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Traditional Farming: पुराने जमाने में क्या था खेती का कल्चर, आधुनिक खेती से कैसे अलग था वह दौर?

Traditional Farming: पुराने जमाने में खेती पूरी तरीके से मानसून पर निर्भर थी, मानसून के मुताबिक फसलों का चुनाव करना पड़ता था. खेती के काम में बैलों का बड़ा योगदान होता था.

Traditional Farming: आज के दौर में जब हम खेती की बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में बड़े-बड़े ट्रैक्टर, आधुनिक मशीनें, ट्यूबवेल और तरह-तरह के रासायनिक खाद की तस्वीरें आती हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आज से 100 साल पहले हमारे दादा-परदादा के जमाने में खेती कैसी होती थी.  पुराने जमाने में खेती सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि जीने का एक तरीका और एक गहरा कल्चर था. आज के समय की आधुनिक खेती और पुराने जमाने के उस दौर की खेती करने के तरीके में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है. 

बैल और हल का दौर

पुराने जमाने में खेती की शुरुआत ही दो बैलों की जोड़ी और लकड़ी के हल से होती थी. किसान सुबह उठकर अपने बैलों के साथ खेतों की तरफ निकल जाते थे और एक एकड़ खेत को जोतने में कई दिन लग जाते थे. लेकिन आज का दौर पूरी तरह मशीन का दौर हो चुका है.अब बैलों की जगह बड़े और ताकतवर ट्रैक्टरों ने ले ली है. जो काम पहले हफ्तों में होता था, वह अब आधुनिक कल्टीवेटर और रोटावेटर की मदद से कुछ ही घंटों में पूरा हो जाता है. 

बारिश पर निर्भरता

पुराने जमाने में सिंचाई के साधन बहुत सीमित थे. किसान पूरी तरह से मानसूनी बारिश पर निर्भर रहते थे. अगर बारिश अच्छी हुई तो फसल की पैदावार काफी अच्छी होती थी, और अगर सूखा पड़ा तो पूरी फसल बर्बाद हो जाती थी. साथ ही पानी देने के लिए कुओं और रहट का इस्तेमाल होता था, जिसमें बहुत मेहनत लगती थी. इसके विपरीत, आज की आधुनिक खेती में किसान बारिश के भरोसे नहीं बैठते. अब हर खेत में बिजली या सोलर पंप से चलने वाले ट्यूबवेल हैं. इतना ही नहीं, पानी बचाने के लिए अब ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक तकनीकें आ चुकी हैं.

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गोबर की खाद 

पुराने जमाने की खेती पूरी तरह से प्राकृतिक और ऑर्गेनिक होती थी. फसलों को पोषण देने के लिए किसान केवल गाय-भैंस के गोबर की खाद और कचरों से बनी कंपोस्ट का इस्तेमाल करते थे. इससे जमीन की उपजाऊ शक्ति लंबे समय तक बनी रहती थी और अनाज पूरी तरह शुद्ध होता था. लेकिन आज के दौर में ज्यादा पैदावार की लालच में यूरिया, डीएपी और कीटनाशक दवाओं का भारी इस्तेमाल किया जा रहा है. इससे फसल तो ज्यादा होती है, लेकिन जमीन की सेहत और हमारी सेहत दोनों खराब हो रही है. 

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