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ओशो पर लगे आरोप और उनकी सच्चाई

ओशो कम्यून की सबसे बड़ी खूबी व महान बात यह है कि वह किसी धर्म या संप्रदाय पर आधारित नहीं है, वहां पर सभी हैं यही वहां की सबसे बड़ी खासियत है कि वहां मजहब का कोई लेन-देन नहीं है.

यह पुस्तक ओशो पर लगे तमाम आरोपों को सुलझाती है वहीं इस बात को भी रेखांकित करती है कि ‘आखिर ओशो को गलत समझा क्यों गया?’ साथ ही बड़ी ईमानदारी के साथ प्रश्न उठाती है कि 'क्या ओशो के अपने संन्यासी भी ओशो को समझ पाए हैं या नहीं?’

ओशो पर लगे आरोप और उनकी सच्चाई

यह धारणा क्यों बनी?

क्योंकि ओशो मुक्त प्रेम की बात कर रहे थे. संभोग को समाधि का प्रथम चरण बोल रहे थे. विवाह से ज्यादा प्रेम पर जोर दे रहे थे. स्त्री को उसके बंधनों से मुक्त कर रहे थे. सेक्स के विपक्ष में नहीं पक्ष में बोल रहे थे, तो लोगों ने साफ अंदाजा लगाया जब आदमी इतने खुले में बेबाकी से बोल रहा है तो आश्रम में क्या कुछ न तो होता होगा. दूसरा ओशो के आश्रम में विदेशी संन्यासियों का बड़ी तादाद में आना. फिर उनका रहन-सहन, कपड़े-लत्ते, बाजार में या भरी सड़क में एक दूसरे से गले मिलना, चूमना, हाथों में हाथ डालकर चलना. तीसरा कुछ नग्न या अर्ध नग्न तस्वीरें, ध्यान के दौरान जब लोग पसीना-पसीना हो जाते थे तो वह अपने कपड़े उतार देते थे या फिर आश्रम में उपयोग की जाने वाली तंत्र व मसाज की विधियां जिसमें कई लोग नग्न दिखे तथा ओशो के कुछ ऐसे वाक्य कि मैं 'सेक्स में कोई बुराई नहीं समझता’ या मीडिया में ऐसी बाते करना कि 'जब तुम आश्रम आओगे तो द्वार पर तुम्हें नग्न स्त्री हाथों में दो सेब लिए स्वागत करते हुए मिलेगी’ जैसे उद्बोधनों ने ओशो व ओशो के आश्रम को सेक्स से जोड़कर देखा तथा अनुमान लगाया कि ओशो आश्रम में सेक्स खुलेआम उपलब्ध होता है.

यह एक ऐसी भ्रांति है जो आज भी काफी हद तक लोगों के दिलों दिमाग में अपनी जड़े जमाए हुए है. क्या है इस भ्रांति से जुड़ी सच्चाई जानिए निम्न विचारों से. लोगों में ऐसी सोच या भ्रांति के कई कारण हैं. सारे आश्रमों में ब्रह्मचर्य पर जो दिया जाता है वहां स्त्री-पुरुष को अलग-अलग रखा जाता है पर ओशो ने अपने आश्रम में स्त्री-पुरुष को अलग रखने की कोशिश नहीं की. वहां खाना-पीना, नाचना, ध्यान करना सब एक साथ होता था. वहां प्रेम करना पाप नहीं समझा जाता था. इसके अलावा यहां पर कुछ अति भी हुई. यहां पर कुछ पश्चिम से थेरेपिस्ट भी आए जिनके कारण उच्छशृंखलता भी हुई है, क्योंकि उनकी कुछ थेरेपी उस वक्त हमारे लिए नई थी जो चर्चा का विषय भी बनी.

इसके अलावा ओशो व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान करते थे. ओशो ने कहा यदि कोई कमरे के अंदर नग्न रहता है तो यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता है और दो प्रेमी अगर अपने कमरे में नग्न हैं तो यह दुनिया के लिए सिरदर्द की बात नहीं है परंतु कुछ लोगों ने उसके भी चित्र उतारे. ओशो कहते थे 'यदि एक व्यक्ति ध्यान में नग्न बैठा है तो यह उसकी स्वतंत्रता है.’ महावीर भी तो नग्न बैठे थे, क्या वो अशोभनीय है? कम्यून में भी कुछ लोग थे जो ध्यान में नग्न थे लोगों ने, मीडिया ने उन चित्रों का गलत प्रयोग किया.

