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पश्चिम बंगाल: 60 साल से हर चुनाव देखता आया है 'खून की होली'

पश्चिम बंगाल चुनावः राजनीतिक झड़पों पर शोध कर किताब लिखने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सुजात भद्र कहते हैं कि शोध करते हुए मैंने जाना कि भारत में सबसे ज्यादा राजनीतिक हिंसा की घटनाएं अगर कहीं हुई हैं, तो वह बंगाल है.

नयी दिल्लीः पश्चिम बंगाल देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां आज तक कोई भी चुनाव बगैर किसी हिंसा के संपन्न नहीं हो पाया है. इसे राज्य के लोगों की बदकिस्मती कहें या फिर मजबूरी कि उन्हें पिछले छह दशक से हर छोटे-बड़े चुनाव में न चाहते हुए भी खून-खराबे का वैसा ही भयावह मंजर देखना पड़ता है जो उन्हें शनिवार को कूचबिहार में देखने को मिला. इतिहास बताता है कि चुनाव के वक़्त हर पार्टी ने राजनीतिक हिंसा को एक हथियार के रुप में ही इस्तेमाल किया है. ये अलग बात है कि वक़्त बदलने के साथ पार्टी के झंडे का रंग व चुनाव चिन्ह बदलता गया लेकिन हिंसा का पैटर्न एक जैसा ही रहा.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब बंगाल में राजनीतिक हिंसा की घटनाएं चुनाव आयोग के लिये ऐसी चुनौती के रूप में सामने आई हैं जिसके रहते राज्य में स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान कराना असंभव जैसा हो गया है. यही कारण है कि पिछले अनुभवों को देखते हुए ही आयोग ने इस चुनाव में केंद्रीय सुरक्षा बलों की अतिरिक्त टुकड़ियों को वहां तैनात किया. इसके बावजूद कोई भी यह दावे से नहीं कह सकता कि वहां अगले चार चरणों की वोटिंग बगैर किसी हिंसा के सम्पन्न हो पायेगी.

बंगाल का राजनीतिक इतिहास अगर गौर से देखें, तो पता चलता है कि हिंसा की ये घटनाएं न तो पहली बार हो रही हैं और न ही आखिर बार होंगी. पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा 1960 के दशक से ही चुनावी हथियार बन चुकी थी. वहां पर हमेशा से ही शासन और प्रशासन पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए सत्ताधारी पार्टी ऐसे हथियारों का उपयोग करती आई है.

दशकों से जारी राजनीतिक हिंसा के इस खूनी खेल के पीछे तीन अहम कारण है. इनमें राज्य में बढ़ती बेरोजगारी, विधि शासन पर सत्ताधारी दल का वर्चस्व होने के साथ ही एक प्रमुख कारण 2014 के चुनाव के बाद से अचानक से वहां बीजेपी का तेजी से उभार होना भी है.

वहां 1977 से 2007 तक लेफ्ट फ्रंट की सरकार सत्ता में रही. इस दौरान पश्चिम बंगाल में 28,000 राजनीतिक हत्याएं हुईं. सिंगूर और नंदीग्राम का आंदोलन भी वाम हिंसा का एक नमूना माना जाता है.

इसके अलावे भी ढेरों घटनाएं ऐसी हैं जो कभी दर्ज ही नहीं हुईं. 2007-08 में बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने नंदीग्राम और सिंगुर में उद्योगों के लिए ज़मीनों के अधिग्रहण की कोशिश की जिसे लेकर विवाद भड़का.

नंदीग्राम में पुलिस की गोली से 14 प्रदर्शनकारियों की जान गई और वाम मोर्चा सरकार की भारी आलोचना होने लगी. ममता बनर्जी ने वाम सरकार के ख़िलाफ़ उपजे असंतोष को राजनीतिक आंदोलन की शक्ल दी और आख़िरकार 2011 में वाम मोर्चा की 34 साल पुरानी सत्ता को उखाड़ फेंका.

इतिहास गवाह है कि जब भी सत्तारुढ़ दल को किसी विपक्षी पार्टी से कड़ी चुनौती मिलती है तो हिंसा की घटनाएं तेज हो जाती हैं. यह सिलसिला वाम मोर्चा और उससे पहले कांग्रेस की सरकार के दौर में जारी रहा है. इसी कड़ी में अब तृणमूल कांग्रेस को बीजेपी की ओर से मिलने वाली कड़ी चुनौती की वजह से राज्य के विभिन्न इलाकों में इस चुनाव से पहले ही हिंसा की घटनाएं तेज हो चुकी थीं.

बीजेपी नेताओं का दावा है कि साल 2018 के पंचायत चुनाव से लेकर अब तक उसके करीब डेढ़ सौ कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है. हालांकि, तृणमूल कांग्रेस इनके लिए आपसी रंजिश और पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी को जिम्मेदार ठहराती रही है.

राजनीतिक झड़पों पर शोध कर किताब लिखने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सुजात भद्र कहते हैं, ''शोध करते हुए मैंने जाना कि भारत में सबसे ज्यादा राजनीतिक हिंसा की घटनाएं अगर कहीं हुई हैं, तो वह बंगाल है.''

राजनीतिक विश्लेषक डॉ विश्वनाथ चक्रवर्ती इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं, ''बंगाल में उद्योग-धंधे कम हैं जिससे रोजगार के अवसर नहीं बन रहे हैं जबकि जनसंख्या बढ़ रही है. खेती से बहुत फायदा नहीं हो रहा है. ऐसे में बेरोजगार युवक कमाई के लिए राजनीतिक पार्टी से जुड़ रहे हैं ताकि पंचायत व नगरपालिका स्तर पर होने वाले विकास कार्यों का ठेका मिल सके.

डॉ विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, ''स्थानीय स्तर पर होने वाली वसूली भी उनके लिए कमाई का जरिया है. वे चाहते हैं कि उनके करीबी उम्मीदवार किसी भी कीमत पर जीत जाएं. इसके लिए अगर हिंसक रास्ता अपनाना पड़े, तो अपनाते हैं. असल में यह उनके लिए आर्थिक लड़ाई है.''

इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि पंचायत व नगरपालिका जैसे छोटे चुनावों में जब हिंसा का ये आलम रहा हो,तब यह तो विधानसभा का चुनाव है जहां सत्ता पाने के लिये खूनखराबे पर कोई बंदिश ही नहीं है.

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