By: ABP News Bureau | Updated at : 13 Oct 2016 12:47 PM (IST)
वाराणसी: धर्म और आस्था की नगरी वाराणसी में सात वार और तेरह त्यौहार की मान्यता प्रचलित है. कहा जाता है कि यहां पर साल के 365 दिनों से अधिक पर्व मनाये जाते हैं. नवरात्र और दशहरा के बाद रावण दहन के ठीक अगले दिन वाराणसी में भरत मिलाप का उत्सव भी काफी धूम-धाम से मनाया जाता है. वैसे तो वाराणसी में इस पर्व का आयोजन कई अलग-अलग जगहों पर होता है लेकिन चित्रकूट रामलीला समिति द्वारा आयोजित ऐतिहासिक भरत मिलाप को देखने के लिए काशी नरेश कुंवर अनंत नारायण सिंह के साथ लाखों की संख्या में भक्तों का सैलाब उमड़ता है.

एकादशी के दिन नाटी इमली मैदान में होता है ऐतिहासिक भरत मिलाप
ऐसी मान्यता है कि लगभग 500 साल पहले संत तुलसीदास जी के शरीर त्यागने के बाद उनके समकालीन संत मेधा भगत को सपने में तुलसीदास जी के दर्शन हुए और उसके बाद उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने इस रामलीला की शुरुआत की. तब से दशहरा के दूसरे दिन यानी एकादशी के दिन काशी के नाटी इमली के मैदान में ऐतिहासिक भरत मिलाप होता है.
ऐसा कहा जाता है कि जब लंका में रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद मर्यादा पुरुषोतम श्री राम वापस लौटते हैं उसके बाद भरत मिलाप होता है. मान्यताएं ऐसी है कि सैकड़ो साल पुरानी काशी की इस लीला में भगवान राम का जिवंत दर्शन होता है.
473 साल पुरानी है ये लीला
धर्म और संस्कृति की नगरी काशी शुरू से ही देवी-देवताओं को काफी प्रिय रही है. काशी के नाटी इमली के इस मैदान में उमड़ा ये जनसैलाब भगवान राम के दर्शन के लिए आता है. कहा जाता है कि काशी की 473 साल पुरानी ये लीला मेघा भगत के ज़माने से चली आ रही है जोकि तुलसी दास जी के समकालीन थे. कहा ये भी जाता है कि तुलसी दास जी ने जब रामचरित मानस को काशी के घाटों पर लिखा तो उसके बाद तुलसी दास जी ने भी कलाकारों को इकठ्ठाकर यहां लीला शुरू की.

मगर उस लीला को परम्परा के रूप में मेघा भगत जी ने ढाला. मान्यता ये भी है कि मेघा भगत को इसी चबूतरे पर भगवान राम ने दर्शन दिया था और तभी से काशी में भरत मिलाप एक लक्खा मेले के रूप में चला आ रहा है. काशी की इस प्राचीन परम्परा में भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता के दर्शन के लिए हर साल लाखों का हुजूम उमड़ता है. आपको बता दें कि इस साल इस लीला का 473वां साल है.

अपने भाईयों के स्वागत के लिए जमीन पर लेट जाते हैं भरत और शत्रुघ्न
शाम को लगभग चार बजकर चालीस मिनट पर जब अस्ताचल गामी सूर्य की किरणें भरत मिलाप मैदान के एक निश्चित स्थान पर पड़ती हैं तब लगभग पांच मिनट के लिए माहौल थम सा जाता है. एक तरफ भरत और शत्रुघ्न अपने भाईयों के स्वागत के लिए जमीन पर लेट जाते हैं तो दूसरी तरफ राम और लक्षमण वनवास ख़त्म करके उनकी और दौड़ पड़ते हैं. चारो भाईयों के मिलन के बाद जय-जयकार शुरू हो जाती है. रवायत के अनुसार फिर चारो भाई रथ पर सवार होते हैं और यदुवंशी समुदाय के लोग उनके रथ को उठाकर चारों और घुमाते हैं.
भारत के कोने-कोने से आते हैं लोग
इस लीला को देखने के लिए क्या बच्चा और क्या बुजुर्ग सबके मन में केवल एक ही श्रद्धा भगवान का दर्शन. सनातन संस्कृति को नजदीक से देखने के लिये भारत के कोने-कोने से लोग आते हैं. वाराणसी के इस विश्व प्रसिद्ध भरत मिलाप में आए सभी श्रद्धालुओं की एक ही प्रतिक्रिया होती है कि यहां पर सीधे ईश्वर का दर्शन होने के साथ ऐसा लगता है मानों स्वर्ग से भगवान अवतार लेकर साक्षात धरती पर आ गए हैं. हर साल यहां आने वाले भक्तों को इस बार भगवान के अच्छे से दर्शन होने की बेहद ख़ुशी है और उन्हें ऐसा लगा कि स्वर्ग से उतर कर चारो भाई राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न आपस में गले मिल रहे हो.
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