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रूह से रूह तक: आवाज अब साफ सुनायी दे रही थी

“किस्मत अच्छी है तुम्हारी. लगता है सर अच्छे मूड में हैं, शायद काम हो जायेगा तुम्हारा”, रामलाल ने गेट खोलते हुए कहा. “थैंक यूँ भैया”, मैं उसकी तरफ देखकर मुस्कुराया, अपना सामान उठाया और तेजी से कदम बढाता हुआ ऑफिस की ओर भागा.

रूह से रूह तक

विनीत बंसल

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ट्रेन दो घण्टे देर से पहुँची. जब तक मैं यूनिवर्सिटी के एडमिनिस्ट्रेशन विभाग तक पहुँचा, अँधेरा हो चला था और गेट पर भी ताला लगा था. गेट के दूसरी तरफ खड़े खाकी वर्दी पहने, छोटे से कद के और अपने वजन से भी ज्यादा भारी राइफल उठाये गार्ड से मैंने भीतर घुसने की गुहार लगायी. उसने मुझे घूर कर देखा और अगले दिन आने के लिए कहा. “भईया आने दो न...आज रजिस्ट्रेशन का आखि़री दिन है, वरना कल मुझे जुर्माना भरना पड़ेगा” मैंने गार्ड से विनती भरे स्वर में कहा.

“तो इसमें भी क्या मेरा कसूर है? तुम्हें टाइम से आना चाहिए था. अब यहाँ खड़े होकर बहस मत करो, कल आना”, उसने खीझ कर कहा. मैंने लोहे के बड़े से गेट की सलाखों के पार देखा तो ऑफिस की बत्ती अभी भी जल रही थी. शायद कुछ अधिकारी अभी भी वहीं थे. मैं जानता था कि अगर मैं किसी तरह अन्दर जाकर उनसे अनुरोध करूँ तो शायद काम बन सकता है, मैंने फिर से गार्ड को मनाने की कोशिश की.

“मेरी ट्रेन दो घण्टे लेट थी. मैं जानबूझकर लेट नहीं हुआ. प्लीज भैया समझने की कोशिश करो, अगर मेरा रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ तो मुझे हॉस्टल भी नहीं मिलेगा और मेरे पास रात गुजारने की और कोई जगह भी नहीं है. मैं यहाँ किसी को नहीं जानता. प्लीज... ”

“अरे पागल है क्या? एक बार की बात समझ में नहीं आती. मैं ऑफिस टाइमिंग के बाद किसी को भी अन्दर आने नहीं दे सकता. ये नियमों के खि़लाफ है.” अब वो शब्दों की हद से आगे बढ़ रहा था. वह मेरी तरफ आया और सलाखों से हाथ निकाल कर मुझे हल्का-सा धक्का दिया. “चलो, जाओ यहाँ से. कल सुबह आना, दिमाग ख़राब मत करो.” उसकी आवाज कुछ ज्यादा ही तेज हो गयी थी. तभी ऑफिस की खिड़की से हल्का-सा पर्दा खिसका और भीतर से एक आवाज आयी, “क्या बात है रामलाल? चिल्ला क्यों रहे हो?”

“कुछ नहीं साहब, एक लड़का अन्दर आने की जिद कर रहा है. बस उसे समझा रहा हूँ.”

“भेज दो उसे, मैं बस फाइल बन्द ही करने वाला था. देख लेते हैं.”

“जी साहब.”

“किस्मत अच्छी है तुम्हारी. लगता है सर अच्छे मूड में हैं, शायद काम हो जायेगा तुम्हारा”, रामलाल ने गेट खोलते हुए कहा. “थैंक यूँ भैया”, मैं उसकी तरफ देखकर मुस्कुराया, अपना सामान उठाया और तेजी से कदम बढाता हुआ ऑफिस की ओर भागा. अन्दर पहुँच कर मैंने अपना भारी भरकम वीआईपी का सूटकेस और बैग ऑफिस के बाहर हॉल में रख दिया और ऑफिस का दरवाजा खटखटाया. “आ जाओ”, अन्दर से आवाज आयी. मैं दबे कदमों से ऑफिस के अन्दर दाखिल हुआ.

मेज की दूसरी तरफ बैठा हुआ आदमी एक फाइल में नजरें टिकाये हुए था. पूरी मेज पर फॉर्म और फाइलें बिखरी पड़ी थीं. “इतनी देर से क्यों आये? क्या तुम्हें रजिस्ट्रेशन की टाइमिंग का पता नहीं था?” उस आदमी ने बिना सिर ऊपर उठाये पूछा. “आई एम सॉरी सर, लेकिन वो मेरी ट्रेन लेट...” मैंने कहने की कोशिश की.

