Uttarakhand News: गुलदारों के माथे से धुला आदमखोर होने का कलंक, जांच में 14 बेजुबान पाए गए बेगुनाह
Uttarakhand News: वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर साबित हुआ है कि इन गुलदारों ने इंसानी खून नहीं चखा था. लंबे समय से ‘आदमखोर’ का ठप्पा झेल रहे 14 गुलदार अब बेगुनाह साबित हो गए हैं.

उत्तराखंड के विभिन्न इलाकों से आदमखोर होने के शक में पकड़े गए गुलदारों को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है. डीएनए जांच और वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर यह साबित हुआ है कि इन गुलदारों ने इंसानी खून नहीं चखा था. लंबे समय से ‘आदमखोर’ का ठप्पा झेल रहे 14 गुलदार अब बेगुनाह साबित हो गए हैं, जिसके बाद उन्हें रिहा करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है.
देहरादून से सामने आई इस रिपोर्ट के अनुसार, वन विभाग ने बीते कुछ वर्षों में मानव-वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती घटनाओं के बीच करीब 60 गुलदारों को पकड़ा था. इन पर आरोप था कि ये इंसानों पर हमला कर रहे हैं और आदमखोर बन चुके हैं. एहतियातन इन गुलदारों को चिड़ियापुर (हरिद्वार), अल्मोड़ा, रानीबाग (हल्द्वानी) और देहरादून के रेस्क्यू सेंटरों में रखा गया था.
14 गुलदारों के डीएनए में नहीं मिले इंसानी अवशेष
इनमें से 25 गुलदारों के डीएनए सैंपल जांच के लिए बरेली और लखनऊ की प्रयोगशालाओं में भेजे गए. हाल ही में आई रिपोर्ट में 14 गुलदारों के डीएनए में इंसानी अवशेष नहीं पाए गए. यानी ये गुलदार आदमखोर नहीं थे और इन्हें शक के आधार पर पकड़ा गया था. रिपोर्ट मिलते ही वन विभाग ने इन गुलदारों को रिहा करने का निर्णय लिया है.
रिपोर्ट में देरी की वजह से एक साल कैद रहे बेजुबान
हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया ने कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं. रिपोर्ट आने में करीब एक साल का समय लग गया, जिसके चलते ये बेजुबान जानवर इतने लंबे समय तक पिंजरों में कैद रहे. विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य में अपनी वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक लैब न होने के कारण सैंपल बाहर भेजने पड़ते हैं, जिससे देरी होती है और निर्दोष जानवरों को सजा भुगतनी पड़ती है.
संदेह के आधार पर पकड़ लिए गए कई गुलदार
हरिद्वार के चिड़ियापुर रेस्क्यू सेंटर में फिलहाल 24 गुलदार ऐसे हैं, जिनके मामलों की जांच अभी पूरी नहीं हुई है. कई मामलों में सिर्फ संदेह के आधार पर ही गुलदारों को पकड़ लिया जाता है, जबकि वास्तविक हमलावर की पहचान स्पष्ट नहीं हो पाती. आंकड़ों के मुताबिक, राज्य गठन के बाद से अब तक 1296 लोगों की मौत वन्यजीवों के हमलों में हो चुकी है, जिनमें करीब 500 मौतें केवल गुलदारों के हमलों से हुई हैं.
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अगर डीएनए जांच में किसी गुलदार के आदमखोर होने की पुष्टि हो जाती है, तो उसे या तो रेस्क्यू सेंटर में रखा जाता है या चिड़ियाघर भेज दिया जाता है. वहीं, निर्दोष पाए जाने पर उसे जंगल में सुरक्षित स्थान पर छोड़ दिया जाता है.
'संदेह के आधार पर जानवरों को पकड़ना अनुचित'
विशेषज्ञों ने इस मामले को वन्यजीव प्रबंधन के लिए एक सीख बताया है. उनका कहना है कि केवल संदेह के आधार पर किसी भी जानवर को पकड़ना उचित नहीं है. साथ ही, राज्य में आधुनिक फॉरेंसिक सुविधाओं का विकास जरूरी है, ताकि समय पर जांच हो सके और बेजुबान जानवरों को अनावश्यक कैद से बचाया जा सके.
इस घटना ने मानव-वन्यजीव संघर्ष के जटिल पहलुओं को उजागर किया है और यह भी दिखाया है कि सही जांच के बिना लिए गए फैसले किस तरह निर्दोष जीवों के लिए पीड़ा का कारण बन सकते हैं.















