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कलाकार और किस्से: बस कंडक्टर से कॉमेडी किंग बनने की कहानी, जानें- जॉनी वाकर की अनसुनी बातें

हिंदी सिनेमा में एक ऐसा कलाकार जो अपनी अदाकारी से रोते हुए को हंसाने की ताकत रखता था। जिंदगी में किसी चेहरे पर मुस्कान लाना इतना आसान नहीं है, लेकिन यकीन मानिए इस कलाकार का नाम सुनते ही आपके होठों पर हंसी आ जाएगी।

जिंदगी में तीन दौर आते है, बचपन जवानी और बुढापा। इस कलाकार को हमेशा बचपन में जीना अच्छा लगता था। इस कलाकार को लगता था की बचपन सबसे ज्यादा हसीन और रंगीन होता है क्योंकि जवानी जब आती हैं तभी तो शादी होती है।

मेरा यार बना है दुल्हा और फूल खिले है दिल के

अरे मेरी भी शादी हो जाए दुआं करो सब मिल के

अब तो आप समझ ही गए होगें की हम किसकी बात कर रहें है। जी हां हम बात कर रहे है बॉलीवुड के मसखरे जॉनी वॉकर की। कॉमेडियन एक्टर जॉनी वॉकर किसी परिचय के मोहताज नहीं है, जॉनी वॉकर वो नाम है जो बॉलीवुड इंडस्ट्री में कंधे से कंधे मिलाकर चलता रहा है। बडे पर्दे पर फिल्म को जितनी तालियां मिलती थीं उससे कई ज्यादा तालियां इस अदाकार की अदाकारी को मिलती थीं। जॉनी वॉकर ने अपने मज़ाकिया अंदाज़ से न सिर्फ करोड़ों लोगो को हंसाया, बल्कि अपने 'चम्पी' वाले गाने से लोगों की सारी थकान भी उतारी है। जॉनी वॉकर ने अपने फिल्मी करियर में करीब 300 फिल्मों में काम किया है। हंसने का शौक जॉनी को बचपन से ही था और वो वजह थी उस दौर के कॉमेडी किंग नूर मोहम्मद। फिल्मों में अपनी खास अदाओं से मुस्कुराहट के फूल बिखेरने वाले हंसी के ये बादशाह अपनी निजी जिंदगी में बेहद कठिन इम्तिहान से गुज़रे है।

कलाकार और किस्से: बस कंडक्टर से कॉमेडी किंग बनने की कहानी, जानें- जॉनी वाकर की अनसुनी बातें

एक बस कंडक्टर बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी जो आगे जा कर बना फिल्म इंडस्ट्री का लीजेंडरी एक्टर। हिंदी फिल्म में कॉमेडी का एक नया अयाम इन्होने पेश किया। मोहम्मद रफी ने इनके लिए काफी गाने भी गाए थे और गुरुदत्त अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट बदल दिया करते थे जब जॉनी वॉकर इनकी फिल्म में काम किया करते थे। मध्य प्रदेश के इंदौर जिले में 11 नवम्बर 1923 को जन्मे जॉनी वॉकर का असली नाम बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी था, क्या आपको पता है उन्हें फ़िल्मी नाम जॉनी वॉकर गुरुदत्त ने दिया था। जॉनी वॉकर 1942 में अपने पिता जमालुदीन काजी के साथ मुम्बई आ गये। उनकी ख्वाहिश थी कि वो फिल्मो में काम करे और फिल्म स्टूडियो के बारे में जानकारी हासिल करे इसलिए उन्होंने बस कंडक्टर की नौकरी कर ली। नौकरी पाकर जॉनी वाकर काफी खुश हुए। खुश इसलिए हुए क्योंकि उन्हें मुफ्त में ही पूरी मुंबई घूमने को मौका मिल गया था। इसके साथ ही उन्हें मुंबई के स्टूडियो में भी जाने का मौका मिल जाया करता था।

कलाकार और किस्से: बस कंडक्टर से कॉमेडी किंग बनने की कहानी, जानें- जॉनी वाकर की अनसुनी बातें