सारे पशु-पक्षी नग्न रहते हैं उनको देखकर किसी को कुछ नहीं होता. आज भी महावीर के जो दिगम्बर अनुयायी हैं या अपने नागा साधु हैं वह नग्न ही घूमते हैं तथा नग्न ही साधना करते हैं, वहां कहां पर कामुक्ता है. दरअसल यह हमारा अश्लील मस्तिष्क है जो ऐसा सोचता है वरना प्रकृति की हर चीज नग्न है.

मीडिया ने और पण्डे पुरोहितों ने तथाकथित साधु-संन्यासियों ने ऐसा ही प्रचारित करने की कोशिश की, पर मेरी दृष्टि में ओशो रिजॉर्ट इस समय पृथ्वी पर मात्र ऐसी जगह है जिसे ध्यान का अड्डा कहा जा सकता है. -स्वामी आनंद अरुण

ओशो कम्यून की सबसे बड़ी खूबी व महान बात यह है कि वह किसी धर्म या संप्रदाय पर आधारित नहीं है, वहां पर सभी हैं यही वहां की सबसे बड़ी खासियत है कि वहां मजहब का कोई लेन-देन नहीं है, आज के दौर में यह बात, यह विचार महान बात है. एक और बड़ी बात कि हमने साधु के साथ गरीबी को जोड़ा हुआ था, इसे भी तोड़ दिया ओशो ने. - गुलज़ार

साधारणत: हम दो जिस्मों के मिलन को ही भोग कह देते हैं लेकिन गहरे में देखें तो भोग के 5 केंद्र हैं- रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द. और इस विशाल अर्थ में सारा जगत भोग का अड्डा है केवल ओशो आश्रम ही नहीं. यहां तंत्र की अनेक विधियों का प्रयोग भी किया जाता है. उन्हें भी देखें. अपने चित्त को भगवत्ता से आपूरित करें और फिर देखें भोग में भगवान ही तैरते नजर आएंगे. काम के तंतुओं का केंद्र से विखंडन और विसर्जन सम्भोग कहलाता है और केंद्र पर इनका सघन और संघटित होना समाधि. -स्वामी बोधि मन्यु

अपनी-अपनी समझ है. आप जैसा देखना चाहते हो वैसा देख लेते हैं. ओशो का आश्रम मुक्त प्रेम का स्थान है, अनुशासित ध्यान का स्थान है और होश-पूर्वक कार्य का स्थान है पर इसे सेक्स का स्थान और वह भी अड्डा कहना सही नहीं चूंकि यह स्थान वैश्विक समाज और संस्कृति के आकर्षण का केन्द्र है इसलिए विश्व के कोने-कोने से, हर तरह के लोग यहां आते हैं. अब तरह-तरह के साधक तरह-तरह की पृष्ठभूमि, संस्कृति, रुचि, सोच लिए जब एक ही स्थान पर एकत्र हो तो भ्रम का एक वातावरण बनना स्वाभाविक है, क्योंकि ऐसे स्थान पर कोई निश्चित संस्कृति, ढर्रा व ढंग मिलना संभव नहीं है. यह एक ऐसा बगीचा है जहां गेंदा भी है, गुलाब भी, झाड़ी भी है तो दरख्त भी, सांप-बिच्छू भी हैं तो मोर और बुलबुल भी. आप क्या कहोगे कि यह कैसा बगीचा है? परिभाषा करना मुश्किल है. और जब हम परिभाषा नहीं कर पाते तो एक 'लेबल’ लगाकर मुक्ति पाते हैं यही ओशो आश्रम के साथ भी हो गया है, हो रहा है. आज तक सामाजिक शास्त्र 'विवाह’ की कोई उचित परिभाषा नहीं कर पाया, क्योंकि पृथ्वी पर फैले हजारों समाजों में विवाह की बड़ी भिन्न-भिन्न परंपराएं हैं तो आप क्या कहोगे? आप इसे 'सेक्स की अनुमति की व्यवस्था’ तो नहीं कहोगे न? हालांकि इसमें यह निहित है. यही बात है. हम बस उस व्यवस्था के आसपास का कोई शब्द गढ़ लेते हैं, चिपका देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं. अपने सर का बोझा तो उतर गया, बाकी सत्य जो भी हो. -स्वामी अंतर जगदीश

कम्यून एक सेतु उत्पन्न करने का प्रयोग है लय में अधिक और अधिक आ जाओ. अपनी ऊर्जाओं को एकत्रित करो और स्मरण रखना, एक छोटी नहर सागर तक नहीं पहुंच सकती. यह कहीं खो जाएगी, यह बहुत दूर है. यह किसी रेगिस्तान में, किसी बंजर भूमि में खो जाएगी. लेकिन यदि छोटी लहरें एक में समा जाएं, वे गंगा बन जाती हैं... लेकिन यदि छोटी नदी सोचे, मैं स्वयं को गंगा में खोने को तैयार नहीं हूं तब यह नदी किसी रेगिस्तान में खो जाएगी, और वह आत्महत्या होगी. गंगा के साथ यह आत्महत्या नहीं है गंगा के साथ नदी गंगा हो जाती है.  प्रेम भारती

