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आंवले की खेती कब और कैसे होती है, 1 बीघा में कितनी कमाई?

आंवले के लिए जुलाई से सितंबर का बरसाती मौसम सबसे बेहतर माना जाता है. पौधा 4-5 साल में फल देना शुरू करता है और 8-9 साल पुराना पेड़ हर साल करीब 1 क्विंटल आंवला देता है, जिससे अच्छी कमाई हो सकती है.

आंवले की खेती को किसानों के लिए एक लंबे समय तक फायदा देने वाला सौदा माना जाता है. इसका पेड़ एक बार लगाने के बाद दशकों तक फल देता रहता है. भारत में आंवले की खेती सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में होती है. इसके अलावा मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा में भी किसान इसकी खेती बड़े लेवल पर कर रहे हैं. आइए जानते हैं आंवले की रोपाई का सही समय क्या है और इससे कितनी कमाई हो सकती है.

कब करें आंवले की रोपाई

आंवले का पौधे लगाने के लिए बरसात का मौसम सबसे अच्छा माना जाता है. जुलाई से सितंबर के महीने के बीच आंवले की रोपाई करना सबसे फायदेमंद रहता है, क्योंकि इस दौरान मिट्टी में नमी बनी रहती है, जिससे पौधे की जड़ें आसानी से पकड़ लेती हैं. आंवले का पौधा लगाने के बाद यह करीब 4 से 5 साल में फल देना शुरू कर देता है. वहीं 8 से 9 साल पुराना पेड़ हर साल औसतन 1 क्विंटल तक आंवला देने लगता है. खास बात यह है कि सही देखभाल मिलने पर एक पेड़ 55 से 60 साल तक फल देता रहता है, यानी एक बार की मेहनत से किसान दशकों तक कमाई कर सकते हैं.

बाजार में कितना है आंवले का भाव

थोक बाजार में आंवला औसतन 20 से 40 रुपये प्रति किलो के बीच बिकता है. इस हिसाब से एक पूरी तरह विकसित पेड़ से हर साल करीब 20,000 से 30,000 रुपये तक की कमाई हो सकती है, जो पेड़ की उम्र, देखभाल और बाजार भाव पर निर्भर करती है.

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1 हेक्टेयर में कितनी होती है कमाई

आमतौर पर एक हेक्टेयर जमीन में करीब 200 आंवले के पौधे लगा सकते हैं. पूरी तरह फसल देने वाले सालों में एक हेक्टेयर से किसान 4 से 5 लाख रुपये तक की सालाना कमाई कर सकते हैं. चूंकि बीघा का आकार अलग अलग राज्यों में अलग अलग होता है, इसलिए 1 बीघा में लगने वाले पौधों की संख्या और उससे होने वाली कमाई भी क्षेत्र के हिसाब से घट-बढ़ सकती है, लेकिन रेशियो के हिसाब से हर पौधा से मिलने वाला मुनाफा लगभग एक जैसा हो सकता है.

इन बातों का रखें ध्यान

आंवले की खेती में कुछ आम बीमारियां भी देखने को मिलती हैं, जैसे काला धब्बा रोग, कुम्भी रोग और फफूंदी रोग. समय रहते इनकी पहचान कर मुलासिब इलाज करना जरूरी है, ताकि फसल पर असर न पड़े. अच्छी बात यह है कि आंवले के पेड़ को न तो लू से नुकसान होता है और न ही पाले से, इसलिए इसकी देखभाल में ज्यादा मेहनत नहीं लगती है.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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