इन्हीं दिनों में जॉनी वॉकर की मुलाकात फिल्म जगत के मशहूर खलनायक एन ए अंसारी और के आसिफ के सचिव रफीक से हुई। लंबे संघर्ष के बाद इनको फिल्म 'अखिरी पैमाने' में एक छोटा सा किरदार निभाने का मौका मिला। तभी एक्टर बलराज साहनी ने इनको गुरूदत्त से मिलने की सलाह दी। गुरूदत्त ने इनकी प्रतिभा से खुश होकर अपनी फिल्म बाजी में इन्हें काम करने का मौका दिया। इसके बाद जॉनी ने मुड़कर पीछे नहीं देखा।

कलाकार और किस्से: बस कंडक्टर से कॉमेडी किंग बनने की कहानी, जानें- जॉनी वाकर की अनसुनी बातें

चलिए आपको वो किस्सा बताते हैं जिसकी वजह से जॉनी को बाजी फिल्म में काम करने का मौका मिला। हुआ यूं कि 1951 में बनी नवकेतन की इस फिल्म में गुरुदत्त को एक शराबी की भूमिका के लिए कलाकार चाहिए था। फिल्म की कहानी बलराज साहनी ने लिखी थी। बलराज साहनी की मुलाकात बदरुद्दीन काजी से बस में हुयी थी उन्होंने उनको गुरुदत्त से मिलवाया और इस तरह गुरुदत्त को बाजी के लिए उस किरदार को निभाने के लिए शराबी मिल गया। जॉनी वॉकर ने हमेशा कॉमेडी किरदार को निभाना ही पसंद किया करते थे। हर फिल्म में कुछ नया करने की चाह ने उन्हें अपने आपको दोहराने से बचाए रखा। जॉनी वॉकर कहा करते थे कि “मुझे लोगो को हंसाने, गुदगुदाने में सुख मिलता है। वह साफ़ सुथरा और सादगी वाला मज़ाक पसंद करते थे। जॉनी अक्सर शराबी की भूमिकाओ में दिखाई देते थे, लेकिन आपको बता दे वो शराबी भूमिकाओ के लिए कभी भी शराब का सहारा नही लेते थे। यहां तक कि निजी जिन्दगी में भी उन्होंने कभी शराब नही पी, फिर भी उन्होंने शराबी की अनेक यादगार भूमिकाओ को पर्दे पर साकार किया था।

कलाकार और किस्से: बस कंडक्टर से कॉमेडी किंग बनने की कहानी, जानें- जॉनी वाकर की अनसुनी बातें

वॉकर जहां रोते को हंसाने की क्षमता रखते थे, वहीं अपनी बेहतरीन एक्टिंग से भावुक भी कर देते थे। कुछ ऐसा ही उन्होंने ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म 'आनंद' में कर दिखाया था। उनकी आखिरी फिल्म 14 साल के लंबे अंतराल के बाद आई और ये फिल्म थी 'चाची 420' जिसमें कमल हासन और तब्बू ने लीड रोल अदा किया था। जॉनी वॉकर ने फिल्मों में अपनी बेहतरीन अदाकारी का नमूना दिखाने के अलावा कुछ गीत भी गए थे। उन्होंने फिल्म बनाने की भी सोची थी, लेकिन बाद में इस विचार को उन्होने रद्द कर दिया था। इसी फिल्‍मी सफर के बीच में वॉकर साहब को नूरजहां से प्‍यार हो गया। जॉनी वॉकर ने परिवार की मर्जी के बिना नूरजहां से शादी कर ली। दोनों की मुलाकात 1955 में फिल्म 'आर पार' के सेट पर हुई थी, जिसका एक गीत नूर और वॉकर पर फिल्माया जाना था। इस गीत के बोल थे 'अरे ना ना ना ना तौबा तौबा। फिल्म मधुमति और शिकार के लिए उन्हें दो बार फिल्मफेयर अवॉर्ड से नवाज़ा भी गया था। 70 के दशक में जॉनी वॉकर ने फिल्मों में काम करना काफी कम कर दिया क्योंकि उनका मानना था कि फिल्मों में कॉमेडी का स्तर काफी गिर गया है। उम्रभर दर्शकों को हंसाने वाले वॉकर अपने लंबे सिनेमा करियर में कई फिल्मों में काम किया। अपने खास अंदाज़ और हाव भाव से लगभग 4 दशक तक दर्शको का मनोंरंजन करने वाले महान हास्य कलाकार जॉनी वॉकर 29 जुलाई 2003 को इस दुनिया से रुखसत हो गए। आज भी उनके दीवानों की कोई कमी नहीं है। यही तो होता है कलाकार जो हमेशा लोगों के दिलों में राज करता है।

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