15 साल से अलग रह रहे कपल की शादी खत्म करने का आदेश, SC बोला- ऐसे रिश्ते सिर्फ कागजों पर जिंदा...
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'भारत की अदालतों ने बार-बार यह स्थापित किया है कि यौन संबंधों से दूरी बनाए रखना गंभीर भावनात्मक तनाव पैदा करता है और विवाह की बुनियाद को कमजोर करता है.'

सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल से अलग रह रहे पति-पत्नी की शादी समाप्त करते हुए अहम टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक मुकदमों के लंबे समय तक लंबित रहने से शादी सिर्फ कागजों पर ही कायम रहती है. सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखते हुए शादी खत्म करने का आदेश दिया. कोर्ट ने संज्ञान लिया कि हाईकोर्ट ने कई बिंदुओं पर पति के पक्ष में तलाक को मंजूरी दी थी. तलाक मंजूर करने के कारणों में एक महत्वपूर्ण वजह यह भी थी कि पत्नी कई बार पति के साथ संबंध बनाने के लिए से मना कर चुकी थी. हाईकोर्ट ने इसे पति के प्रति क्रूरता माना.
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा, 'भारत की अदालतों ने बार-बार यह स्थापित किया है कि यौन संबंधों से दूरी बनाए रखना गंभीर भावनात्मक तनाव पैदा करता है और विवाह की बुनियाद को कमजोर करता है.' सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'इसलिए हाईकोर्ट का निष्कर्ष बरकरार रखा जाता है. प्रतिवादी-पति की अपील को स्वीकार करते हुए दी गई तलाक की डिक्री (आदेश) को बरकरार रखा जाता है.'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसके कई फैसलों में यह माना गया है कि बिना किसी उचित कारण के लगातार यौन संबंधों से इनकार करने सहित विभिन्न दांपत्य अधिकारों से वंचित करना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(आई ए) के तहत यह तलाक का एक वैध आधार है.
बेंच ने रेखांकित किया कि चिकित्सक दंपति की शादी दिसंबर 2007 में हुई थी. पत्नी गुजरात में और पति राजस्थान में सरकारी सेवा में कार्यरत हैं. सुप्रीम कोर्ट ने न्याय सुनिश्चित करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि इस कपल के बीच वैवाहिक बंधन को समाप्त किया जाना उचित है क्योंकि यह स्पष्ट था कि यह बंधन पूरी तरह से टूट चुका है और इसके अब पटरी पर आने की गुंजाइश बची नहीं है.
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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के पिछले साल फरवरी में दिए गए आदेश के खिलाफ पत्नी की अपील पर दो जून को अपना फैसला सुनाया. हाईकोर्ट ने पति की अपील मंजूर कर ली थी और तलाक की अनुमति दे दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह पाया कि दोनों पक्ष 15 से ज्यादा सालों से अलग रह रहे थे और उनकी कोई संतान नहीं थी. इतना ही नहीं, कोर्ट की ओर से बार-बार किए गए प्रयासों के बावजूद, कोई सुलह नहीं हुई.
बेंच ने कहा कि विवाह अपने कानूनी और संवैधानिक आयाम में कभी भी व्यक्तिगत अधिकारों के मात्र एक संविदात्मक मिलन तक सीमित नहीं किया जा सकता है और न ही इसे वैवाहिक अधिकारों की याचिका के संकीर्ण दृष्टिकोण से देखा जा सकता है.
कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक अधिकार एकतरफा अस्तित्व में नहीं होते हैं और वे वैवाहिक कर्तव्यों के संरचनात्मक प्रतिरूप हैं. कोर्ट ने कहा कि मानसिक क्रूरता के आरोपों का मूल्यांकन करते समय विवाह के बुनियादी पहलुओं से लगातार पीछे हटना कानूनी परिणामों का कारण बन सकता है.
बेंच ने कहा कि इस मामले में पक्षों के आचरण से यह स्पष्ट था कि सहवास की छोटी अवधि के दौरान भी वे अपनी वैवाहिक जिम्मेदारियों को निभाने में विफल रहे. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'यह अदालत इस दृष्टिकोण के प्रति सचेत है कि अदालतों का रुख विवाह की पवित्रता को बनाए रखने का होना चाहिए और किसी भी एक पक्ष के केवल कहने भर से तलाक देने में अदालत को संकोच करना चाहिए.'
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बेंच ने कहा कि इस मामले मेंदंपति बहुत लंबे समय से अलग रह रहे थे और इस विवाह में कोई पवित्रता नहीं बची थी. कोर्ट ने कहा कि हालांकि पत्नी की ओर से यह दावा किया गया था कि उसने गुजरात में अपनी नौकरी छोड़ दी थी और राजस्थान में रहने लगी थी, लेकिन इन दावों की पुष्टि करने के लिए रिकॉर्ड पर कोई सबूत नहीं आया है.
बेंच ने कहा, 'इसके विपरीत रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत इस दलील के उलट हैं और इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि वह (पत्नी) अब भी गुजरात में अपनी नौकरी जारी रखे हुए है. उसकी ओर से पति के साथ रहने की कोई मंशा प्रतीत नहीं होती है, क्योंकि कथनी और करनी में फर्क है.'
























