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बिहार में 36% अति पिछड़ा जाति, फिर भी CM पद क्यों नहीं? सवर्ण और OBC का रहा बोलबाला, कब खत्म होगा EBC का इंतजार?

Bihar Politics: 22 मार्च 1912 को बिहार राज्य का गठन हुआ, जिसके बाद 24 मुख्यमंत्री बने. इनमें सिर्फ एक EBC के CM बने, लेकिन कार्यकाल पूरा नहीं किया. आखिर कब खत्म होगा सत्ता का इंतजार?

बिहार की राजनीति में जाति हमेशा से सबसे बड़ा फैक्टर रही है. आजादी के बाद से अब तक राज्य में 24 लोग मुख्यमंत्री बने हैं. शुरुआती 37 सालों यानी 1947-1984 में अपर कास्ट (सवर्ण) जातियों का बोलबाला था. इनमें ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत और कायस्थ जैसे वर्गों के 12 मुख्यमंत्री बने, जिन्होंने कुल 37 साल 197 दिन तक सत्ता संभाली. इनमें श्रीकृष्ण सिंह (भूमिहार) ने सबसे लंबा 17 साल 52 दिन शासन किया. इसके बाद हवा चली पिछड़ा वर्ग (OBC) और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) की, लेकिन अति पिछड़ा वर्ग की झोली में कुछ नहीं आया. तो इस जातिवर्ग को सत्ता में आने के लिए कितना लंबा इंतजार करना पड़ेगा? जानते हैं एक्सप्लेनर में...

सवाल 1: बिहार में पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग की लहर कब शुरू हुई?
जवाब: 1990 के बाद मंडल आयोग और सामाजिक न्याय की लहर आई. पिछड़े वर्ग (OBC) और अति पिछड़ा (EBC) का दौर शुरू हुआ. पिछले 35 साल 89 दिन से OBC और EBC वर्ग के 7 मुख्यमंत्री रहे, जिनमें लालू प्रसाद यादव (यादव), राबड़ी देवी (यादव), नीतीश कुमार (कुर्मी) और कर्पूरी ठाकुर (EBC) प्रमुख हैं. कुल मिलाकर OBC और EBC ने 35 साल 89 दिन सत्ता चलाई, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि EBC यानी अति पिछड़ा वर्ग से सिर्फ 2 बार कर्पूरी ठाकुर (1970-71 और 1977-79) मुख्यमंत्री बने, वो भी छोटे-छोटे कार्यकाल के लिए. दलितों (SC) से तीन CM बने, लेकिन कोई भी एक साल भी नहीं टिका.

 

कर्पुरी ठाकुर बिहार के इकलौते EBC मुख्यमंत्री हैं
कर्पुरी ठाकुर बिहार के इकलौते EBC मुख्यमंत्री हैं

सवाल 2: बिहार में OBC और EBC में क्या फर्क है और EBC की तादाद कितनी है?
जवाब: 2023 के बिहार जातीय सर्वेक्षण के मुताबिक, बिहार में पूरे OBC 63% हैं, जिसमें EBC (अति पिछड़ा) 36% और ऊपरी OBC (यादव, कुर्मी, कुशवाहा आदि) करीब 27% हैं. EBC में 112 जातियां शामिल हैं. इनमें धनुक, हज्जाम, कहार, मल्लाह, निशाद और तेली आदि हैं. इनमें 24 मुस्लिम EBC (पसमांदा) भी हैं. ये 112 जातियां छोटी-छोटी हैं, कोई एक बड़ी लीडरशिप वाली नहीं है. कुल आबादी में EBC सबसे बड़ा समूह है, लेकिन विधानसभा में इनकी हिस्सेदारी कभी 10% से ऊपर नहीं गई. ये बिखरी हुई है. कोई एक नेता या पार्टी इन्हें पूरी तरह अपने कब्जे में नहीं ले पाई.

