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अनजान पहलू: सरकारी स्कूल में पढ़े राम नाथ कोविंद पहला चुनाव हार गए थे

नई दिल्ली: मोदी-शाह की जोड़ी ने एक बार फिर सारे कयासों को हवा में टांग दिया. राष्ट्रपति पद के लिए बीजेपी ने बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद का नाम तय कर एक बार सबको चौंका दिया. हालांकि, दलित या महिला चेहरा उतारे जाने की प्रबल संभावना थी, लेकिन रामनाथ कोविंद का नाम कहीं सियासी गलियारे में नहीं सुनाई पड़ रहा था. मगर श्रीराम के अनन्य भक्त और दलित समुदाय से आने वाले कोविंद को देश के प्रथम नागरिक के तौर पर एनडीए ने पेश कर सभी क़यासों पर विराम लगा दिया.

कोबिंद दलित होने के साथ पेशे से वक़ील हैं और आइएएस परीक्षा भी पास की, लेकिन एलाइड सर्विस में होने के नाते उन्होंने उसे छोड़ दिया और वकालत करने लगे. कानपुर देहात के झींझक कस्बे से मंगलपुर जाने पर जुड़वां गांव पड़ते हैं रनौख-परौख. यहीं परौख में जन्मे रामनाथ अब देश की सबसे बड़ी कुर्सी की ओर बढ चले हैं.

अनजान पहलू: सरकारी स्कूल में पढ़े राम नाथ कोविंद पहला चुनाव हार गए थे

रनौख-परौंख से रायसीना हिल्स तक की इस यात्रा में कोविंद ने राम का साथ कभी नहीं छोड़ा. उनके निकटस्थ लोग मानते हैं कि राम की कृपा से रामनाथ आज देश की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठने जा रहे हैं. रामभक्त होने के नाते संघ के बड़े नेताओं के दिल के वह हमेशा क़रीब रहे. अभी राष्ट्रपति पद पर चयन के लिहाज़ से भी उनकी ये विशेषतायें भी उनके पक्ष में गईं.

इश्वर में बेहद आस्था

रामनाथ कोविंद अपने दोस्तों के बीच पुरानी यादों के लिए जाने जाते हैं. उनके बेहद करीबी दोस्त बताते हैं कि राज्यसभा सदस्य से लेकर राज्यपाल बनने तक उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया है. उम्मीद जताई कि जमीन से निकले कोविंद राष्ट्रपति बनेंगे तो देश को सकारात्मक दिशा ही मिलेगी. आपको बता दें कि रामनाथ कोबिंद बचपन से ही ईश्वर के प्रति बेहद आस्थावान थे. रामभक्ति उनमें कूट-कूट कर भरी थी. अपनी पूरी जीवन यात्रा में वे राम के साथ चले.

यदि कोविंद राष्ट्रपति बने तो रायसीना हिल्स पर एक दलित किसान का बेटा विराजेगा. उनके पिता किसान होने के साथ बच्चों की पढ़ाई के प्रति बेहद गंभीर थे. कोविंद ने भी कभी किसी को खाली नहीं लौटाया. दलित होने के साथ सभी जातियों से उनके समान रिश्ते हैं. उनका गांव ब्राह्मण-ठाकुर बहुलता वाला होने के बावजूद कभी विवाद नहीं हुआ और सबसे उनके रिश्ते मधुर रहे.

कानपुर देहात के सरकारी स्कूल से पढ़े

परौख गांव में 1945 में जन्मे रामनाथ कोविद की पढ़ाई की शुरुआत कानपुर देहात के संदलपुर ब्लाक के खानपुर प्राइमरी स्कूल से हुई. तीन भाइयों में सबसे छोटे रामनाथ ने नौवीं में कानपुर नगर के बीएनएसडी इंटर कालेज में प्रवेश लिया तो वहीं से 12वीं पास कर बीकॉम की पढ़ाई डीएवी कालेज से की. डीएवी लॉ कालेज से एलएलबी कर वे आईएएस की तैयारी करने चले गए.

आईएएस काडर नही मिला तो वकालत चुने

सिविल सर्विसेज की परीक्षा में वे सफल भी हुए किन्तु आईएएस कॉडर न मिलने के कारण उन्होंने सिविल सर्विसेज में न जाने का फैसला किया और दिल्ली हाई कोर्ट में वकालत करने लगे. इस बीच उनका गांव से जुड़ाव बना रहा. खुद दूर स्कूल जाने की मजबूरी को देखते हुए उन्होंने गांव में प्राइमरी स्कूल खुलवाया और अपना घर बारातशाला के लिए दान कर दिया. कोविंद की शादी 30 मई 1974 को सविता कोविंद से हुई थी. इनके एक बेटे प्रशांत हैं और बेटी का नाम स्वाति है.

मोरारजी देसाई के निजी सचिव रहे 

आपातकाल के बाद जनता पार्टी की सरकार बनी तो तत्कालीन वित्तमंत्री मोरारजी देसाई के संपर्क में आए. वे उनके निजी सचिव बने. इसके साथ ही वे भाजपा नेतृत्व के संपर्क में आए तो धीरे-धीरे भाजपा की दलित राजनीति के चेहरे बन गए. पार्टी ने 1990 में कोविंद को घाटमपुर लोकसभा सीट से टिकट दिया, किन्तु वे चुनाव हार गए.

इसके बाद 1993 व 1999 में पार्टी ने उन्हें राज्य सभा भेजा. इस दौरान वे भाजपा अनुसूचित मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने. वर्ष 2007 में वे भोगनीपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़े किन्तु फिर नहीं जीत सके. इसके बाद उन्हें उत्तर प्रदेश भाजपा संगठन में सक्रिय कर प्रदेश का महामंत्री बनाया गया. पिछले वर्ष अगस्त में उन्हें बिहार का राज्यपाल बनाया गया था.

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