ईरान-इजरायल युद्ध की मार: कश्मीर की सदियों पुरानी पेपर-मैशे कला पर संकट, ऑर्डर ठप
Jammu Kashmir News In Hindi: ईरान-इजरायल के बीच चल रहे युद्ध के बीच कश्मीर की सदियों पुरानी कला पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. पारंपरिक कला पेपर-मैशे के ऑर्डर ठप हो गए हैं.

कश्मीर में लंबे और कई परतों वाले इतिहास वाली पारंपरिक कला पेपर-मैशे का भविष्य अब अंधकारमय नजर आ रहा है, क्योंकि खाड़ी में चल रहे युद्ध को अब दूसरा महीना शुरू हो गया है. न सिर्फ नए ऑर्डर आने बंद हो गए हैं, बल्कि युद्ध के जारी रहने से दुनिया भर में इन चीजों के निर्यात पर भी बुरा असर पड़ा है.
14वीं सदी में ईरानी सूफी संत मीर सैयद अली हमदानी ने सबसे पहले पेपर-मैशे की कला को कश्मीर में पेश किया था. बाद में 15वीं सदी में सुल्तान जैन-उल-आबिदीन के शासनकाल में इसे काफी शोहरत मिली.
कागज की लुगदी से तराशे गए सामान
सदियों से कारीगरों ने कागज की साधारण लुगदी को बेहद बारीकी से तराशी गई चीजों में बदल दिया है. जिनमें मुखौटे और खिलौनों से लेकर सजावटी सामान और क्रिसमस की सजावट की चीजें शामिल हैं.
हाल के सालों में निर्यात पर इस निर्भरता की वजह से यह कला वैश्विक उथल-पुथल के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो गई है. पहले 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से और अब ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध के चलते शिपमेंट में देरी और ऑर्डर में कमी आने की वजह से.
क्या बोले कारीगर और निर्यातक?
निर्यातकों और कारीगरों, दोनों का कहना है कि जिन इलाकों और देशों को वे कभी भरोसेमंद मानते थे, वहां अब देरी, ज्यादा लागत और अनिश्चितता का माहौल बन गया है. यह कला कभी मुख्य रूप से स्थानीय घरों की जरूरतों को पूरा करती थी, जहां इसके उत्पादों का इस्तेमाल सजावट, रस्मों-रिवाजों और सामान रखने के लिए किया जाता था.
उन्होंने आगे बताया कि अब युद्ध की वजह से हम एक संभावित तबाही का सामना कर रहे हैं. फिदा हुसैन मीर कहते हैं कि पिछले पाँच दशकों से इस बारीक कला पर काम कर रहे हैं. उन्होंने एक दशक से भी ज्यादा समय ऐसी नाजुक और हाथ से पेंट की गई चीजें बनाने में बिताया है, जो कश्मीर की सीमाओं को पार करके लंदन, फ्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका के बाजारों तक पहुंची हैं.
नियमित हो गए हैं ऑर्डर
उन्होंने बताया कि ऑर्डर का जो सिलसिला पहले एक तय चक्र के हिसाब से चलता था, वह अब अनियमित हो गया है. युद्ध की वजह से अंतरराष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ने के कारण कुछ शिपमेंट में देरी हुई है, तो कुछ पूरी तरह रद्द ही हो गए हैं.
उनका कहना है कि इससे भी कारोबार को उतना बड़ा झटका नहीं लगा था, क्योंकि डीलर धीरे-धीरे क्रिसमस के समय तक अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहे थे. उस समय सबसे ज्यादा ऑर्डर आते हैं.
फिदा हुसैन मीर ने आगे बताया हमारा ज्यादातर काम सर्दियों की शुरुआत के साथ ही शुरू हो जाता है, खासकर क्रिसमस से ठीक पहले. यही वह समय होता है जब हम सांता क्लॉज की मूर्तियां, घंटियां, तारे, क्रिसमस बॉल्स और दूसरी सजावटी चीजें बनाना शुरू करते हैं.
'युद्ध से काम पर पड़ रहा बुरा असर'
वर्कशॉप में काम करने वाले कारीगर बशीर अहमद बताते हैं कि युद्ध की वजह से उनके काम पर बुरा असर पड़ा है. आमतौर पर ऑर्डर मार्च की शुरुआत से ही आने लगते हैं और सितंबर तक भेज दिए जाते हैं, लेकिन अब जब युद्ध के थमने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं, तो क्रिसमस के मौसम में होने वाले कारोबार को भारी नुकसान पहुंचने की आशंका है.
ईरान युद्ध से पहले जब कारीगर इन अनिश्चितताओं के साथ तालमेल बिठाना शुरू ही कर रहे थे तभी 2025 में एक नई चुनौती सामने आ गई. संयुक्त राज्य अमेरिका में भारतीय हस्तशिल्प पर 50 प्रतिशत का आयात शुल्क लगा दिया गया.
अब जब वह खतरा कुछ कम हुआ था, तो खाड़ी युद्ध ने कारीगरों को और भी बुरी तरह प्रभावित किया है. जैसे-जैसे हर बीतते दिन के साथ युद्ध और तेज होता जा रहा है, फिदा हुसैन और अन्य कारीगर शांति के लिए प्रार्थना कर रहे हैं. फिदा कहते हैं कि युद्ध किसी का भी भला नहीं करता.
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