आरक्षण पर बिहार में सियासत तेज, चिराग पासवान के बाद क्या बोले उपेंद्र कुशवाहा?
चिराग पासवान ने आरक्षण को संवैधानिक अधिकार बताते हुए इसकी समीक्षा का भी विरोध किया. वहीं उपेंद्र कुशवाहा ने बिहार में जातीय सर्वे के आधार पर 65 फीसदी आरक्षण की सीमा बढ़ाने की पैरवी की है.

दिल्ली के जंतर-मंतर पर 21-22 अगस्त 2026 को सवर्ण और जनरल कैटेगरी के युवाओं, छात्रों व विभिन्न संगठनों के प्रदर्शन के बाद आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर सियासत के केंद्र में आ गया है. प्रदर्शनकारियों ने जाति आधारित आरक्षण की जगह आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने की मांग उठाई. इस बीच लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के सांसद चिराग पासवान और आरएलएम प्रमुख एवं सांसद उपेंद्र कुशवाहा के बयानों ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है.
चिराग पासवान ने एक्स पर एक वीडियो साझा करते हुए कहा कि उन्होंने 10 फरवरी 2020 को संसद में भी स्पष्ट रूप से कहा था कि आरक्षण किसी को दी गई खैरात नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है. उन्होंने कहा कि उनकी और उनकी पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) की सोच इस मुद्दे पर बिल्कुल स्पष्ट है. आरक्षण को समाप्त करने की बात तो दूर, आरक्षण की समीक्षा भी उन्हें कभी स्वीकार्य नहीं होगी.
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चिराग ने सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी पार्टी की प्रतिबद्धता को अटूट बताया. उनके बयान को जंतर-मंतर पर हुए आरक्षण विरोधी प्रदर्शन के बीच महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रतिक्रिया के तौर पर देखा जा रहा है.
मैंने 10 फरवरी 2020 को देश की संसद में भी स्पष्ट रूप से कहा था कि आरक्षण किसी को दी हुई खैरात नहीं, बल्कि एक संवैधानिक अधिकार है।
— युवा बिहारी चिराग पासवान (@iChiragPaswan) August 23, 2026
मेरी और मेरी पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) की सोच बिल्कुल स्पष्ट है—आरक्षण को समाप्त करने की बात तो दूर, आरक्षण की समीक्षा भी हमें कभी… pic.twitter.com/MYYKaTB8Yg
उपेंद्र कुशवाहा ने 65% आरक्षण पर क्या कहा?
वहीं आरएलएम प्रमुख और सांसद उपेंद्र कुशवाहा ने बिहार में आरक्षण की सीमा बढ़ाने के फैसले का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार ने सोच-समझकर बिहार में जातीय सर्वे कराया था और उससे सामने आए आंकड़ों के आधार पर तत्कालीन सरकार ने ओबीसी के लिए 65 प्रतिशत आरक्षण की सीमा बढ़ाने का निर्णय लिया. कुशवाहा ने कहा कि यह मामला कोर्ट में जाकर रुक गया था, लेकिन अब नीतीश कुमार के काम को आगे बढ़ाने की जरूरत है. उनके बयान से साफ है कि वह बिहार में बढ़ी आरक्षण सीमा के मुद्दे को आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं.
#WATCH पटना (बिहार): RLM प्रमुख और सांसद उपेन्द्र कुशवाहा ने कहा, " निश्चित रूप से नीतीश कुमार जी ने बहुत सोच समझकर बिहार में सर्वे का काम कराया था उससे जो आंकड़ा आया था उस आंकड़ों के आधार पर निर्णय नीतीश जी के नेतृत्व वोली सरकार ने ली है कि बिहार में OBC के लिए 65% आरक्षण की… pic.twitter.com/XXFHKGJO8a
— ANI_HindiNews (@AHindinews) August 23, 2026
जंतर-मंतर पर आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग
दरअसल, दिल्ली के जंतर-मंतर पर 21 और 22 अगस्त को सवर्ण तथा जनरल कैटेगरी के युवाओं, छात्रों और कई संगठनों ने प्रदर्शन किया था. प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग थी कि आरक्षण का आधार जाति के बजाय आर्थिक स्थिति को बनाया जाए. आंदोलन की शुरुआत सोशल मीडिया के एक इंस्टाग्राम पेज से होने की बात सामने आई है, जिसके लाखों फॉलोअर्स बताए जा रहे हैं. प्रदर्शनकारियों ने सभी वर्गों में आर्थिक आधार पर आरक्षण और क्रीमी लेयर लागू करने की मांग उठाई.
'एक परिवार, एक आरक्षण' समेत कई मांगें
प्रदर्शनकारियों ने 'एक परिवार, एक आरक्षण' नीति लागू करने, एससी, एसटी और ओबीसी की आरक्षण सूचियों की समीक्षा करने जैसी मांगें भी रखीं. कुछ प्रदर्शनकारियों ने एससी/एसटी एक्ट में बदलाव या उसे खत्म करने और यूजीसी के नए इक्विटी नियमों को वापस लेने की मांग भी उठाई. प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया था. अब चिराग पासवान के आरक्षण को संवैधानिक अधिकार बताए जाने और उपेंद्र कुशवाहा के बिहार में 65 प्रतिशत आरक्षण की सीमा के समर्थन के बाद यह मुद्दा राजनीतिक रूप से और गर्म हो गया है.
आने वाले समय में आरक्षण का सवाल बिहार की राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ा मुद्दा बन सकता है. खासकर तब, जब एक ओर आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग जोर पकड़ रही है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दल संवैधानिक आरक्षण व्यवस्था को बनाए रखने की बात कर रहे हैं.





















