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आंकड़ों की जुबानी समझिए रेलवे के हालात की कहानी

रेलवे के नेट रेवेन्यू सरप्लस में 66.10 % की कमी आई है. 2016-17 में ये सरप्लस 4,913.00 करोड़ रूपए था जबकि 2017-18 में ये गिर कर 1,665.61 करोड़ रूपए रह गया.

नई दिल्ली: सोमवार को संसद में सीएजी की रेलवे वित्त ऑडिट रिपोर्ट पेश की गई. इस रिपोर्ट के दो हिस्से हैं पहले में रेलवे की आर्थिक सेहत को रेलवे के 2017-18 के एकाउंट्स की जांच से परखा गया है. और दूसरे हिस्से में रेलवे द्वारा यात्रियों को दी जा रही आर्थिक रियायतों के प्रभाव को परखा गया है. यानी ये देखा गया गया है कि रेलवे कंशेशंस का रेलवे की आय व आर्थिक स्थिति पर कितना असर पड़ रहा है? इस बात की भी जांच की गई है कि इन कंशेशंस के दुरुपयोग को रोकने में रेलवे का आंतरिक तंत्र कितना प्रभावकारी है.

सीएजी रिपोर्ट की मुख्य चिंता

रेलवे के फ़ाइनैंस एकाउंट्स की जांच से पता चला है कि रेलवे के रेवेन्यू सरप्लस में लगातार गिरावट आ रही है. रेलवे के रेवेन्यू सरप्लस में रेलवे के आंतरिक संसाधनों की भागीदारी भी लगातार घटती हुई नज़र आई है.

आंकड़ों की ज़ुबानी

रेलवे के नेट रेवेन्यू सरप्लस में 66.10 % की कमी आई है. 2016-17 में ये सरप्लस 4,913.00 करोड़ रूपए था जबकि 2017-18 में ये गिर कर 1,665.61 करोड़ रूपए रह गया. इसमें रेलवे के आंतरिक संसाधनों से होने वाली आय का हिस्सा भी 2017-18 में 3.01 % कम हुआ है.

फ़ंड इस्तेमाल की ख़ामियां

साल 2017-18 में रेलवे के एक विशेष रिज़र्व फंड में 68% की गिरावट दर्ज की गई. इस गिरावट के दौरान उससे निपटने के लिए जो तैयारी की जानी चाहिए थी, उसमें लापरवाही का असर ये हुआ कि ज़्यादातर कामों को भविष्य में करने के लिए रोका जाने लगा, जिसने न किए गए कामों का एक पहाड़ खड़ा कर दिया - जिसकी कीमत आंकड़ों में ₹1, 01,194 करोड़ हो गई है.

नतीजा केंद्र पर निर्भरता बढ़ रही है

सीएजी ने चिंता ज़ाहिर की है कि ख़ुद न कमा पाने के कारण रेलवे तेज़ी से केंद्र सरकार से मिलने वाले अनुदान पर आश्रित होती जा रही है. इसके अलावा रेलवे को अपने मुख्य काम रेल चलाने से हट कर अन्य संसाधनों से पैसा इकट्ठा करने पर ध्यान लगाना पड़ रहा है.

रेलवे में निजीकरण की असलियत

रेल मंत्रालय जिस तरह से सारा ज़ोर स्टेशनों को चमकाने, मॉल बनाने, रेस्टोरेंट खोलने और बेकार पड़ी ज़मीनों को ठिकाने लगाने की योजनाएं बनाने में लगा रहा है उसका असली मक़सद इस सीएजी रिपोर्ट से सामने आ गया है. दरअसल मंत्रालय अपने मुख्य काम की असफलता को इन माध्यमों से पाटना चाहता है. अपनी सहयोगी कम्पनियों को बेंचेने की क़वायद और ट्रेनों का निजीकरण इसका बड़ा उदाहरण है.

10 साल के सबसे निचले स्तर पर आया ऑपरेटिंग रेश्यो

2017-18 में रेलवे का ऑपरेटिंग रेश्यो 98.44 था जो पिछले एक दशक में सबसे निचले स्तर पर है. यानी इस वित्त वर्ष में रेलवे ने 100 रुपये कमाने के लिये 98.44 रुपये खर्च किये. सीएजी रिपोर्ट के अनुसार दरअसल 98.44 % का ऑपरेटिंग रेश्यो भी आभासी या किताबी है. क्योंकि एनटीपीसी और इरकॉन ने एडवांस पैसे दिए थे जिसके कारण ऑपरेटिंग रेश्यो किताब में कम हो गया. अन्यथा वास्तव में तो ये 102.66 % है. रेलवे को सौ रूपए कमाने के लिए जितने रूपए ख़र्च करने पड़ते हैं उसे ही रेलवे का ऑपरेटिंग रेश्यो या ओआर कहा जाता है.

