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14 अरब रुपए के स्मारक घोटाले में बीएसपी चीफ मायावती को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने खारिज की CBI-SIT जांच की अर्जी

बता दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मायावती राज में हुए स्मारक घोटाले को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए इस मामले में चल रही विजलेंस जांच की स्टेटस रिपोर्ट तलब कर ली थी. अदालत ने यूपी सरकार से स्टेटस रिपोर्ट एक हफ्ते में कोर्ट में पेश करने को कहा था.

इलाहाबाद: नोएडा-लखनऊ में हुए स्मारक घोटाले में बीएसपी सुप्रीमों मायावती को आज इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है. हाईकोर्ट ने स्मारक घोटाले की जांच सीबीआई या एसआईटी से कराए जाने की मांग वाली पीआईएल को खारिज कर दिया है. अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि जिस मांग को लेकर जनहित याचिका दाखिल की गई है, उसमे कोई पब्लिक इंट्रेस्ट नहीं है. इस केस में सबसे हैरान करने वाला रुख योगी सरकार का रहा. सरकार ने एक तरफ तो सीबीआई या एसआईटी जांच की मांग पर अपना रुख साफ़ नहीं किया, वहीं दूसरी तरफ इस तरह की मांग उठाने वाली अर्जी को खारिज किये जाने की सिफारिश भी की.

सरकार की संस्तुति पर ही अदालत ने सीबीआई या एसआईटी जांच का आदेश दिए जाने की मांग को लेकर दाखिल की गई अर्जी को खारिज कर दिया. इतना ही नहीं योगी सरकार ने आज की सुनवाई के दौरान अदालत को यह भी भरोसा दिलाया कि स्मारक घोटाले की विजिलेंस जांच तेजी से चल रही है और जल्द ही इसे पूरा भी कर लिया जाएगा.

अदालत में यूपी सरकार का यह रुख हैरान करने वाला रहा, क्योंकि इस मामले की जांच करने वाले तत्कालीन लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा ने चौदह अरब रूपये से ज़्यादा की सरकारी रकम के दुरूपयोग की बात कहते हुए डिटेल्स जांच सीबीआई या एसआईटी से कराए जाने की सिफारिश की थी. लोकायुक्त की इस सिफारिश पर न तो अखिलेश सरकार ने अमल किया था और न ही मौजूदा योगी सरकार कोई दिलचस्पी दिखा रही है. योगी सरकार अगर आज अदालत में पूर्व लोकायुक्त की सिफारिश के मुताबिक़ सीबीआई जांच के लिए अपनी भी संस्तुति कर देती तो अदालत को जांच एजेंसी बदलने का आदेश देने में शायद देर न लगती. सरकार ने आज अदालत में खुद पीआईएल को खारिज किये जाने की सिफारिश की और कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता भावेश पांडेय का भाई खुद इस स्मारक घोटाले से जुड़ा हुआ था और उसके पैसों का भुगतान नहीं हुआ, इसीलिये उसने यह पीआईएल दाखिल की है. हालांकि यह पीआईएल पिछले साल चुनाव नतीजे आने से पहले ही दाखिल हुई थी. अदालत में योगी सरकार के रुख को लोकसभा चुनाव की सियासत से जोड़कर देखा जा रहा है. सियासी गलियारों में चर्चा है कि मायावती के प्रति अपना नरम रुख दिखाने के लिए सरकार ने पीआईएल को खारिज करा दिया है. बहरहाल अर्जी खारिज होने से पूर्व सीएम मायावती को बड़ी राहत मिली है. मायावती अभी तक इस घोटाले में आरोपी नहीं हैं. विजिलेंस ने भी उनका बयान तक नहीं लिया है, लेकिन जांच एजेंसी बदले जाने पर वह जांच के दायरे में आ सकती थीं और सीबीआई उनसे बयान भी ले सकती थी, क्योंकि माया राज में विपक्षी पार्टियां उनकी शह पर ही घोटाला होने का आरोप लगाते हुए उनके इस्तीफे की मांग करती थीं. मामले की सुनवाई कर रही चीफ जस्टिस डीबी भोंसले और जस्टिस यशवंत वर्मा की डिवीजन बेंच ने सरकार से विजिलेंस की जांच जल्द पूरा कराने को कहा है. बता दें कि मायावती ने 2007 से 2012 तक के अपने कार्यकाल में लखनऊ व नोएडा में अम्बेडकर स्मारक परिवर्तन स्थल, मान्यवर कांशीराम स्मारक स्थल, गौतमबुद्ध उपवन, ईको पार्क, नोएडा का अम्बेडकर पार्क, रमाबाई अम्बेडकर मैदान और स्मृति उपवन समेत पत्थरों के कई स्मारक तैयार कराए थे. इन स्मारकों पर सरकारी खजाने से 41 अरब 48 करोड़ रूपये खर्च किये गए थे. आरोप लगा था कि इन स्मारकों के निर्माण में बड़े पैमाने पर घपला कर सरकारी रकम का दुरूपयोग किया गया है. सत्ता परिवर्तन के बाद इस मामले की जांच यूपी के तत्कालीन लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा को सौंपी गई थी। लोकायुक्त ने 20 मई 2013 को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में 14 अरब, 10 करोड़, 83 लाख, 43 हजार का घोटाला होने की बात कही. लोकायुक्त की रिपोर्ट में कहा गया था कि सबसे बड़ा घोटाला पत्थर ढोने और उन्हें तराशने के काम में हुआ है. जांच में कई ट्रकों के नंबर दो पहिया वाहनों के निकले थे. इसके अलावा फर्जी कंपनियों के नाम पर भी करोड़ों रूपये डकारे गए. लोकायुक्त ने 14 अरब 10 करोड़ रूपये से ज़्यादा की सरकारी रकम का दुरूपयोग पाए जाने की बात कहते हुए डिटेल्स जांच सीबीआई अथवा एसआईटी से कराए जाने की सिफारिश की थी. सीबीआई या एसआईटी से जांच कराए जाने की सिफारिश के साथ ही बारह अन्य संस्तुतियां भी की गईं थीं. लोकायुक्त की जांच रिपोर्ट में कुल 199 लोगों को आरोपी माना गया था. इनमें मायावती सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा के साथ ही कई विधायक और तमाम विभागों के बड़े अफसर शामिल थे. पूर्व की अखिलेश सरकार ने लोकायुक्त द्वारा इस मामले में सीबीआई याएसआईटी जांच कराए जाने की सिफारिश को नजरअंदाज करते हुए जांच सूबे के विजिलेंस डिपार्टमेंट को सौंप दी थी. विजिलेंस ने एक जनवरी साल 2014 को गोमती नगर थाने में नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा समेत उन्नीस नामजद और अन्य अज्ञात के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर अपनी जांच शुरू की. क्राइम नंबर 1/2014 पर दर्ज हुई एफआईआर में आईपीसी की धारा 120 B और 409 के तहत केस दर्ज कर जांच शुरू की गई. तकरीबन पौने पांच साल का वक्त बीतने के बाद भी अभी तक न तो इस मामले में चार्जशीट दाखिल हो सकी है और न ही विजिलेंस अपनी जांच पूरी कर पाई है.
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