“जरा वो फाइलें पकड़ाना”, उसने कोने में रखी फाइलों की तरफ इशारा करते हुए कहा. साफ था कि उसे मेरी प्रॉब्लम जानने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. मैं कोने में गया, फाइलों का बंडल उठाया और जाकर धीरे से उसकी मेज पर रख दिया. वो आदमी एक-एक करके फाइल उठाता, उस पर पैन से कुछ लिखता और बन्द करके एक तरफ रख देता. बीच-बीच में सामने रखे कम्प्यूटर पर कुछ लिखता. मैं चुपचाप उसे देखता रहा. यह सिलसिला काफी देर तक चलता रहा. ऑफिस की खुली खिड़की से मैं यूनिवर्सिटी की मुख्य इमारत देख सकता था. बाहर हल्का धुन्ध हो चला था.

‘अगले दो सालों के लिए मेरा घर’ मैंने मन ही मन कहा और अपने घर और अपनी मम्मी के बारे में सोचने लगा. मैं राजस्थान के एक छोटे-से शहर रामगंज मण्डी से था. मेरे पिता जी बिजली दफ्तर में क्लर्क थे और मम्मीे घर सँभालती थी. घर में हम दो भाई और दो बहनों को मिलाकर कुल छह लोग थे. भाई अभी छोटा था और स्कूल में पढ़ रहा था. दोनों बहनें मुझसे बड़ी थी. माँ और पापा को हमेशा उनकी शादी की फिक्र लगी रहती. घर के हालात ऐसे नहीं थे कि मुझे पढ़ने के लिए यूनिवर्सिटी भेज सकते. यहाँ तक पहुँचने के लिए मैंने जी तोड़ मेहनत की थी. दिन रात पढ़ाई कर एमबीए के लिए स्कॉलरशिप हासिल की जिसकी बदौलत मुझे यहाँ यूनिवर्सिटी ऑफ जयपुर में दाखि़ला मिला. मैं जानता था कि मुझे आगे भी यूँ ही मेहनत करके कुछ बनकर दिखाना है और अपने और अपने घरवालों के सपनों को सच करना है.

आखि़रकार, उस आदमी ने आखि़री फाइल ख़त्म की और उसे डेस्क पर एक तरफ पटक दिया. उसके बाद उसने मेज पर रखे जग से गिलास में पानी डाला और पी गया. “नाम?” उसने पूछा. मेरी सोच की गाड़ी एक झटके से रुकी और मैंने एकदम से पलटकर उसकी तरफ देखा.

“अरे, नाम बताओ भई?” उसने भौंहें चढ़ाई. “उम्म...नील, नील गुप्ता, सर” मैंने जवाब दिया. उस आदमी ने कंप्यूटर में कुछ लिखा और एक फॉर्म का प्रिन्ट निकालकर मेरी तरफ बढ़ा दिया. “इस फॉर्म को भरकर और यहाँ नीचे हस्ताक्षर करके जल्दी से मुझे दो.” जैसा बताया गया मैंने वैसा ही किया. उसके बाद वह अपनी सीट से खड़ा हुआ, ऑफिस में रखी गोदरेज की अलमारी का दरवाजा खोला और उसमें से एक आईकार्ड और चाबी निकालकर मुझे दे दी.

“थैंक यूँ सर!” मैंने मुस्कुराते हुए उसका धन्यवाद किया. उस आदमी ने जवाब देना जरूरी नहीं समझा और चुपचाप अपनी टेबल पर बिखरा सामान ठीक करने लगा. मैंने कुछ पल का इन्तजार किया और फिर वापस जाने के लिए मुड़ा. ऑफिस के बाहर हाल में रखा अपना सामान उठाया और इमारत की सीढ़ियाँ उतरकर बाहर आ गया. कलाई पर बँधी घड़ी की तरफ नजर दौड़ायी तो देखा सवा आठ हो चले थे. अँधेरा पूरे वातावरण को अपने आगोश में ले रहा था.

