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मुश्किल हालात से गुजर रहा पाकिस्तान, रिपोर्ट से चौंकाने वाला खुलासा

पाकिस्तान की सेना में 65 प्रतिशत से ज्यादा अधिकारी और सैनिक मध्य और उत्तरी पंजाब से आते हैं. सेना के गठन में पंजाब का पलड़ा भारी होने से पाकिस्तान के दूसरे प्रांतों में वंचित होने की भावना बढ़ती है.

पाकिस्तान मुश्किल हालात से गुजर रहा है, क्योंकि पंजाब, जो देश का सबसे ज्यादा आबादी वाला प्रांत है, अपनी दबदबे वाली स्थिति छोड़ने को तैयार नहीं है. एक रिपोर्ट में बताया गया है कि न्यायपालिका, नौकरशाही, सेना और सुरक्षा एजेंसियों में भारी प्रतिनिधित्व के कारण पंजाब पाकिस्तान में सत्ता का केंद्र बना हुआ है.

मूनिस अहमार ने 'द फ्राइडे टाइम्स' की एक रिपोर्ट में कहा, पाकिस्तान के बनने से लेकर आज तक पंजाब का सत्ता पर जो कब्जा रहा है, उसका मतलब है मध्य पंजाब का ज्यादा आबादी वाला और समृद्ध इलाका. ऐसा इसलिए है क्योंकि दक्षिणी सराइकी इलाके को हाशिए पर रखा गया है. 

पाकिस्तान की बदतर हुई स्थिति

यह इलाका प्रांतीय दर्जा चाहता है, लेकिन लाहौर इसे मंजूरी नहीं देता. पंजाब के मुख्यमंत्री ने कुछ दिन पहले कहा था कि पाकिस्तान के पड़ोसी देश नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं, बल्कि बलूचिस्तान और केपीके पंजाब को नुकसान पहुंचा रहे हैं. यह एक गंभीर आरोप है.

पाकिस्तान की सेना में 65 प्रतिशत से ज्यादा अधिकारी और सैनिक मध्य और उत्तरी पंजाब से आते हैं. सेना के गठन में पंजाब का पलड़ा भारी होने से पाकिस्तान के दूसरे प्रांतों में वंचित होने की भावना बढ़ती है. इसके अलावा, केंद्रीय नौकरशाही में भी मध्य पंजाब का प्रतिनिधित्व काफी ज्यादा है, जो पाकिस्तान के दूसरे प्रांतों की तुलना में सेना और नौकरशाही में पंजाब के दबदबे को दिखाता है. 

इसी तरह, उच्च न्यायपालिका में ज्यादातर जज पंजाब से आते हैं, जबकि कॉर्पोरेट सेक्टर में पंजाब के उद्योगपतियों और निवेशकों का दबदबा है. पंजाब और पाकिस्तान के दूसरे प्रांतों के बीच सत्ता का असंतुलन भी दिखता है. आलोचकों के अनुसार, पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) के नेतृत्व वाला मध्य पंजाब यह पक्का करना चाहता है कि उसका इलाका पंजाब पर अपना दबदबा बनाए रखे और यह दबदबा बलूचिस्तान, सिंध और खैबर पख्तूनख्वा तक भी फैले. 

पीएमएल-एन पंजाब के बंटवारे का समर्थन नहीं करती, लेकिन खैबर पख्तूनख्वा और सिंध के बंटवारे के पक्ष में है. जून में एक रिपोर्ट में बताया गया था कि पंजाब प्रांत को पाकिस्तान के 1991 के जल बंटवारा समझौते के तहत पानी का सबसे बड़ा हिस्सा मिलने के बावजूद उसने दूसरे प्रांतों के हिस्से के पानी पर भी कब्जा करना जारी रखा. ऐसा ऊपरी इलाके में होने के फायदे, पानी की माप में पारदर्शिता की कमी और समझौते को ठीक से लागू न करने की वजह से हुआ. 

सिंध, बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पंजाब प्रांतों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर अक्सर टकराव होता रहा है. वे इस्लामाबाद में बैठी संघीय सरकार पर पंजाब का पक्ष लेने का आरोप लगाते हैं, जबकि पंजाब को सिंधु के अलावा पांच और नदियों से पानी मिलता है. एथेंस स्थित 'डायरेक्टस' की एक रिपोर्ट के अनुसार, वे इस मुद्दे को संघीय शासन की लंबे समय से चली आ रही विफलता के तौर पर देखते हैं. 

रिपोर्ट से बड़ा खुलासा

रिपोर्ट में बताया गया है कि पानी के बंटवारे की समस्या अब सिर्फ तकनीकी मतभेदों तक सीमित नहीं रही है, बल्कि यह एक गंभीर राजनीतिक संकट बन गई है, जिससे केंद्र और प्रांतों के बीच गहरे अविश्वास का पता चलता है. हालांकि, पानी के बंटवारे की समस्याओं का एक ऐतिहासिक बैकग्राउंड रहा है, लेकिन 2025 की चोलिस्तान नहर परियोजना ने अन्याय की भावना को और पक्का कर दिया है. यह गुस्सा पंजाब प्रांत के प्रति है, जो समृद्ध और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली है. 

सिंधु नदी पर निर्भर अन्य प्रांतों को डर है कि उनके हितों की बलि दी जा रही है क्योंकि प्रशासन के बजाय राजनीतिक सत्ता को प्राथमिकता दी जा रही है. रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान का सिंधु नदी प्रणाली प्राधिकरण (आईआरएसए) दक्षिण की ओर पानी के बहाव को सीमित कर रहा है, जिससे निचले इलाकों के प्रांतों में खेती, पीने के पानी की आपूर्ति, आर्थिक विकास और सिंधु डेल्टा के पारिस्थितिक संरक्षण पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता बढ़ गई है.

सिंध ने आईआरएसए पर अनुचित बंटवारे का आरोप लगाया है क्योंकि यह प्रांत सिंधु के पानी पर सबसे ज्यादा निर्भर है. रिपोर्ट के अनुसार, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा को और भी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, और उनकी शिकायतों को काफी हद तक नजरअंदाज कर दिया गया है. बलूचिस्तान लंबे समय से पानी के असमान बंटवारे, पानी की आपूर्ति में देरी और पानी के आवंटन के फॉर्मूले में संरचनात्मक खामियों की शिकायत करता रहा है.

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