सीएजी रिपोर्ट का दूसरा हिस्सा

सीएजी ने रेलवे में फ़्री पासेज़ और कंसेशंस पर भी चिंता जताई है. रिपोर्ट के अनुसार रेलवे का मुख्य प्रॉफ़िट मालभाड़े से आता है न कि यात्री भाड़े से. लेकिन मालभाड़े के मुनाफ़े का भी क़रीब 95% हिस्सा यात्री भाड़े से होने वाले घाटे को पाटने ने निकल जाता है. यात्री भाड़े में इस तरह के भारी घाटे का कारण है अलग अलग श्रेणी के फ़्री टिकट, यात्री टिकटों में कांशेशन, पास और प्रिवलेज टिकट ऑर्डर्ज़ रियायत का बड़ा हिस्सा सीनियर सिटिज़न टिकट, प्रिवलेज पास और प्रिवलेज टिकट ऑर्डर्ज़ के मार्फ़त दी जा रही रियायत में ही रेलवे का 89.7% रेवेन्यू चला जा रहा है.

गिव-अप स्कीम हो गई फेल

प्रधानमंत्री मोदी के कुकिंग गैस के लिए छेड़े गए गिव-अप अभियान की तर्ज़ पर रेलवे ने भी सीनियर सिटिज़न के लिए गिव-अप अभियान चलाया था लेकिन इस अभियान को सफलता नहीं मिली है.

रियायत पाने वाले कर रहे हैं एसी में सफ़र

आंकड़ों से ये भी सामने आया है कि विभिन्न श्रेणियों में जिन लोगों को कांशेशन मिला है उनमें से ज़्यादातर एसी क्लासेज़ में सफ़र करते हैं, नॉन-एसी में कम.

ग़लत आधार पर दी जा रही हैं रियायतें

रिपोर्ट से ये खुलासा भी हुआ है कि रेलवे ने बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को भी कंसेशन के पास जारी किए गए हैं जो मापदंडों पर खरे नहीं उतरते. पास के दुरुपयोग की घटनाएं भी आम हैं. इसके अलावा रेलवे का पैसेंजर रिज़र्वेशन सिस्टम प्रिवलेज पास पर अवैध तरीक़े से मल्टिपल टिकटिंग को भी रोकने में सक्षम नहीं है. इसके अलावा फ़्रीडम फाइटर की आयु को लेकर भी रेलवे रिज़र्वेशन सिस्टम में ख़ामियां हैं.

क्या कहना है रेलवे का?

उधर रेल राज्य मंत्री सुरेश अंगड़ी का कहना है कि रेलवे की अर्थव्यवस्था अभी इसलिए कमज़ोर है क्योंकि बहुत सारे विकास के काम चल रहे हैं. लाईन डबलिंग का काम हो रहा है, साफ-सफाई से लेकर ट्रेन की सभी सुविधाएं बढ़ाई जा रही है. उनकी गुणवत्ता में सुधार किया जा रहा है और इस वजह से खर्चे ज्यादा है और इसी वजह से रेवन्यू कम हो गया है. बीच में रेवेन्यू इसलिए भी गिरा क्योंकि बाढ़ आई थी जिसकी वजह से रेलवे पर काफी असर पड़ा. नए बन रहे फ़्रेट कारिडोर के खुलने के बाद तेज़ी से सुधार होगा.

रेलवे का राजनीतिक दुरुपयोग

रेलवे जानकारों के मुताबिक़ रेलवे लम्बे समय से राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल की जाती रही है. तमाम कारख़ाने, ट्रेनें और रेलवे लाईन यात्री-कंजेशन या आर्थिक लाभ को देख कर नहीं बल्कि वोट बैंक को देखते हुए दिए गए. रेल विशेषज्ञ अरविंद सिंह के मुताबिक़ फ़्रेट कारिडोर के शुरू होने से रेल कंजेशन में क़रीब 25% की कमी ज़रूर आएगी. लेकिन रेलवे को आर्थिक लाभ में लाने के लिए हाई स्पीड ट्रेनों के साथ आधुनिक उपकरणों के प्रयोग पर विशेष बल देने की ज़रूरत है. फ़ोर लाईन होने पर, लाईन की संख्या बढ़ने से, स्पीड बढ़ेगी जिससे रेलवे की आर्थिक स्थित मजबूत होगी.

आपरेटिंग रेश्यो का पैमाना बदले

रेलवे बोर्ड के पूर्व सलाहकार सुनील कुमार मानते हैं कि यात्री किराए के कंशेशन को ऑपरेटिंग रेश्यो से जोड़ा जाता है इसीलिए ऑपरेटिंग रेश्यो कम आता है. यात्री कंशेशन को ऑपरेटिंग रेश्यो में न दिखा के अलग से दिखाया जाना चाहिए वरना रेलवे की बैलेंस शीट ख़राब रहेगी और इसकी हालत भी एयरइंडिया जैसी हो जाएगी.

बीस साल से नहीं बढ़े हैं किराए

रेलवे के सामान्य किराए 1999 से नहीं बढ़े हैं. विशेषज्ञ सुनील कुमार मानते हैं कि रेल किराए का एक इंडेक्स बनना चाहिए जिसके अनुसार किराए कुछ वर्षों में उचित पैमानों के अनुसार अपने आप बढ़ते रहें. आज जिस तरह रेलवे अपने कोर काम यात्री और माल भाड़े की जगह स्टेशन डेवेलपमेंट और ज़मीनों से पैसे कमा रही है वो वैसे ही है जैसे कोई अपने पुरखों का कमाया ख़र्च करता जाय.

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