2050 तक लगभग 17 लाख लोगों को अकाल मौत से बचाया जा सकता है. इसके अलावा करीब 97,200 मासूम बच्चों को सांस की जानलेवा बीमारी यानी चाइल्डहुड अस्थमा से भी सुरक्षित किया जा सकता है. चलिए विस्तार से जानतें हैं इस खबर के बारें में.
6 मिनट में एक व्यक्ति की हो रही मौत
बता दें कि, इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि सड़क परिवहन से निकलने वाले धुएं की वजह से देश में हर साल करीब 90,000 लोग समय से पहले अपनी जान गंवा रहे हैं. इसका मतलब है कि भारत में हर 6 मिनट में एक इंसान सिर्फ इसलिए मर रहा है क्योंकि वह सड़कों पर फैलते जहरीले धुएं में सांस लेने के लिए मजबूर है.
इतना ही नहीं इस जहरीली हवा के कारण देश में हर साल करीब 15,300 मासूम बच्चे बचपन में ही अस्थमा जैसी गंभीर बीमारी का शिकार हो रहे हैं. आंकड़ों पर नजर डालें तो दुनिया भर में वाहन प्रदूषण से होने वाली कुल अकाल मौतों का 13 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत में दर्ज किया जाता है.

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दिल्ली-एनसीआर में खतरनाक प्रदुषण
आईसीसीटी की रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि, राजधानी दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) को लेकर सबसे बड़ी चिंता जताई गई है. महज 5 फीसदी आबादी वाला यह इलाका देश में वाहन प्रदूषण से होने वाले नुकसान का सबसे बड़ा शिकार बन चुका है. आंकड़ों के अनुसार, 2024 में NCR में वाहन प्रदूषण के कारण 8,100 लोगों की अकाल मौत हुई जो पूरे देश का 9 फीसदी है.
बच्चों के स्वास्थ्य के लिहाज से स्थिति और भी ज्यादा खतरनाक है. देश में वाहन उत्सर्जन के कारण बच्चों में होने वाले अस्थमा के कुल नए मामलों में से अकेले 23 प्रतिशत मामले दिल्ली-एनसीआर से सामने आ रहे हैं. दिल्ली में पीएम 2.5 का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सुरक्षित मानकों से ढाई गुना से भी ज्यादा दर्ज किया गया है.
ट्रक और बसें बनी हैं मुसीबत
बता दें कि, रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि कमर्शियल और भारी वाहन यानी ट्रक और बसें प्रदूषण का सबसे बड़ा जरिया हैं. हालांकि भारतीय सड़कों पर कुल गाड़ियों की संख्या में इनकी हिस्सेदारी काफी कम है. लेकिन वाहन परिवहन से निकलने वाली कुल नाइट्रोजन ऑक्साइड गैस में भारी वाहनों की हिस्सेदारी 79 फीसदी है.
इसी वजह से विशेषज्ञों का मानना है कि पैसेंजर कारों और दोपहिया वाहनों के साथ-साथ ट्रक, बसों और कमर्शियल फ्लीट का तेजी से इलेक्ट्रिफिकेशन करना सबसे ज्यादा जरूरी है. जब तक भारी वाहन इलेक्ट्रिक नहीं होंगे तब तक हवा की गुणवत्ता में बड़ा सुधार पाना मुमकिन नहीं होगा.

इलेक्ट्रिक वाहन अब हेल्थ की जरूरत
आपको बता दें कि, आईसीसीटी इंडिया के प्रबंध निदेशक अमित भट्ट और अन्य शोधकर्ताओं का कहना है कि गाड़ियों के साइलेंसर से निकलने वाले धुएं को पूरी तरह खत्म करने का एकमात्र जरिया इलेक्ट्रिक वाहन ही हैं. अब तक ईवी अपनाने को केवल जलवायु परिवर्तन या ईंधन की बचत से जोड़कर देखा जाता था लेकिन यह रिपोर्ट साबित करती है कि यह करोड़ों लोगों की सांसें बचाने का एक बड़ा जरिया है.
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