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ईरान पर हमले से पहले अकेले पड़ गए डोनाल्ड ट्रंप, भारी पड़ेगी खामेनेई की सेना?

अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को बंद कर दे और ऐसी कोई भी मिसाइल ईरान के पास न हो, जिसकी रेंज ईरान के बाहर दूसरे देशों तक हो, जो परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम हों.

डील और टैरिफ, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दो ऐसे पसंदीदा शब्द, जिसके जरिए उन्होंने दुनिया को मुट्ठी में करने का सपना देखा. कुछ देशों से डील करके अपनी बात मनवाई तो कुछ देशों पर टैरिफ लगाकर झुकने को मज़बूर कर दिया, लेकिन ईरान ना तो ट्रंप के टैरिफ से झुका है और न ही ट्रंप की डील मानने को वो तैयार है. तो अब ट्रंप 10-15 दिन में ईरान पर हमले की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन इस हमले से ठीक पहले ट्रंप को ऐसा झटका लगा है कि वो अलग-थलग पड़ गए हैं और अगर ऐसे ही हालात रहे तो ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई और उनकी सेना अमेरिका पर बहुत भारी पड़ने वाली है और इस जंग का लंबा खिंचना भी तय है.  

अमेरिका ईरान से तीन डील करना चाहता है-

परमाणु हथियार

अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम को बंद कर दे और वो किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार न बनाए. इसके लिए अमेरिका ने शर्त रखी है कि ईरान यूरेनियम का संवर्धन बंद करे और उसके पास जो भी यूरेनियम का भंडार है उसे वो या तो नष्ट कर दे या फिर ईरान के बाहर भेज दे.  साथ ही अमेरिका की शर्त ये भी है कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी कि IAEA के लोग कभी भी बिना बताए ईरान के किसी भी सैन्य या परमाणु ठिकाने की जांच कर सकें.

बैलिस्टिक मिसाइल

अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को बंद कर दे और ऐसी कोई भी मिसाइल ईरान के पास न हो, जिसकी रेंज ईरान के बाहर दूसरे देशों तक हो, जो परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम हों.

प्रॉक्सी वॉर

अमेरिका चाहता है कि ईरान मध्य एशिया में यमन के हूती, लेबनान के हिजबुल्लाह और फिलिस्तीन के हमास को जो सैन्य और वित्तीय मदद देता है, उसे वो पूरी तरह से बंद करे.

ईरान किन शर्तों पर राजी?

ईरान परमाणु हथियारों पर समझौता करने के लिए तो राजी है. लेकिन वो न तो बैलिस्टिक मिसाइल का कार्यक्रम रोकने को तैयार है और न ही हूती, लेबनान और हिजबुल्लाह को दी जा रही मदद पर समझौते के लिए तैयार है. नतीजा ये है कि ट्रंप नाराज हो गए हैं और ईरान को चेतावनी दे दी है कि अगर 10-15 दिनों में ईरान राजी नहीं होता है तो उसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे.

इस गंभीर परिणाम का सीधा मतलब जंग है. लेकिन अमेरिका के लिए ये जंग अब इतनी आसान नहीं रहने वाली है, क्योंकि अमेरिका के ही दोस्त ने उसे गच्चा दे दिया है. अमेरिका अगर ईरान से जंग करेगा तो इसके लिए अमेरिका को चाहिए ईरान के किसी पड़ोसी देश का सैन्य बेस, ताकि वो अपने लड़ाकू जहाजों को उस बेस पर तैनात कर सके.  इसके लिए अमेरिका के पास सबसे मुफीद एयरबेस है ब्रिटेन का डिएगो गार्सिया, जो हिंद महासागर में है. इसी एयरबेस से अमेरिका ने 22 जून 2025 को भी हमला किया था और उसे नाम दिया था 'ऑपरेशन मिडनाइट हैमर'.

ब्रिटेन ने अमेरिका को बेस देने से किया इनकार

यही वो ऑपरेशन था, जिसमें अमेरिकी सेना ने ईरान के तीन बड़े ठिकानों फोर्डो, नतांज और इस्फहान को बर्बाद कर दिया था. लेकिन इस बार अमेरिकी फाइटर जेट्स न तो ब्रिटेन के एयरफील्ड का इस्तेमाल कर पाएंगे और न ही डिएगो गार्सिया एयरबेस का, क्योंकि इंग्लैंड ने अपने एयरबेस को अमेरिका को देने से इनकार कर दिया है. जबकि ये एयरबेस इतना आधुनिक है कि यहां से B-1, B-2 स्टील्थ और B-52 जैसे बड़े बमवर्षक जहाजों को उड़ाया जा सकता है. जरूरत पड़ने पर इस एयरबेस से परमाणु पनडुब्बियों और बड़े युद्धपोत में तेल भी भरा जा सकता है और कोई तकनीकी खामी आने पर उन्हें ठीक भी किया जा सकता है. लेकिन अब ईरान से होने वाली जंग से खुद को अलग रखने के लिए ब्रिटेन ने साफ कर दिया है कि अमेरिका ईरान के खिलाफ हमले के लिए इस एयरबेस का इस्तेमाल नहीं कर सकता है. भले ही इस एयरबेस पर अब भी अमेरिका के एयरक्राफ्ट मौजूद हैं, लेकिन ब्रिटेन की लिखित इजाजत के बगैर अमेरिकी एयरक्राफ्ट उड़ान नहीं भर सकते हैं.