बिहार का जातीय सर्वेक्षण कहता है कि यादव 14.26%, कुशवाहा 4.21% और कुर्मी 2.87% जैसी ऊपरी OBC जातियां संख्या में कम हैं, लेकिन संगठित हैं. ये RJD (यादव) और JDU/BJP (कुर्मी-कुशवाहा) का कोर वोट बैंक हैं. EBC 36% हैं, लेकिन 112 जातियों में बंटे होने से कोई एक चेहरा नहीं उभर सका है. सभी पार्टियां EBC वोट लेने के लिए पंचायत स्तर पर आरक्षण, महादलित योजना और EBC आयोग बनाकर काम करती रहीं, लेकिन मुख्यमंत्री पद हमेशा ऊपरी OBC या अपर कास्ट को दिया गया. नीतीश कुमार ने 2005 में EBC आयोग बनाया, पंचायतों में 20% EBC आरक्षण दिया और महादलित कैटेगरी बनाई, लेकिन CM पद खुद कुर्मी यानी ऊपरी OBC को रखा.

सवाल 3: 36 साल में बिहार की सियासत में EBC का क्या रोल रहा?
जवाब: 1990 से 2026 तक बिहार में OBC का बोलबाला रहा. लालू-राबड़ी का 14 साल यादव राज चला. नीतीश कुमार का 19 साल 231 दिन कुर्मी राज चला. 2025 विधानसभा चुनाव में NDA (BJP-JDU) ने 202 सीटें जीतीं. नीतीश फिर CM बने, लेकिन मार्च 2026 में उन्होंने राज्यसभा जाने का फैसला किया और 10 अप्रैल 2026 को शपथ ले ली. 15 अप्रैल 2026 को सम्राट चौधरी (कुशवाहा) बिहार के नए मुख्यमंत्री बने. जो BJP के पहले बिहार के CM भी हैं.
  
यानी पहले अपर कास्ट, फिर यादव, फिर कुर्मी और अब कुर्मी का भाई कुशवाहा. EBC का नंबर अभी भी नहीं आया. EBC बिखरी होने से पार्टियां इन्हें वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल करती हैं, लेकिन टॉप पोस्ट पर ऊपरी OBC को तरजीह देती हैं. BJP ने भी EBC चेहरे जैसे प्रेम कुमार (कहार) या संजीव चौरसिया को चर्चा में रखा, लेकिन सम्राट चौधरी (कुशवाहा) को चुना.

सवाल 4: EBC को अपना सियासी हक पाने के लिए और कितना इंतजार करना पड़ेगा?
जवाब: EBC की तादाद ज्यादा है, लेकिन संगठन और एकजुट नेतृत्व की कमी है. 112 जातियां अलग-अलग मुद्दों पर लड़ती हैं. कोई कर्पूरी ठाकुर जैसा EBC लीडर अभी नहीं उभरा जो पूरे वर्ग को जोड़ सके. सभी पार्टियां RJD, JDU और BJP EBC को पंचायत और मंत्री पद देकर खुश रखती हैं, लेकिन CM पद पर यादव, कुर्मी या कुशवाहा जैसे मजबूत वोट बैंक वाली जातियों को प्राथमिकता देती हैं. 2025 चुनाव और 2026 में नीतीश के बाद भी EBC को सिर्फ सहयोगी बनाकर रखा गया.

पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई कहते हैं, 'अभी बिहार में यादव-कुशवाहा-कुर्मी का त्रिकोण सत्ता में मजबूत है. EBC को अपना हक पाने के लिए या तो कोई नया EBC चेहरा उभरना होगा या सभी 112 जातियों का एक मंच बनना होगा. फिलहाल इंतजार जारी है. बिहार की सियासत 36 साल से OBC के हाथ में है, लेकिन EBC अभी भी सत्ता के शिखर से दूर है. जातीय सर्वेक्षण ने EBC की संख्या साबित कर दी, लेकिन सत्ता का गणित अभी भी ऊपरी OBC के पक्ष में है.'

 

बिहार में EBC को लीडरशिप की जरूरत है
बिहार में EBC को लीडरशिप की जरूरत है

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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