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उत्तराखंड विधानसभा की पुरानी बहस फिर भड़की, पहाड़ बनाम मैदान पर सियासी हलचल तेज

Uttarakhand News: उत्तराखंड में पहाड़ बनाम मैदान का विवाद फिर उभरा है. विधानसभा की पुरानी बहस ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी और सियासी माहौल गरमा गया.

उत्तराखंड में एक बार फिर पहाड़ और मैदान का मुद्दा राजनीतिक गलियारों में गर्मा गया है. कुछ दिन पूर्व संपन्न हुए विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान यह मामला तब चर्चा में आया जब लक्सर से बसपा विधायक शहजाद अहमद ने सदन में पहाड़ और मैदान के बीच भेदभाव का मुद्दा उठाया.

इस दौरान भाजपा विधायक किशोर उपाध्याय ने हस्तक्षेप करते हुए कहा ज्यादा पहाड़-पहाड़ मत करो, अगर टिहरी डैम का पानी बंध कर दिया तो मैदान वाले प्यास से मर जाएंगे. किशोर उपाध्याय की यह टिप्पणी उस समय तो सदन की कार्यवाही का हिस्सा बनकर रह गई, लेकिन अब यह बयान पहाड़ और मैदान की राजनीति को नई हवा देने लगा है. विपक्षी दलों ने इस टिप्पणी को उत्तराखंड की भौगोलिक एकता पर चोट बताया, जबकि भाजपा विधायकों का कहना है कि इस बयान को अनावश्यक रूप से बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है.

बसपा विधायक का जवाब

बसपा विधायक शहजाद अहमद ने अपने जवाब में कहा कि जितने लोग सदन में पहाड़ की दुहाई देते हैं, वे विधायक बनते ही सबसे पहले अपना घर देहरादून या हल्द्वानी में बनाते हैं, उन्होंने आगे कहा कि केदारनाथ की विधायक आशा नौटियाल तक ने अपनी बेटी की शादी देहरादून से की. जब खुद पहाड़ के प्रतिनिधि मैदान में रहना पसंद करते हैं, तो फिर पहाड़ की राजनीति क्यों की जाती है.

राजनीतिक हलचल और आगामी चुनाव

इस बयान ने राजनीतिक हलचल और तेज कर दी है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य स्थापना के 25 वर्ष पूरे होने के बाद भी पहाड़ और मैदान के बीच विकास की असमानता का मुद्दा समाप्त नहीं हुआ है, राजधानी स्थायीकरण, पलायन और रोजगार जैसे विषयों पर यह विभाजन अक्सर सिर उठाता रहा है.

अब विधानसभा की इस पुरानी बहस ने एक बार फिर राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया है. सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय स्तर तक “पहाड़ बनाम मैदान” की बहस तेज हो चली है. माना जा रहा है कि आने वाले चुनावों में यह मुद्दा फिर से नेताओं के लिए वोट बटोरने का एक बड़ा जरिया बन सकता है. कुल मिलाकर, कुछ दिन पहले सदन में उठी यह बहस अब उत्तराखंड की राजनीति में नई सियासी जंग की शुरुआत करती दिख रही है.

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