अचानक से पता नहीं क्यूँ मुझे बहुत तेज भूख लगी. याद आया कि मैंने तो सुबह से कुछ खाया ही नहीं था. सोचा कि हॉस्टल पहुँचकर पहले कैंटीन से कुछ खाऊँगा और उसके बाद सामान लगाऊँगा. मैं तेजी से कदम बढ़ाता हुआ हॉस्टल की तरफ चल दिया. चलते-चलते रामलाल ने बताया था कि आधा किलोमीटर मुख्य सड़क पर चलने के बाद, स्टाफ क्वार्टर्स के पीछे के रास्ते से हॉस्टल तक पहुँचना है. पूरे दिन की थकान और भूख से मेरा सिर चकरा रहा था. लगभग दस बारह मिनट लगातार चलने के बाद मुझे स्टाफ क्वार्टर दिखायी दिया. ‘बस थोड़ा-सा और’ मैंने अपने आप को समझाया. उसी रास्ते से दायीं तरफ मैं पीछे के रास्ते पर पहुँच गया. चारों तरफ नजर दौड़ायी तो रास्ता एक दम सुनसान था–न कोई वाहन, न जानवर और न ही कोई इंसान. और ऊपर से घना अँधेरा.

मैं यह सोच कर उस तरफ चलने लगा कि उसने शॉर्टकट बताया होगा. चाँद की मद्धम रोशनी, दिमाग में ख़यालों के बादल और पेट में कुलबुलाती भूख के साथ चलते-चलते अचानक ही मुझे कुछ सुनायी पड़ा. मैं एकदम से मुड़ा, पर कुछ भी दिखायी न दिया. फिर से कानों में वही आवाज पड़ी. आवाज थोड़ी दूर से आ रही थी. एक पल के लिए किसी अनहोनी की आशंका से दिल की धड़कन तेज हो गयी.

“कौन है यहाँ?” एकदम मुँह से निकला. अगले ही पल एक तरफ कुछ हलचल सी हुई और मुझे कुछ लोगों के भागने की आवाजें सुनायी दी. मैं उस तरफ दौड़ा. किसी के कराहने की आवाज अब साफ सुनायी दे रही थी. कोई दर्द में था. मैं और तेज दौड़ा. भारी सामान और थका हुआ शरीर मेरी मुश्किल और बढ़ा रहे थे.

“कौन है...? कौन है यहाँ?” मैं लगातार दबी आवाज में चिल्लाये जा रहा था. एकाएक मेरे कदम ठिठक गये. सामने का नजारा भयावह था. गली के एक किनारे पर झाड़ियों के पास खून और मिट्टी से लथपथ एक लड़का पड़ा कराह रहा था. उसके सिर पर गहरी चोट लगी थी जिससे खून निकल रहा था. नाक, मुँह, चेहरा, गर्दन सब जगह घाव के निशान थे. लड़के की उम्र ज्यादा नहीं थी, बस मेरी ही उम्र का. वह कुछ कहने की कोशिश कर रहा था. मैंने चारों तरफ नजर दौड़ायी, वहाँ हम दोनों के अलावा कोई नहीं था. हमलावर शायद मेरी आवाज सुन कर भाग गये थे. मैंने झुककर नीचे उस लड़के की नब्ज को छुआ–बहुत धीरे.

मेरा दिमाग तेजी से दौड़ने लगा. मैंने बिना देर किये जेब से रूमाल निकाला, धीरे से उसका सिर ऊपर उठाया और घाव के चारों तरफ कस के बाँध दिया. ‘यह खून के बहाव को थोड़ी देर के लिए रोक देगा’ मैंने सोचा. मैं अपनी उँगलियाँ उस लड़के की नाक के पास ले गया. वह साँस ले रहा था. मैंने जल्दी से बैग से पानी की बोतल निकाली, ढक्कन खोला और उस लड़के को पानी पिलाने की कोशिश की. वह लड़का अर्धचेतना-सी अवस्था में था और लगातार कुछ बड़बड़ाये जा रहा था. उसने कुछ घूँट पानी पिया. उसके बाद मैंने उसकी जेबें टटोली, इस आस में कि कोई आई.डी. कार्ड या कोई और कागज-पत्रा मिल जाये. गलती से मेरा हाथ उसकी दायीं बाजू को लगा तो वह एकदम से कराह उठा, शायद उस हाथ की हड्डी टूट चुकी थी. उसकी जींस की दायीं पॉकेट में मुझे एक पर्स मिला.

