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उत्तराखंड की धरती के गर्भ में जमा हो रही तबाही? डरा रही है वैज्ञानिकों की नई चेतावनी

Dehradun News: उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र में मेन हिमालयन थ्रस्ट के 18 किलोमीटर नीचे एक बड़ी भूकंपीय ऊर्जा एकत्रित हो चुकी है. वैज्ञानिकों के अनुसार, यह ऊर्जा इस समय लॉक्ड पोजिशन में है.

Uttarakhand News: उत्तराखंड समेत पूरा हिमालयी बेल्ट भूकंप के लिहाज से संवेदनशील है. यह बात पहले भी वैज्ञानिकों बोल चुके हैं. एक बार फिर से वैज्ञानिकों ने इस बात को लेकर चिंता जाहिर की है कि हिमालय क्षेत्र में भूकंप आ सकता है.

बता दें कि उत्तराखंड समेत पूरा हिमालयी क्षेत्र भविष्य में एक बड़े भूकंप की ओर बढ़ रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस अति संवेदनशील जोन में पिछले 500 से 600 वर्षों के भीतर कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है, जिससे इस पूरे जोन में एक बड़ी भूकंपीय ऊर्जा पैदा हो चुकी है. वैज्ञानिकों की अगर माने तो, यह ऊर्जा कभी भी विकराल रूप में सामने आ सकती है. हालाँकि  वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि ये बताना मुश्किल है कि ये भूकंप कब और कहां आएगा, लेकिन भूगर्भ वैज्ञानिक इस दिशा में लगातार रिसर्च कर रहे हैं.

टेक्टोनिक प्लेट्स 40 मिलीमीटर की दर से खिसक रहीं

देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत ने एबीपी को बताया कि उत्तराखंड समेत पूरा हिमालयी बेल्ट भूकंप के लिहाज से सक्रिय जोन में आता है.  कहा कि GPS से मिली जानकारी के मुताबिक हिमालय की टेक्टोनिक प्लेट्स उत्तर से दक्षिण की ओर सालाना करीब 40 मिलीमीटर की दर से खिसक रही हैं. टनकपुर से लेकर देहरादून के बीच यह गति लगभग 18 मिमी/वर्ष है, जबकि कुछ स्थानों पर यह गति 14 मिमी/वर्ष तक सीमित है. इस खिसकन से धरती में सिकुड़न की स्थिति बन रही है, जो भविष्य के लिए खतरे का संकेत है.

गढ़वाल-कुमाऊं में अलग-अलग मेग्नीट्यूड वाले भूकंप की संभावना

नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी NGRI, हैदराबाद के एमेरिटस वैज्ञानिक डॉ. एम. रवि कुमार के अनुसार उत्तराखंड को लेकर चल रहे एक विशेष अध्ययन में सामने आया है कि राज्य के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र भूगर्भीय दृष्टिकोण से दो अलग-अलग सेगमेंट में आते हैं. इसका मतलब है कि इन दोनों क्षेत्रों में भूकंप का प्रभाव और तीव्रता अलग हो सकती है. रिसर्च में यह भी सामने आया है कि यहां सीस्मिक गैप भी मौजूद है, जो किसी बड़े भूकंप की संभावना को बढ़ा देता है.

हिमालयी क्षेत्र में पहले भी कई बड़े भूकंप आ चुके हैं 

1975 – किन्नौर, 6.8 मैग्नीट्यूड

1991 – उत्तरकाशी, 6.8 मैग्नीट्यूड

1999 – चमोली, 6.6 मैग्नीट्यूड

2005 – कश्मीर, 7.6 मैग्नीट्यूड

2011 – सिक्किम, 6.9 मैग्नीट्यूड

2015 – नेपाल, 7.8 मैग्नीट्यूड

2025 – तिब्बत, 7.1 मैग्नीट्यूड

इन घटनाओं ने साबित किया है कि हिमालय क्षेत्र में बार-बार बड़े भूकंप आते हैं, जिससे हजारों जानें जाती हैं और बड़ी तबाही होती है. इन घटनाओं ने यह दिखाया है कि जब धरती की प्लेटें अधिक दबाव झेलने के बाद फटती हैं, तो उसका असर बेहद खरनाक होता है.

एक बड़ी भूकंपीय ऊर्जा एकत्रित हो चुकी

उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र में मेन हिमालयन थ्रस्ट (Main Himalayan Thrust – MHT) के 18 किलोमीटर नीचे एक बड़ी भूकंपीय ऊर्जा एकत्रित हो चुकी है. वैज्ञानिकों के अनुसार, यह ऊर्जा इस समय लॉक्ड पोजिशन में है. ये कब रिलीज होगी, यह कोई नहीं जानता, लेकिन अगर यह ऊर्जा एक बार में बाहर निकली, तो वह बहुत विनाशकारी होगी.

वैज्ञानिकों का मानना है कि भूकंप की तीव्रता को भूगर्भीय गणनाओं से समझा जा सकता है, लेकिन कब आएगा, यह अब भी विज्ञान के लिए रहस्य है. उत्तराखंड के कुछ क्षेत्रों में वर्तमान समय में GPS से आंकड़े जुटाए जा रहे हैं. जिससे यह पता लगाने की कोशिश हो रही है कि किस क्षेत्र में सबसे अधिक एनर्जी संचित हो रही है.

फिलहाल प्रदेश में केवल दो सक्रिय जीपीएस स्टेशन हैं. विशेषज्ञों के अनुसार अगर प्रदेश में और अधिक GPS और अन्य इंस्ट्रूमेंट्स लगाए जाएं तो प्लेट्स की गति और दबाव की स्थिति की और सटीक जानकारी मिल सकेगी. यह जानकारी भविष्य में आने वाले भूकंप के पूर्वानुमान में सहायक हो सकती है.

उत्तराखंड के संदर्भ में वैज्ञानिकों की चेतावनी को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए. यह राज्य भूकंपीय लिहाज से अति संवेदनशील जोन में आता है और भविष्य में यहां एक बड़ा भूकंप आने की पूरी संभावना है. ऐसे में सरकार, आपदा प्रबंधन एजेंसियों और आम नागरिकों को सचेत रहना होगा और भूकंप से निपटने की तैयारियों को मजबूत करना होगा. जागरूकता और पूर्व तैयारी ही इस प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुकसान को न्यूनतम कर सकती है.

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