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कर्नाटक: टीपू सुल्तान को सिलेबस से नहीं हटाएगी सरकार, नकारात्मक पक्ष भी जोड़ा जाएगा

कर्नाटक की बीजेपी सरकार ने एक बार फिर टीपू सुल्तान को अगले शैक्षणिक सत्र की किताबों के सिलेबस में रखने का फैसला किया है. यह निर्णय सीएम बीएस येदियुरप्पा की नेतृत्व वाली एक बैठक में लिया गया है.

बेंगलुरू: कर्नाटक में मैसूर के विवादित शासक रहे टीपू सुल्तान को कर्नाटक की सियासत एक बार फिर गरम होने के आसार हैं. टीपू सुल्तान को सिलेबस से हटाने के बजाए कर्नाटक सरकार अब इसका नकारात्मक पक्ष भी पढ़ाएगी. हालांकि अगले शैक्षिक वर्ष 2020-21 के सिलेबस के लिए सिलेबस में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा. लेकिन आने वाले सत्र में यह बदलाव देखने को मिल सकता है.

दरअसल टीपू सुल्तान को सिलेबस में रखने को लेकर पहले काफी राजनीतिक विवाद रहा है. हालांकि वर्तमान राज्य सरकार नये सिलेबस को बनाने के लिए एक नई कमेटी बनाएगी. बता दें कि अगले शैक्षिक वर्ष के लिए स्कूलों को किताबें और यूनीफार्म दिया जा चुका है.

सीएम बीएस येदियुरप्पा ने निर्णय किया है कि आगामी शैक्षणिक की किताबों के सिलेबस में कोई परिवर्तन नहीं किया जाएगा. राज्य के प्रायमरी और सेकेंडरी एजुकेशन मिनिस्टर एस सुरेश कुमार ने इसकी घोषणा की है.

गौरतलब है कि टीपू सुल्तान ने 18वीं शताब्दी में कर्नाटक के मैसूर राज्य में शासन किया था. टीपू का जन्म 10 नवंबर 1750 में हुआ है. टीपू के पिता हैदर अली ने मैसूर के वर्नाड वंश के शासक कृष्ण राय को हटाकर मैसूर की राजगद्दी पर अधिकार कर लिया था. द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान घावों के चलते हैदर अली की मृत्यु हो गई.

हैदर अली की मृत्यु के बाद 1782 में टीपू बना सुल्तान हैदर अली की मृत्यु के बाद 1782 में टीपू मैसूर का राजा बना. चौथे आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान टीपू सुल्तान की किले की रक्षा करते हुए मारा गया. टीपू सुल्तान को भारत में अंग्रेजी विरोध का प्रतीक माना जाता है, लेकिन टीपू की राजनीतिक विरासत को लेकर देश में आम राय नहीं रहा है.

यहां एक वर्ग टीपू सुल्तान को भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के प्रतीक के रूप में उसका समर्थक है, तो वहीं एक ऐसा भी वर्ग है जो टीपू को हिंदू विरोधी मानता है. बीजेपी जैसी अन्य दक्षिणपंथी संगठन टीपू को हिंदू विरोधी शासक के रूप में देखती है. हालांकि टीपू के हिंदू विरोधी होने को लेकर प्रमाणों की कमी है.

सिद्धारमैया ने शुरू की टीपू सुल्तान जयंती बनाना दरअसल इस विवाद की शुरूवात तब हुई, जब तत्कालीन कर्नाटक सरकार के कांग्रेसी सीएम सिद्धारमैया ने 10 नवंबर, 2015 से टीपू सुल्तान जयंती को मनाना शुरू किया. उस समय बीजेपी समेत कई संगठनों ने इसका विरोध किया था. उनका मानना है कि टीपू एक अत्याचारी और हिंदू विरोधी शासक था.

हालांकि जुलाई 2019 में राज्य में बीजेपी सरकार आने के बाद टीपू जयंती के आयोजनों पर रोक लगा दी गई. साथ ही बीजेपी विधायक अपाचू रंजन ने स्कूल सिलेबस से टीपू सुल्तान को हटाने की मांग की. उन्होंने इस आसय को लेकर राज्य के बेसिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री सुरेश कुमार को पत्र लिखा.

बिलाल अली शाह ने हाईकोर्ट में दायर की याचिका कर्नाटक में बीजेपी सरकार के इस फैसले के खिलाफ बिलाल अली शाह ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की. गौरतलब हो कि लखनऊ के रहने वाले बिलाल अली शाह ने खुद को टीपू का वंशज होने का दावा किया है.

बता दें कि राज्य के बेसिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री सुरेश कुमार ने 2020-21 के शैक्षणिक सत्र के लिए स्कूली किताबों की सिलेबस में कोई परिवर्तन नहीं किया है. मंत्री ने कहा है कि वो इसके लिए एक नई समिति का गठन करेंगे. वहीं कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी सरकार को टीपू जयंती के आयोजन को रद्द करने के फैसले पर पुनर्विचार के लिए दो महीने का समय दिया है.

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