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शरद पवार ने क्यों ठुकराया पीएम मोदी का ऑफर?

20 नवंबर को जब शरद पवार और पीएम मोदी की मुलाकात हुई तब ये कयास लगाए जा रहे थे कि दोनों के बीच महाराष्ट्र में चल रहे राजनीतिक घटनाक्रम पर चर्चा होगी,

मुंबई: शरद पवार ने हाल ही में ये खुलासा किया कि उन्हे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र में साथ मिलकर सरकार बनाने का ऑफर दिया था और बदले में उनकी बेटी सुप्रिया सुले को केंद्र में मंत्री पद देने की पेशकश की थी लेकिन पवार ने मोदी का यह ऑफर ठुकरा दिया. अब सवाल ये उठ रहा है कि आखिर पवार ने एक ऐसा ऑफर क्यों ठुकराया जिसके जरिए उन्हें केंद्र और राज्य दोनों सरकारों में हिस्सा बनने का मौका मिल रहा था. पवार 2014 में भी महाराष्ट्र में बीजेपी की सरकार बनवाने में मदद कर चुके हैं फिर इस बार उन्हें बीजेपी से परहेज क्यों था?

20 नवंबर को जब शरद पवार और पीएम मोदी की मुलाकात हुई तब ये कयास लगाए जा रहे थे कि दोनों के बीच महाराष्ट्र में चल रहे राजनीतिक घटनाक्रम पर चर्चा होगी, लेकिन पवार ने यह कहकर तब उन कयासों को खारिज कर दिया था कि मोदी के साथ उनकी मुलाकात महाराष्ट्र में बेमौसम बारिश से परेशान हुए किसानों को राहत देने के सिलसिले में थी. अब उन्होंने एबीपी न्यूज़ नेटवर्क को दिए इंटरव्यू में यह कबूल किया है कि मोदी के साथ उस दोपहर उनके साथ सियासी चर्चा भी हुई थी. उस चर्चा में मोदी ने उन्हें साथ आने की पेशकश की थी.

मोदी के ऑफर को ठुकरा कर शिवसेना के साथ जाने के शरद पवार के फैसले को सियासी हलकों में एक दूरगामी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. शरद पवार ये समझ गए थे कि मौजूदा राजनीतिक स्थिति में बीजेपी के साथ जाने में उनका नुकसान है. अगर वे महाराष्ट्र में बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना लेते तो ऐसे में उस सरकार पर उनका शायद कोई प्रभाव ना रहता. सरकार के फैसलों और नीतियों पर देवेंद्र फडणवीस और अमित शाह की ही चलती.

वहीं दूसरी ओर अगर शिवसेना के साथ सरकार बनती है तो वे किंग मेकर की भूमिका में रहेंगे और सरकार का रिमोट कंट्रोल उन्हीं के हाथ में रहेगा. ठीक उसी तरह से जिस तरह से 1995 में शिवसेना-बीजेपी की गठबंधन सरकार बनने पर सरकार का रिमोट कंट्रोल मातोश्री में था यानि कि बाला साहब ठाकरे के हाथ में. कहने को मनोहर जोशी मुख्यमंत्री बनाये गये थे, लेकिन सरकार ठाकरे चला रहे थे.

मोदी का ऑफर ठुकराने के पीछे दूसरा अहम कारण ये माना जा रहा है कि जब मोदी ने ऑफर दिया तब तक शिवसेना और कांग्रेस के साथ बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी थी. शिवसेना और कांग्रेस को साथ लाने का आईडिया शरद पवार का ही था. कांग्रेस को शिवसेना के साथ आने के लिए उन्होंने ही मनाया था. 24 अक्टूबर को जब चुनाव के पूरे नतीजे भी नहीं आए थे तब से ही शरद पवार ने तीनों पार्टियों को मिलाकर सरकार बनाने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया था.

चुनाव प्रचार के दौरान शरद पवार ने ये गौर किया कि भले ही बीजेपी और शिवसेना साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हों लेकिन नतीजे आने पर सीएम पद की कुर्सी को लेकर दोनों झगड़ पड़ेंगे. ऐसा पवार इसलिए मान रहे थे क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान देवेंद्र फडणवीस हर जगह यही कहते घूम रहे थे कि बतौर सीएम मैं फिर से वापस आऊंगा. वहीं दूसरी ओर उद्धव ठाकरे बार-बार अपने बयानों और सामना के संपादकीय के जरिए यह संदेश दे रहे थे कि सीएम की कुर्सी उनकी पार्टी के पास होनी चाहिए. पवार का अंदाजा सही निकला और उद्धव ठाकरे ढाई साल के लिए सीएम की कुर्सी की खातिर चुनाव नतीजे आने के बाद अड़ गए. बीजेपी इसके लिए तैयार नहीं थी. पवार ने इस मौके को भुनाने की सोची और शिवसेना को ये संकेत दिया कि अगर वो चाहे तो एनसीपी की मदद से उसका मुख्यमंत्री बन सकता है. कांग्रेस को समर्थन देने के लिए वह मना लेंगे.

मोदी का ऑफर ठुकराने के पीछे एक कारण यह भी माना जा रहा है कि उन्होंने यह विधानसभा चुनाव बीजेपी को टारगेट करके ही लड़ा था. चुनाव में उनकी सीधी लड़ाई बीजेपी से ही थी क्योंकि बीजेपी राज्य में एनसीपी को खत्म करने पर तुली थी. पवार के कई दिग्गज साथी जिनके साथ मिलकर उन्होंने एनसीपी को स्थापित किया था उन्हें बीजेपी ने तोड़ लिया. एनसीपी के कई विधायक, मंत्री, पूर्व मंत्री और आला नेता बीजेपी में शामिल हो गए. सियासी हलकों में कहा जाने लगा कि लगता है एनसीपी अब सिर्फ पवार खानदान तक ही सीमित होकर रह जाएगी.

हालांकि पवार ने चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में जो धुआंधार मेहनत की और बारिश में भीगते हुए भाषण देने की उनकी जो तस्वीरें वायरल हुई उससे पार्टी में एक नई जान आ गई. जिस एनसीपी को साल 2014 में सिर्फ 41 सीटें मिली थी वो पवार की वजह से 54 सीटें हासिल कर पाई और तीसरे नंबर की पार्टी बनी. ऐसे में पवार को राजनीतिक तौर पर ये बात ठीक नहीं लगी कि उसी पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई जाए जो कि उनकी पार्टी को खत्म करने पर उतारू थी. बहरहाल जो लोग पवार को जानते हैं उन्हें पता है कि पवार आज जो बोल रहे हैं ये जरूरी नहीं कि कल भी वो उस पर कायम भी रहें. बीजेपी, महाराष्ट्र की तिकड़ी सरकार को गिराकर फिर से वापस आने की कोशिश कर सकती है. मोदी ने पवार को ऑफर देकर यह जता दिया है की सरकार स्थापित करने के लिए उन्हें एनसीपी का समर्थन लेने से कोई गुरेज नहीं. ऐसे में पवार भविष्य में क्या सोचते हैं और उद्धव ठाकरे तीनों पार्टियों को साथ लेकर सरकार चलाने में कितना कामयाब होते हैं यह देखना दिलचस्प होगा.

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