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Explained: 61% इजरायली और ट्रंप चाहते नेतन्याहू राजनीति छोडे़ं! फिर भी दोबारा चुनाव लड़ने का ऐलान क्यों, क्या जीत पाएंगे?

Israel Election 2026: विपक्ष अगर बिखरा रहा तो नेतन्याहू एक बार फिर जोड़तोड़ करके सरकार बनाने में कामयाब हो सकते हैं, लेकिन अगर बेनेट और लैपिड ने प्री-पोल गठबंधन कर लिया, तो जीत लगभग नामुमकिन हो जाएगी.

बेंजामिन नेतन्याहू एक बार फिर इजरायल के प्रधानमंत्री पद की दौड़ में हैं. लिकुड पार्टी ने साफ कर दिया है कि अक्टूबर 2026 में होने वाले आम चुनाव में पार्टी का नेतृत्व वही करेंगे. लेकिन सवाल ये है कि क्या सत्ता में बने रहने के लिए लड़ी गई एक के बाद एक जंग उन्हें कोई राजनीतिक फायदा पहुंचा पाएगी या नहीं. पार्टी के भीतर और सत्ताधारी गठबंधन में चल रही खींचतान, युद्ध की थकान, बढ़ती महंगाई और बुनियादी जरूरतों का संकट मिलकर नेतन्याहू की राह कितनी मुश्किल बना रहे हैं. इसके बीच उनकी जीत की संभावना कितनी है?

लिकुड का ऐलान और चुनाव की तारीख

इजरायल में अगला संसदीय चुनाव 27 अक्टूबर 2026 तक होना ही है, हालांकि राजनीतिक हालात को देखते हुए ये चुनाव पहले भी हो सकता है. लिकुड पार्टी ने सभी अटकलों पर विराम लगाते हुए ऐलान कर दिया है कि बेंजामिन नेतन्याहू ही प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी के उम्मीदवार होंगे. पार्टी प्रवक्ता के हवाले से आउटलुक इंडिया की रिपोर्ट बताती है, 'नेतन्याहू हमारे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं और कोई दूसरा नहीं.' यानी पार्टी ने ‘बीबी’ पर फिर से दांव लगाया है, भले ही उनकी लोकप्रियता पहले जैसी नहीं रही.

पीएम बने रहने के लिए कई जंगें, लेकिन क्या फायदा हुआ?

पिछले कुछ सालों में नेतन्याहू ने सत्ता में बने रहने के लिए एक नहीं, बल्कि कई मोर्चे खोले. गाजा में हमास के खिलाफ युद्ध, लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और ईरान के साथ बढ़ता तनाव, ये सब ऐसे मुद्दे रहे जिन्हें ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ की मजबूरी बताकर आगे बढ़ाया. लेकिन इसका राजनीतिक फायदा उल्टा पड़ता दिख रहा है.

अल इजरायल न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, 'ज्यादा सायरन, कम वोट' यानी जितना ज्यादा युद्ध का शोर होगा, नेतन्याहू के लिए वोट उतने ही कम होंगे. रिपोर्ट में आगाह किया गया कि अगर ईरान के साथ एक और बड़ा सैन्य टकराव हुआ, तो यह चुनावी मैदान में नेतन्याहू को भारी पड़ सकता है क्योंकि जनता लगातार युद्ध से थक चुकी है और स्थायी शांति चाहती है.

अंदरूनी खींचतान: सिर्फ विपक्ष नहीं, अपने भी खफा

नेतन्याहू के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ विपक्ष नहीं, बल्कि उनका अपना गठबंधन भी है. फिलहाल उनकी सरकार दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों के गठजोड़ से चल रही है, लेकिन इन सहयोगियों के बीच कई मुद्दों पर तनाव बढ़ता जा रहा है. सबसे बड़ा पेंच है हरेदी (अतिवादी धार्मिक) युवाओं की सैन्य सेवा. कट्टरपंथी दल चाहते हैं कि उनके युवाओं को सेना में भर्ती से छूट मिलती रहे, जबकि युद्ध के कारण बाकी इजरायली जनता इसे बर्दाश्त नहीं कर पा रही.

साथ ही, बजट वितरण और न्यायिक सुधारों के मुद्दे पर भी गठबंधन में दरारें हैं. अगर यह तनाव बढ़ा तो समय से पहले चुनाव की नौबत आ सकती है, जैसा कि ग्लोबल अफेयर्स की कमेंट्री में भी चर्चा की गई है. किसी स्नैप इलेक्शन की स्थिति में नेतन्याहू के लिए हालात और भी मुश्किल हो जाएंगे क्योंकि तब उनके पास मतदाताओं को लुभाने के लिए कोई बड़ी 'जीत' दिखाने का मौका नहीं होगा.

क्या जंग के मरहम से बुनियादी जरूरतों के जख्म भरेंगे?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि युद्ध ने इजरायली अर्थव्यवस्था पर गहरी चोट की है. बढ़ती महंगाई, घरों की भारी कमी, छोटे कारोबारों का नुकसान और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता सुरक्षा खर्च का बोझ आम इजरायली के लिए सिरदर्द बने हुए हैं. हमास का बंधक बनाए लोगों की रिहाई का मसला भी अब तक पूरी तरह सुलझा नहीं है, जिसे लेकर परिवारों और जनता का गुस्सा सड़कों पर उतर चुका है.

