CAG रिपोर्ट ने खोली बिहार के वित्तीय प्रबंधन की पोल, 77 हजार करोड़ रुपये का बजट नहीं हुआ खर्च
Bihar News In Hindi: बिहार विधानमंडल के मानसून सत्र के दौरान पेश की गई CAG की रिपोर्ट में बजट खर्च और विकास योजनाओं कई सवाल उठ रहे हैं. यह स्थिति पिछले साल की तुलना में और गंभीर हुई है.

बिहार विधानमंडल के मानसून सत्र के दौरान पेश की गई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में राज्य के वित्तीय प्रबंधन, बजट खर्च और विकास योजनाओं को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं. रिपोर्ट के अनुसार, बिहार का बजट साल 2020-21 में 2,45,522.62 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 3,64,518.87 करोड़ रुपये हो गया, लेकिन इसके बावजूद बजट का बड़ा हिस्सा खर्च नहीं हो सका.
साल 2024-25 में कुल बजट प्रावधान के मुकाबले राज्य सरकार ने 2,87,178.49 करोड़ रुपये ही खर्च किए, जबकि 77,340.38 करोड़ रुपये यानी करीब 21.22 प्रतिशत राशि बिना खर्च के बची रही. इसके अलावा, 31 मार्च 2025 तक विभिन्न विभागों द्वारा खर्च की गई लगभग 93,132.75 करोड़ रुपये की राशि से जुड़े 62,632 उपयोगिता प्रमाण पत्र (यूसी) जमा नहीं किए गए हैं.
पंचायती राज विभाग के सबसे अधिक लंबित उपयोगिता प्रमाण पत्र
यह स्थिति पिछले साल की तुलना में और गंभीर हुई है, क्योंकि साल 2024 में 70,876.61 करोड़ रुपये से संबंधित 49,649 उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित थे, जो साल 2025 में बढ़कर 93,132.75 करोड़ रुपये के 62,632 प्रमाण पत्र तक पहुंच गए. रिपोर्ट ने सरकारी खर्च की निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं.
सबसे अधिक लंबित उपयोगिता प्रमाण पत्र पंचायती राज विभाग के हैं, जहां लगभग 32 हजार करोड़ रुपये का हिसाब लंबित है, इसके बाद शिक्षा विभाग के करीब 19 हजार करोड़ रुपये, नगर विकास एवं आवास विभाग के लगभग 17.8 हजार करोड़ रुपये, ग्रामीण विकास विभाग के 6.4 हजार करोड़ रुपये और स्वास्थ्य विभाग के करीब 3 हजार करोड़ रुपये से संबंधित उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा नहीं किए गए हैं.
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अपेक्षित केंद्रीय हिस्सेदारी की तुलना में कम राशि की गई स्थानांतरित
साल 2024-25 के दौरान केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए अपेक्षित केंद्रीय हिस्सेदारी की तुलना में 441.29 करोड़ रुपये कम राशि स्थानांतरित की गई. साथ ही राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों का लगभग 48 प्रतिशत हिस्सा प्रतिबद्ध व्यय और सब्सिडी पर खर्च होने की बात कही गई है, जिसके कारण विकास योजनाओं और पूंजीगत परियोजनाओं के लिए अपेक्षाकृत कम संसाधन उपलब्ध रहे.
रिपोर्ट के अनुसार, साल 2024-25 में बिहार का राजकोषीय घाटा सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का 4.16 प्रतिशत रहा, जो निर्धारित 3.5 प्रतिशत की सीमा से अधिक है. साल 2024-25 में राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों का 48 प्रतिशत हिस्सा प्रतिबद्ध व्यय और सब्सिडी पर खर्च हुआ, इसके कारण विकास योजनाओं और पूंजीगत व्यय के लिए केवल 52 प्रतिशत संसाधन उपलब्ध रह गए हैं.
लंबित उपयोगिता प्रमाण पत्रों को लेकर वित्त विभाग से मांगा था स्पष्टीकरण
बता दें यूसी वे अनिवार्य दस्तावेज होते हैं, जिसके जरिये विभाग बताते हैं कि उन्हें मिली अनुदान राशि का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए किया गया है. नियमानुसार 18 माह के भीतर यूसी जमा होना चाहिए, इसके लंबित रहने पर धन के गबन, विचलन या धोखाधड़ी का जोखिम बढ़ता है.
कैग ने रिपोर्ट में बताया कि लंबित उपयोगिता प्रमाण पत्रों को लेकर वित्त विभाग से स्पष्टीकरण मांगा गया था, लेकिन जनवरी 2026 तक विभाग की ओर से कोई जवाब उपलब्ध नहीं कराया गया. बुधवार (22 जुलाई) को वित्त मंत्री व जदयू वरिष्ठ नेता बिजेंद्र प्रसाद यादव ने सदन के पटल पर रिपोर्ट रखी, मगर वे रिपोर्ट जिस वक्त कि थी, उस समय बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार थे.
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