ओशो प्रेम के पक्षधर थे. अगर कोई प्रेम से पड़कर सेक्स में जाता है तो ओशो उसकी स्वतन्त्रता का भी सम्मान करते थे. असल में वे प्रेम को ऊपर उठाकर भक्ति भाव में लाना चाहते थे. -स्वामी ज्ञान साक्षी

ओशो के आश्रम में जो लोग गए हैं और बाहर-बाहर देखकर आ गए हैं, वे नासमझ ही उसे मुक्त सेक्स का अड्डा कहेंगे. लेकिन जिन्होंने आश्रम की गतिविधियों में भाग लिया है वे ऐसा कभी नहीं कह पायेंगे. 'जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ.’ -डॉ. ओशो दर्शन

ओशो आश्रम में हजारों आदमियों का आत्म रूपांतरण हुआ है. इसलिए सारी दुनिया से लोग आ रहे हैं और आत्म रूपांतरण कर रहे हैं. यहां पर विदेशों से, करीब 100 देशों के लोग आते हैं और उनके देशों के अपने अपने सोचने के ढ़ंग हैं. सेक्स उनके यहां, भारत की तरह इतना बुरा नहीं समझा जाता, स्वीडन में तो शादी की प्रथा ही खत्म हो गई है. लेकिन भारत में सारे संत ब्रह्मचर्य की बातें करते हैं और उनका पूरा ध्यान सेक्स पर ही लगा रहता है. आश्रम में ध्यान होता है, जैसा मनुष्य है, उसे आश्रम में वैसा ही आने दिया जाता है और ध्यान से उसमें रूपांतरण किया जाता है. यह सेक्स का अड्डा नहीं, बल्कि प्रेमपूर्वक, ध्यानपूर्वक, होशपूर्वक आत्मरूपांतरण करने का स्वर्ग-स्थल है. लेकिन देखने वाले की नजर ध्यान पर नहीं है, समाधि पर नहीं है, बस पूरा ध्यान कि कौन विदेशी गले लग रहा है, कौन विदेशी किस स्त्री से बात कर रहा है, इनके क्या संबंध हैं? बस दिमाग में यही चलता रहता है. -ओशो प्रदीप

ओशो की ध्यान विधियां आजकल के समाज की जरूरत हैं. आजकल अधिकतर लोग बिलकुल आराम की जिंदगी जी रहे हैं. उछल-कूद करना उनके भीतर सोई हुई ऊर्जा को जगाने के लिए जरूरी है. हमारे भीतर दमित आवेगों, भावनाओं व क्रोध का रेचन करना अर्थात उन्हें बाहर फेंकना अति आवश्यक है, क्योंकि यह दमित क्रोध हमारे भीतर चट्टान की तरह काम करते हैं. ओशो ने इस रचने के लिए बहुत ही सुंदर व प्रभावकारी, बहुत ही सरल और रोचक ध्यान विधियां बनाई हैं. ध्यान विधियां हमारे इन सातों चक्रों को सक्रिय कर देती हैं. यह मात्र उछल कूद व तमाशा नहीं बल्कि अपने अंतस से, अपनी परम सत्ता से, अपने भीतर आनन्द के खजाने से जुड़ने का सबसे सरल, सुगम तरीका है. -स्वामी प्रेम सागर

मैंने अपने जीवन में एक अजीब बात देखी है, जब भी मेरा किसी विदेशी से मिलना होता है तो वे हमसे ध्यान के बारे में पूछते हैं, परमात्मा के बारे में पूछते हैं, आत्मा के बारे में पूछते हैं, मोक्ष के बारे में पूछते हैं, पूरे जीवन के अनुभव में और मैं लाखों विदेशियों से मिला हूं, एक भी विदेशी ने ओशो के बारे में सेक्स को लेकर कोई सवाल नहीं पूछा.

पर हमारा देश तो धार्मिक देश है, ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला. देश में जहां कहीं भी गया हूं, जिस किसी से भी मिला हूं, सेक्स हमेशा सबसे पहले आता है. सेक्स में इस देश की ऊर्जा ऐसी अटकी है कि बस हिलने का नाम ही नहीं लेती. बातें बड़ी-बड़ी देश सेवा, धर्म, स्वर्ग, नैतिकता, चरित्र और सिवाय सेक्स के इनको कुछ दिखाई नहीं देता.

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(शशिकांत ‘सदैव’ की किताब ओशो पर लगे आरोप और उनकी सच्चाई का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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