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खतरे में खरीफ की फसल: देश के 397 जिलों में सामान्य से कम बारिश, गंगा किनारे के किसान परेशान

गंगा के किनारे बसे प्रयागराज में 50%, गाजीपुर और चंदौली में 58%, प्रतापगढ़ में 42%, फतेहपुर में 56% कम बारिश दर्ज की गई है. वहीं, भदोही में 88%, जौनपुर में 75%, कानपुर देहात में 74% कम वर्षा हुई है.

देश में मॉनसून का आधे से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन 741 जिलों में से 326 जिलों में सामान्य से कम वर्षा और 71 जिलों में अत्यधिक कम वर्षा दर्ज की गई है. इसका मतलब यह है कि देश के कुल 397 जिले (लगभग 54 प्रतिशत) सामान्य से कम बारिश का सामना कर रहे हैं. खास बात यह है कि इसका सबसे ज्यादा असर गंगा के मैदानी इलाकों पर दिखाई दे रहा है. उत्तर प्रदेश और बिहार, जहां देश का सबसे बड़ा धान उत्पादक क्षेत्र है, वहां गंगा के किनारे बसे अधिकांश जिलों में बारिश सामान्य से काफी कम रही है. इससे धान की रोपाई, सिंचाई और खरीफ फसलों पर दबाव बढ़ने की आशंका है.

क्या कहते हैं सरकारी आंकड़े?

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 10 जुलाई 2026 तक देश में धान की बुआई 114.69 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 125.53 लाख हेक्टेयर की तुलना में 10.84 लाख हेक्टेयर कम है. हालांकि, यह सामान्य बुआई क्षेत्र 97.74 लाख हेक्टेयर से 16.95 लाख हेक्टेयर अधिक है. गौरतलब है कि धान की रोपाई का सबसे महत्वपूर्ण समय जुलाई का पहला और दूसरा पखवाड़ा माना जाता है. उत्तर प्रदेश में 75 जिलों में से 31 जिले कम वर्षा और 9 जिले अत्यधिक कम वर्षा की श्रेणी में हैं.

गंगा किनारे बसे जिलों का क्या हाल?

गंगा के किनारे बसे जिलों में प्रयागराज में 50 प्रतिशत, गाजीपुर में 58 प्रतिशत, चंदौली में 58 प्रतिशत, प्रतापगढ़ में 42 प्रतिशत, फतेहपुर में 56 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है. वहीं, भदोही में 88 प्रतिशत, जौनपुर में 75 प्रतिशत, कानपुर देहात में 74 प्रतिशत और कौशांबी में 80 प्रतिशत कम वर्षा हुई है, जो अत्यधिक कम वर्षा की श्रेणी में आते हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी स्थिति बेहतर नहीं है. गाजियाबाद में 44 प्रतिशत, अमरोहा में 50 प्रतिशत, हापुड़ में 20 प्रतिशत और शाहजहांपुर में 24 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है.

बिहार का हाल भी बेहाल

उधर, बिहार में तस्वीर और भी चिंताजनक है. राज्य के 38 जिलों में से 29 जिले कम वर्षा और 7 जिले अत्यधिक कम वर्षा की श्रेणी में हैं. इसका मतलब है कि केवल दो जिलों में ही सामान्य वर्षा दर्ज हुई है. गंगा के किनारे बसे बिहार के प्रमुख जिलों में बक्सर में 52 प्रतिशत, भोजपुर में 63 प्रतिशत, पटना में 57 प्रतिशत, नालंदा में 61 प्रतिशत, लखीसराय में 31 प्रतिशत, बेगूसराय में 46 प्रतिशत, खगड़िया में 47 प्रतिशत, मुंगेर में 54 प्रतिशत, भागलपुर में 61 प्रतिशत और कटिहार में 38 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है. जहानाबाद में 67 प्रतिशत कम वर्षा हुई है.

झारखंड में भी नहीं लगी झड़ी

झारखंड में वर्षा की कमी सबसे गंभीर रूप से राज्य के उत्तर और पश्चिमी हिस्सों में दिखाई दे रही है. सबसे अधिक प्रभावित जिलों में साहिबगंज में 99 प्रतिशत, गढ़वा में 66 प्रतिशत, पाकुड़ में 65 प्रतिशत, देवघर में 62 प्रतिशत, कोडरमा में 60 प्रतिशत, पूर्वी सिंहभूम में 56 प्रतिशत, लोहरदगा में 53 प्रतिशत, गोड्डा में 51 प्रतिशत, गिरिडीह में 50 प्रतिशत, लातेहार में 48 प्रतिशत, हजारीबाग में 45 प्रतिशत, रामगढ़ में 34 प्रतिशत और रांची में 32 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है. राज्य के 24 जिलों में से 18 जिले कम वर्षा और 5 जिले अत्यधिक कम वर्षा की श्रेणी में हैं, जबकि केवल एक जिले में सामान्य वर्षा दर्ज की गई है.