टाइम्स ऑफ इजरायल की रिपोर्ट के मुताबिक, 12 सर्वेक्षण में 61 प्रतिशत इजरायली चाहते हैं कि नेतन्याहू अगले चुनाव से पहले ही राजनीति छोड़ दें और सिर्फ 30 प्रतिशत उनका साथ दे रहे हैं. 51 प्रतिशत तो यह भी चाहते हैं कि तुरंत जल्द चुनाव कराए जाएं. यह आंकड़ा साफ बताता है कि युद्ध की जीत का नैरेटिव बुनियादी जरूरतों की टीस को दबा नहीं पा रहा है. आवास, महंगाई और नौकरियों के संकट का कोई सीधा इलाज युद्ध से नहीं निकलता और जनता अब यह समझ चुकी है.

चुनाव में नेतन्याहू के जीतने के कितने चांस?

अगर चुनाव आज होते हैं, तो नेतन्याहू और उनके दक्षिणपंथी-धार्मिक गठबंधन को बहुमत मिलता नहीं दिख रहा. अरब सेंटर डीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, ताजा जनमत सर्वेक्षणों में नेतन्याहू का गुट 120 सदस्यीय नेसेट में 52-53 सीटों पर सिमट जाता है, जबकि विपक्षी दल याइर लैपिड की येश अतिद और नफ्ताली बेनेट का न्यू होप-नेशनल यूनिटी गठबंधन मिलकर 61-68 सीटों के पार पहुंच सकते हैं. बेनेट की पार्टी को 20 के करीब और लैपिड को 16-17 सीटें मिलने का अनुमान है. बशर्ते, ये दोनों नेता आपसी मतभेद भुलाकर एक मजबूत ब्लॉक बनाएं.

डेली सबाह के ऑप-एड में भी यही सवाल उठाया गया है कि कौन जीतेगा बीबी या बेनेट? जवाब इस बात पर टिका है कि विपक्ष कितना एकजुट रहता है.

नेतन्याहू के लिए एक बड़ा झटका अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान भी हो सकता है. ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि शायद नेतन्याहू जल्द ही राजनीति छोड़ दें. यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि नेतन्याहू की छवि अमेरिका में मजबूत रिपब्लिकन समर्थन वाले नेता की रही है. ट्रंप का यह रुख उनके लिए अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भी कमजोरी का संकेत बन सकता है.

अनोखा चुनावी पैंतरा: यूरोपीय संघ और यूक्रेन को प्लेटफॉर्म में जोड़ने वाली पार्टी

चुनावी माहौल में एक दिलचस्प मोड़ यह भी सामने आया है. टाइम्स ऑफ इजरायल में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, 'जो पार्टी अपने प्लेटफॉर्म में यूरोपीय संघ और यूक्रेन को जोड़ेगी, वह 2026 का चुनाव जीत सकती है.' यह एक सेंट्रिस्ट पार्टी की रणनीति का संकेत है जो इजरायल के पारंपरिक सुरक्षा मुद्दों से हटकर अंतरराष्ट्रीय गठजोड़ और वैश्विक छवि पर फोकस करना चाहती है.

अगर ऐसी कोई पार्टी उभरती है, तो यह उन मतदाताओं को खींच सकती है जो नेतन्याहू के युद्ध-केंद्रित शासन और विपक्ष के बिखराव से तंग आ चुके हैं. यह नेतन्याहू के लिए एक और सिरदर्द होगा क्योंकि उनके वोट बैंक का एक धड़ा सेंटर-राइट वोटरों का है, जिन्हें एक मॉडरेट विकल्प लुभा सकता है.

कुल मिलाकर इजरायल में चुनाव तस्वीर क्या कहती है?

विदेश मामलों के जानकार और JNU के रिटायर्ड प्रोफेसर ए. के. पाशा कहते हैं कि नेतन्याहू का चुनाव लड़ना तय है, लेकिन उनकी सत्ता में वापसी की राह पहले से कहीं ज्यादा पथरीली है. जिन युद्धों को वह अपनी ताकत बताते रहे हैं, वही अब उनके पैरों की जमीन खिसका रहे हैं. बुनियादी जरूरतों के जख्म युद्ध के मरहम से भरने वाले नहीं हैं और जनता इसे पहचान चुकी है. विपक्ष अगर बिखरा रहा तो नेतन्याहू एक बार फिर जोड़तोड़ करके सरकार बनाने में कामयाब हो सकते हैं, लेकिन अगर बेनेट और लैपिड ने प्री-पोल गठबंधन कर लिया, तो उनका बहुमत लगभग नामुमकिन हो जाएगा. अभी के पोल यही इशारा कर रहे हैं कि इजरायल शायद बदलाव के लिए तैयार है, लेकिन बीबी को कभी भी कम आंकना गलत साबित हुआ है.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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