उत्तराखंड: अंकिता भंडारी केस पर राजनीति तेज! नहीं दिखा विपक्ष के बंद का असर
Dehradun News: अंकिता भंडारी केस में सीएम पुष्कर सिंह धामी द्वारा CBI जांच की संस्तुति किए जाने के तुरंत बाद ही व्यापार मंडलों ने बंद से अपने हाथ खींच लिए. साथ ही मामले में राजनीति भी बेनकाब हुई है.

उत्तराखंड में अंकिता भंडारी को इंसाफ दिलाने के नाम पर शुरू की गई मुहिम अब पूरी तरह राजनीतिक रंग लेती दिखाई दे रही है. आरोप है कि प्रदेश की जनता की भावनाओं से जुड़े इस संवेदनशील मामले को विपक्षी दल 2027 के चुनावी रण की तैयारी के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं. अंकिता भंडारी हत्याकांड को मुद्दा बनाकर सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति अब साफ तौर पर सामने आ गई है.
इसी कड़ी में आज विपक्ष और कुछ अन्य दलों द्वारा उत्तराखंड बंद का आह्वान किया गया था, लेकिन यह बंद का ज्यादा असर नहीं दिखाई दिया. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा सीबीआई जांच की संस्तुति किए जाने के तुरंत बाद ही व्यापार मंडलों ने बंद से अपने हाथ खींच लिए. इसके चलते प्रदेशभर में जनजीवन सामान्य बना रहा और बाजार पूरी तरह खुले रहे.
कुछ दुकानों को प्रतीकात्मक रूप से किया गया बंद
जहां प्रदेश के अधिकांश जिलों में साप्ताहिक अवकाश नहीं था, वहां बाजार रोज की तरह खुले दिखे. वहीं राजधानी देहरादून में साप्ताहिक अवकाश होने के बावजूद पलटन बाजार समेत प्रमुख बाजारों में सामान्य रौनक नजर आई. कहीं-कहीं अंकिता को श्रद्धांजलि देने के लिए एक-दो मिनट के लिए कुछ दुकानों को प्रतीकात्मक रूप से बंद किया गया, लेकिन व्यापक स्तर पर बाजार बंद नहीं हुए.
राजनीतिक दल की सियासत का हिस्सा बनने को तैयार नहीं जनता
इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि उत्तराखंड की जनता अंकिता के साथ खड़ी है, लेकिन किसी भी राजनीतिक दल की सियासत का हिस्सा बनने को तैयार नहीं है. जनता की प्राथमिकता न्याय है, न कि राजनीतिक लाभ. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के फैसले के बाद लोगों में संतोष और भरोसे की भावना देखी गई.
सरकार के निर्णय ने विपक्ष की रणनीति को किया कमजोर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष लगातार इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन सरकार के स्पष्ट और निर्णायक कदम ने विपक्ष की रणनीति को कमजोर कर दिया है. सीबीआई जांच के आदेश के बाद से ही प्रदेश में खुशी और उम्मीद का माहौल है. कुल मिलाकर, अंकिता भंडारी मामले में सरकार की सक्रियता और संवेदनशीलता ने जनता का भरोसा मजबूत किया है, जबकि विपक्ष का बंद आह्वान जमीनी स्तर पर पूरी तरह विफल साबित हुआ.
Source: IOCL