इसके बावजूद अमेरिका के पास और भी विकल्प हैं. जैसे-

- कतर में अमेरिका के पास अल उदीद एयर बेस है, जो मिडिल ईस्ट में अमेरिका का सबसे बड़ा हवाई अड्डा है. यह 'यूएस सेंट्रल कमांड' का फॉरवर्ड मुख्यालय भी है, जहां हमेशा 10 हजार से भी ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात रहते हैं. इसके जरिए पूरे इलाके की हवाई गतिविधियों की निगरानी रखी जाती है.

- बहरीन में अमेरिका के पांचवें बेड़े यानी कि U.S. Navy 5th Fleet का मुख्यालय है. इसके जरिए अमेरिका फारस की खाड़ी, लाल सागर और अरब सागर में ऑपरेशन कर सकता है.

- कुवैत का कैंप अरिफजान अमेरिकी सेना का मुख्य लॉजिस्टिक बेस है, तो अली अल सलेम एयर बेस भी अमेरिका का जरूरी हवाई अड्डा है, जो इराक के बॉर्डर के पास है.

- संयुक्त अरब अमीरात में एयरबेस और नेवल बेस दोनों ही अमेरिका ने बना रखे हैं. अल धाफरा एयर बेस पर F-35, F-22 और ड्रोन्स तैनात रहते हैं तो जेबेल अली पोर्ट का इस्तेमाल अमेरिका अपने एयरक्राफ्ट कैरियर्स को रुकने के लिए करता है.

- जॉर्डन के मुवफ्फाक साल्ती एयर बेस पर भी अमेरिका के  F-15E लड़ाकू विमान तैनात हैं.

- सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर अमेरिका का मिसाइल डिफेंस सिस्टम Patriot तैनात है.

- बाकी इराक और सीरिया में भी 'ऐन अल-असद' जैसे कई छोटे और अस्थाई बेस हैं, जिनका इस्तेमाल अमेरिका अपनी जरूरत के हिसाब से कर सकता है.

इसलिए ये कहना जल्दबाजी होगी कि अगर ब्रिटेन अपने एयरबेस डिएगो गार्सिया का इस्तेमाल करने से अमेरिका को रोक देगा, तो अमेरिका कमजोर पड़ जाएगा. क्योंकि अमेरिका के पास डिएगो गार्सिया के अलावा भी मिडिल ईस्ट में कई एयरबेस हैं. बाकी तो उसका जो सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर है USS अब्राहम लिंकन, वो पहले से ही ओमान की खाड़ी और उत्तरी अरब सागर के बीच तैनात है. और इसकी तैनाती का मतलब है कि इसके साथ तीन गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर्स यूएसएस फ्रैंक ई. पीटरसन जूनियर, यूएसएस स्प्रुआंस और यूएसएस माइकल मर्फी भी तैनात है. साथ ही 9 एयर स्क्वाड्रन भी तैनात है, जिसमें -35C लाइटनिंग II और F/A-18 सुपर हॉर्नेट जैसे घातक लड़ाकू जहाज शामिल हैं.

अमेरिका ने भेजे एयरक्राफ्ट कैरियर

बाकी इस यूएसएस अब्राहम लिंकन का साथ देने के लिए USS जेराल्ड आर. फोर्ड भी पहुंचने ही वाला है, जो यूएसएस अब्राहम लिंकन से भी ज्यादा घातक है. दोनों एक साथ मिलकर इतनी तबाही मचा सकते हैं कि उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. और इन्हें तबाही मचाने के लिए किसी एयरबेस की जरूरत भी नहीं पड़ेगी, क्योंकि ये खुद में ही एयरबेस जैसे हैं. बाकी तो ट्रंप के आदेश पर 50 से अधिक F-35, F-22, F-15 और F-16 जैसे एडवांस्ड फाइटर जेट्स भी पूरे इलाके में तैनात हैं. लंबी लड़ाई के लिए जरूरी कमांड एंड कंट्रोल एयरक्राफ्ट भी अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में भेज दिए हैं और एयर डिफेंस सिस्टम भी इलाके में लगाए जा रहे हैं. कुल मिलाकर अमेरिका ने साल 2003 के बाद मिडिल ईस्ट में सबसे बड़ी फौज तैनात कर दी है, जिससे आशंका इस बात की है कि जंग हुई तो ये बहुत लंबी चलेगी और इसका दायरा सिर्फ ईरान और अमेरिका के बीच ही नहीं रहेगा बल्कि पूरा मिडिल ईस्ट ही इस जंग से प्रभावित होगा. 

अविनाश राय एबीपी लाइव में प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं. अविनाश ने पत्रकारिता में आईआईएमसी से डिप्लोमा किया है और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रैजुएट हैं. अविनाश फिलहाल एबीपी लाइव में ओरिजिनल वीडियो प्रोड्यूसर हैं. राजनीति में अविनाश की रुचि है और इन मुद्दों पर डिजिटल प्लेटफार्म के लिए वीडियो कंटेंट लिखते और प्रोड्यूस करते रहते हैं.

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