बाकी राज्यों में कैसे हैं हालात?

उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड के अलावा तेलंगाना के 33 में से 25 जिले, कर्नाटक के 31 में से 21 जिले, गुजरात के 33 में से 21 जिले, महाराष्ट्र के 36 में से 19 जिले और असम के 35 में से 22 जिले सामान्य से कम वर्षा वाले हैं. इसके उलट पंजाब में 22 जिलों में से 11 जिले कम वर्षा और 2 जिले अत्यधिक कम वर्षा की श्रेणी में हैं, जबकि 6 जिलों में सामान्य वर्षा दर्ज की गई है. हरियाणा की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, जहां 22 जिलों में से 6 जिले कम वर्षा, 2 जिले अत्यधिक कम वर्षा, 10 जिले सामान्य, 3 जिले सामान्य से अधिक और एक जिला अत्यधिक अधिक वर्षा की श्रेणी में है. देश के अन्य हिस्सों में स्थिति अलग है. मध्य प्रदेश के कई जिलों में सामान्य या सामान्य से अधिक वर्षा हुई है. दिल्ली में भी अधिकांश जिले सामान्य या उससे बेहतर स्थिति में हैं.

सिर्फ इतने जिलों में नॉर्मल बारिश

भारत मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 13 जुलाई तक देश के केवल 219 जिलों में सामान्य वर्षा हुई है. 97 जिलों में सामान्य से अधिक और 24 जिलों में अत्यधिक अधिक वर्षा दर्ज की गई है. इसके मुकाबले 397 जिलों में सामान्य से कम वर्षा हुई है. यह स्थिति बताती है कि इस वर्ष मानसून पूरे देश में एक समान नहीं बरसा है. गंगा के मैदान में यदि जुलाई के दूसरे पखवाड़े में अच्छी बारिश नहीं होती है तो इसका असर धान की खेती, भूजल स्तर और खरीफ फसलों के उत्पादन पर पड़ सकता है.

मौसमी सूखे के आसार

ये आंकड़े बताते हैं कि गंगा से सटे कई जिलों के साथ-साथ देश के कई जिलों में मौसमी सूखे की स्थिति बन गई है. भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, यदि किसी क्षेत्र में पूरे मौसम के दौरान सामान्य से 26 से 50 प्रतिशत कम बारिश होती है तो उसे मध्यम मौसमीय सूखा माना जाता है. यदि बारिश सामान्य से 50 प्रतिशत से अधिक कम हो जाए तो उसे गंभीर मौसमीय सूखा कहा जाता है. हालांकि, केवल कम बारिश होने से कोई क्षेत्र सूखाग्रस्त घोषित नहीं होता. उसके लिए फसल, मिट्टी की नमी और जल उपलब्धता जैसे अन्य मानकों का भी आकलन किया जाता है.

दूसरी फसलें भी प्रभावित

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार, 10 जुलाई 2026 तक खरीफ फसलों की कुल बुआई 531.25 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 632.69 लाख हेक्टेयर की तुलना में 101.44 लाख हेक्टेयर कम है और सामान्य बुआई क्षेत्र से भी 18.11 लाख हेक्टेयर पीछे है. सबसे अधिक गिरावट तिलहन (31.34 लाख हेक्टेयर), श्रीअन्न एवं मोटे अनाज (28.61 लाख हेक्टेयर), दालों (17.22 लाख हेक्टेयर), कपास (14.41 लाख हेक्टेयर) और चावल (10.84 लाख हेक्टेयर) की बुआई में दर्ज की गई है.

तिलहनों में सोयाबीन और मूंगफली, दालों में अरहर और उड़द तथा मोटे अनाज में बाजरा और मक्का की बुआई में काफी ज्यादा कमी आई है. इसके विपरीत गन्ने की बुआई पिछले वर्ष से 0.86 लाख हेक्टेयर अधिक रही, जबकि जूट एवं मेस्ता में भी मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई है. ये आंकड़े संकेत देते हैं कि कमजोर और असमान मानसून का असर खरीफ फसलों की बुआई पर साफ दिखाई देने लगा है.

यह भी पढ़ें: बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से नहीं खराब होगी फसल! किसानों के लिए 5 सबसे सटीक मौसम बताने वाले ऐप्स

पत्रकारिता के क्षेत्र में 21 साल से सक्रिय हैं. साल 2004 में स्टार न्यूज़ से जुड़े और इस समय एबीपी न्यूज़ में इनपुट एडिटर हैं. इन्होंने असाइंमेंट हेड और फॉरवर्ड प्लानिंग के काम को अलग-अलग पदों पर रहने के साथ ही बतौर हेड बख़ूबी अंजाम दिया. साल 2022 में डिजिटल मीडिया से भी नाता जोड़ा. 
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