उसमें कुछ पैसे, कुछ कार्ड और एक छोटी-सी डायरी थी जिसमें कुछ नम्बर लिखे थे. मैंने तुरन्त अपनी जेब से फोन निकाला और उस पर लिखा एक नम्बर डायल किया, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया. मैंने फिर दूसरा और तीसरा नम्बर भी मिलाया लेकिन दोनों ही बन्द थे. समय निकलता जा रहा था, उस लड़के की हालत और भी नाजुक होती जा रही थी. अचानक मुझे याद आया कि जो अधिकारी मुझे कुछ समय पहले ऑफिस में मिले थे मेरे पास उनका नम्बर है, मैंने तुरन्त उनका नम्बर मिलाया. अपनी पहचान बताने के बाद मैंने उन्हें पूरी घटना बतायी. उन्होंने मुझे तुरन्त घायल को वहाँ से बस एक ब्लॉक दूर बने यूनिवर्सिटी क्लीनिक ले जाने को कहा. तब तक वो खुद पुलिस को सूचना देने में जुट गये.

‘बस एक ब्लॉक... ज्यादा मुश्किल नहीं होगी’ मैंने मन ही मन सोचा. मैंने फोन रखा और सड़क पर पड़े कराहते हुए उस लड़के की तरफ देखा. वह बेसुध हो गया था. मैंने पानी के कुछ छींटे उसके चेहरे पर मारे और उसे होश में लाने की कोशिश की. उसके बाद अपने भारी-भरकम बैग को बायें कन्धे पर उठाया, एक हाथ में सूटकेस पकड़ा और दूसरे हाथ से सहारा देकर उस लड़के को खड़ा किया. उसकी हालत इतनी ख़राब थी कि वह खड़ा भी नहीं हो पा रहा था. उसके कपड़े पूरी तरह से खून में सने थे.

“हिम्मत रखो दोस्त, तुम्हें कुछ नहीं होगा”, मैंने उससे कहा. उसने अपना हाथ मेरे गले में डाला और धीरे-धीरे घिसटते हुए चलना शुरू कर दिया. हर कदम के साथ उसके लिए आगे बढ़ना और भी मुश्किल होता जा रहा था.

“बस थोड़ा-सा और मेरे दोस्त... बस थोड़ा-सा”, बीच-बीच में मैं उसे हिम्मत बँधाने की कोशिश करता. करीब पाँच मिनट चलने के बाद हम उस मेडिकल सेन्टर के मुख्य गेट तक पहुँच गये. एक वार्ड ब्वॉय ने हमें आते देखा तो तुरन्त अन्दर दौड़कर स्ट्रैचर ले आया. हम दोनों ने मिलकर घायल को स्ट्रैचर पर लिटाया और इमरजेन्सी वार्ड में ले गये.

डॉक्टर ने तुरन्त उसका इलाज शुरू कर दिया और मैं इमरजेन्सी कमरे के बाहर पड़ी कुर्सी पर बैठ गया. थकान की वजह से मेरा बुरा हाल था. मेरी पलकें भारी हो चली थीं. धीरे-धीरे आँखें बन्द होने लगीं और कब मेरी आँख लग गयी मुझे पता ही नहीं चला. सपने में दिखी मेरी माँ, जो मुझे प्यार से अपने हाथों से खाना खिला रही थी.

अचानक किसी ने मेरे कन्धे को पकड़ कर झिंझोड़ा, “हैलो... उठो, नील”,

“ओह... हाँ, हूँ...” मैंने अपनी आँखें खोलीं. मेरे सामने तीन पुलिस वाले खड़े थे और वो अधिकारी भी जिनसे मैं कुछ देर पहले रजिस्ट्रेशन ऑफिस में मिला था. मैंने घड़ी की तरफ देखा–दस बजकर बीस मिनट हुए थे.

“ओह, हाँ ‘माफ करना सर, मेरी आँख लग गयी थी... क्या अब वो ठीक है?” मैंने आँखें मलते हुए पूछा.

“हाँ, अब वो ख़तरेे से बाहर है. अगर तुम गलत न समझो तो हमें तुम्हारा बयान लेना है”, इंस्पेक्टर ने कहा.

“हाँ हाँ, कोई बात नहीं”, मैंने जवाब दिया और इंस्पेक्टर मेरा बयान रिकॉर्ड करने के लिए मेरी साथ वाली सीट पर बैठ गया.

तकरीबन एक घण्टे बाद, सारी कानूनी कार्रवाई पूरी कर मैं उन्हीं अधिकारी के साथ बैठा था जो मुझे ऑफिस में मिले थे. उनका नाम बलराम सिंह था.

