Punjab News: बेहतर भविष्य की तलाश में रूस गया था लुधियाना का युवक, 8 महीने बाद ताबूत में लौटा घर
Punjab News In Hindi: लुधियाना का 21 वर्षीय समरजीत सिंह 8 महीने पहले रूस गया था, लेकिन नौकरी के झांसे में कथित तौर पर युद्ध में भेज दिया गया. अब उसका शव घर पहुंचा.

- सितंबर 2025 से लापता, 8 महीने बाद घर शव पहुंचा.
पंजाब के लुधियाना का 21 वर्षीय युवक समरजीत सिंह बेहतर भविष्य और परिवार की मदद के सपनों के साथ पिछले साल रूस गया था. लेकिन 8 महीने बाद उसका शव घर पहुंचा तो पूरे परिवार और इलाके में मातम छा गया. शुक्रवार (14 मार्च) को लुधियाना के डाबा इलाके में समरजीत का अंतिम संस्कार किया गया.
नौकरी का झांसा देकर रूस भेजे जाने का आरोप
परिवार के अनुसार, समरजीत सिंह जुलाई 2025 में कुछ भर्ती एजेंटों के जरिए रूस गए थे. एजेंटों ने उन्हें अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी का भरोसा दिया था. लेकिन परिवार का आरोप है कि वहां पहुंचने के बाद उन्हें जबरन रूसी सेना में भर्ती कर लिया गया.
परिजनों का कहना है कि समरजीत को किसी तरह का सैन्य प्रशिक्षण भी नहीं दिया गया और सीधे युद्ध के मोर्चे पर भेज दिया गया. परिवार को इस बात का पता तब चला जब समरजीत ने वहां से फोन कर अपनी परेशानी बताई थी.
सितंबर के बाद हो गए थे लापता
परिवार के मुताबिक, समरजीत से उनकी आखिरी बार सितंबर 2025 में बात हुई थी. इसके बाद वह युद्ध क्षेत्र में लापता हो गए थे. कई महीनों तक परिवार को उनकी कोई खबर नहीं मिली.
गुरुवार को उनके पार्थिव अवशेष नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पहुंचे. वहां से शव को लुधियाना लाया गया, जहां शुक्रवार को उनका अंतिम संस्कार किया गया. जैसे ही शव घर पहुंचा, परिवार और आसपास के लोगों की आंखें नम हो गईं.
पिता की भावुक अपील
समरजीत के पिता चरणजीत सिंह अपने बेटे की चिता के पास खड़े होकर लोगों से भावुक अपील करते नजर आए. उन्होंने कहा कि एजेंटों के झूठे वादों में आकर अपने बच्चों को विदेश न भेजें. अमरापुरी इलाके में छोटी किराना दुकान चलाने वाले चरणजीत सिंह ने कहा कि आर्थिक तंगी के कारण ही उनका बेटा विदेश गया था.
उन्होंने कहा कि अगर यहां रोजगार के अच्छे अवसर होते तो मेरा बेटा कभी विदेश नहीं जाता. वह सिर्फ परिवार की मदद करना चाहता था.
रोते हुए पिता ने कहा कि उन्हें आज तक यह भी नहीं पता कि उनके बेटे के आखिरी पल कैसे बीते. परिवार ने यह भी बताया कि बेटे के लापता होने के बाद उन्होंने महीनों तक अधिकारियों से मदद मांगी, लेकिन उन्हें कोई ठोस सहायता नहीं मिल सकी.
Source: IOCL


























