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नहीं मिले फसल के सही दाम, यह सरकारी योजना आएगी किसानों के काम

मंडी में औने-पौने दाम पर फसल बिकने का डर अब हमेशा के लिए खत्म! सरकार की इस धांसू स्कीम से बाजार का घाटा होगा रिकवर. कैसे मिलेगा नुकसान का पूरा पैसा और क्या है अप्लाई करने का तरीका?

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  • यह योजना सोयाबीन, मक्का सहित कई फसलों पर लागू होती.

खेती में जी-तोड़ पसीना बहाने के बाद भी जब मंडी में फसल के कौड़ी के भाव मिलते हैं. तो किसान की कमर टूट जाती है. मौसम की मार, खाद-बीज का भारी खर्च और फिर कटाई के बाद औने-पौने दामों में माल बेचने की मजबूरी किसानों की सबसे बड़ा परेशानी रही है. अक्सर अच्छी पैदावार होने पर भी मार्केट क्रैश हो जाता है और लागत निकलना तक मुश्किल हो जाता है. किसानों की इस समस्या को खत्म करने और उन्हें घाटे से सुरक्षित रखने के लिए एमपी सरकार लेकर आई है भावांतर भुगतान योजना. 

यह योजना एक फाइनेंशियल शील्ड यानी आर्थिक ढाल की तरह काम करती है. अगर खुले बाजार या मंडी में किसान को उसकी फसल का सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP नहीं मिल पाता. तो सरकार बीच के इस घाटे की पूरी भरपाई सीधे किसान के बैंक खाते में करती है. अब फसल कम रेट पर बिकने का डर किसानों का आर्थिक नुकसान नहीं करवाएगा. क्योंकि भावांतर योजना करेगी मदद.

कैसे काम करती है भावांतर योजना?

बहुत से किसानों को भावांतर योजना किस तरह काम करती है. इस बारे में जानकारी नहीं अगर आप भी उन्हीं में शामिल हैं. तो फिर आप एक आसान उदाहरण से समझ सकते हैं. मान लीजिए सरकार ने किसी फसल का एमएसपी 4000 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है. लेकिन पीक आवक के समय मंडी में वही फसल 3200 रुपये प्रति क्विंटल पर बिकी. ऐसे में किसान को प्रति क्विंटल 800 रुपये का सीधा नुकसान हो रहा होता है. 

नहीं मिले फसल के सही दाम, यह सरकारी योजना आएगी किसानों के काम

भावांतर योजना इसी 800 रुपये के अंतर यानी भाव के अंतर को सीधे किसान के बैंक खाते में ट्रांसफर कर देती है. इससे किसान को कभी भी मजबूरी में अपना माल दबाकर या औने-पौने रेट पर बेचने का मलाल नहीं रहता. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि सरकार को खुद भारी मात्रा में अनाज खरीदकर गोदामों में सड़ाने की जरूरत नहीं पड़ती और किसान को भी अपनी पूरी मेहनत का सही दाम अपने घर बैठे मिल जाता है.

किन फसलों पर मिलता है फायदा?

शुरुआत में इस योजना का फोकस मुख्य रूप से सोयाबीन, मूंगफली, मक्का, मूंग, उड़द और तिलहन जैसी उन नकदी फसलों पर रखा गया है. जिनके बाजार भाव में सबसे ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है. बाद में कई बागवानी और मौसमी सब्जियों को भी इसके दायरे में जोड़ा गया है. योजना का लाभ लेने के लिए राज्य सरकारें बकायदा एक निश्चित सेलिंग विंडो यानी बिक्री की तारीखें तय करती हैं. 

किसानों को सिर्फ इसी तय समय सीमा के भीतर रजिस्टर्ड कृषि उपज मंडी समिति में जाकर अपनी फसल बेचनी होती है. मंडी का अधिकृत व्यापारी जब किसान को भुगतान करता है. तो उसका पूरा डिजिटल बिल पोर्टल पर ऑटो-अपलोड हो जाता है. इसके बाद सरकार मॉडल रेट तय करती है और अंतर की राशि सीधे डीबीटी के जरिए कुछ ही हफ्तों के भीतर किसान के खाते में भेज देती है.

यह भी पढ़ें: किसानों को मिलेगा उन्नत आलू बीज, जानें बुकिंग का तरीका

क्या है योजना में रजिस्ट्रेशन का तरीका?

इस योजना का फायदा उठाने के लिए फसल बुवाई के तुरंत बाद ही  ई-उपार्जन पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होता है. किसान नजदीकी कॉमन सर्विस सेंटर, लोक सेवा केंद्र या खुद से भी ऑनलाइन अप्लाई कर सकते हैं. आवेदन के समय किसान के पास आधार कार्ड, बैंक पासबुक की कॉपी, जमीन के खसरा-खतौनी के कागजात और चालू मोबाइल नंबर होना जरूरी है. 


नहीं मिले फसल के सही दाम, यह सरकारी योजना आएगी किसानों के काम

फॉर्म भरते समय यह ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि बैंक खाता आधार से एनपीसीआई लिंक हो जिससे डीबीटी पेमेंट अटकने की कोई गुंजाइश न रहे. रजिस्ट्रेशन के बाद लोकल पटवारी या कृषि विभाग की टीम खेत के रकबे का फिजिकल वेरिफिकेशन करती है. वेरिफिकेशन पास होते ही किसान को एक रसीद मिल जाती है. जिसके बाद मंडी में फसल बेचते ही उसका क्लेम ऑटोमैटिक प्रोसेस हो जाता है.

यह भी पढ़ें: गांव में कैसे खोलें ट्रैक्टर की एजेंसी? कितना आएगा कुल खर्च

About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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