“अब उसकी हालत पहले से बेहतर है. उसके घरवाले और दोस्त भी पहुँच चुके हैं. मैंने पहले ही उन्हें फोन कर दिया था”, मिस्टर बलराम ने कॉफी की चुस्की लेते हुए कहा.

“भगवान का शुक्र है”, मैंने राहत की साँस ली.

“यह तुम्हारी बहादुरी का ही नतीजा है. तुम्हारी समझदारी से ही उसकी जान बच पायी. रणदीप यूनिवर्सिटी स्टूडेन्ट यूनियन का लीडर है. पक्का किसी न किसी गैंग से झगड़ा हुआ होगा”, मिस्टर बलराम ने कहना जारी रखा.

“गैंग?”

“हाँ, यूनिवर्सिटी में कई सारी स्टूडेन्ट यूनियन बन चुकी हैं, जो गैंग बनाकर आपस में झगड़ती रहती हैं. इस बार भी ऐसा ही कुछ हुआ होगा. वैसे तुम्हें बता दूँ कि रणदीप मिस्टर ठकराल का लड़का है, यहाँ के होटल किंग. ठकराल साहब शहर के बहुत बड़े आदमी हैं. होटल बिजनेस के अलावा भी उनकी कई सारी फैक्ट्रियाँ चलती हैं, बहुत बड़ा ट्रान्सपोर्ट का कारोबार है और दो बार विधायक भी रह चुके हैं. बहुत अमीर लोग हैं. भगवान जाने कहाँ से आया है इतना पैसा.” मिस्टर बलराम अपने आप में ही बड़बड़ाये जा रहे थे.

ये सब जानना मेरे लिए एक झटके से कम न था. कहाँ मैं एक छोटे से शहर से आया मिडल क्लास घर का सीधा-सा लड़का और कहाँ इतने बड़े और अमीर घर से रिश्ता रखने वाला रणदीप. मेरी मम्मी हमेशा कहा करती थी कि लड़ाई-झगड़ा और गुण्डा-गर्दी करने वाले लोगों से हमेशा दूर ही रहना चाहिए. इनकी न तो दोस्ती अच्छी और न ही दुश्मनी. ये सब सोचकर मुझे थोड़ा डर भी लग रहा था कि यूनिवर्सिटी के पहले ही दिन मैं किन चक्करों में फँस गया. हालाँकि ऐसा भी नहीं था कि रणदीप की जान बचाकर मुझे खुशी न हुई हो.

तभी मेडिकल सेन्टर की एक नर्स वहाँ आयी और पूछा, “आप में से नील कौन है? पेशेन्ट आपसे मिलना चाहता है.”

मैं बैंच से उठ खड़ा हुआ. जेहन में घूमते बहुत से सवाल अभी भी अपने जवाब की तलाश में थे. ‘मुझे रणदीप से मिलने जाना चाहिए या नहीं?’ इसी कशमकश के बीच मैं नर्स के साथ चल पड़ा. दिमाग कह रहा था कि मुझे इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहिए और दिल था कि इसके पीछे की पूरी कहानी जानने को बेताब था.

कुछ ही पल बाद, मैं रणदीप के कमरे में था. रणदीप बिस्तर पर लेटा था. उसके पूरे सिर पर पट्टियाँ बँधी थीं. हाथ-पैर, गर्दन और चेहरा सब जगह घाव के निशान थे. उसे अभी भी वेंटीलेटर पर रखा गया था. उसकी आँखें बन्द थीं.

मेरे आने की आहट से उसने धीरे से अपनी आँखें खोली. मैं उसके बिस्तर के थोड़ा और पास गया. उसने मेरी तरफ देखा. हम दोनों की ख़ामोश नजरों ने बात करना अभी शुरू भी नहीं किया था कि नर्स ने उस कमरे की शान्ति को भंग करते हुए कहा, “रणदीप, यही नील है जिन्होंने तुम्हारी जान बचायी है.”

रणदीप ने धीरे से बिस्तर से उठने की कोशिश की, लेकिन उसके चेहरे पर आये पीड़ा के भाव उसकी नाकामयाबी का दर्द बयान कर रहे थे. मैं एकदम से हरकत में आया, बिस्तर के नजदीक जाकर उसके कन्धे पर हल्के से हाथ रखा और उसे लेटे रहने का इशारा किया.

“हैलो रणदीप, अब कैसे हो दोस्त?”

“थैंक्स यार, बस तुम्हारी वजह से आज जिन्दा हूँ”, वह बड़ी मुश्किल से लड़खड़ाती हुई आवाज में बोला.

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(विनीत बंसल की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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