'सिर्फ काटने से नहीं, उनकी वजह से होने वाले सड़क हादसों में भी लोगों की जान जा रही', आवारा कुत्तों को लेकर SC ने जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुबह-सुबह कौन सा कुत्ता किस मूड में होगा, यह कोई नहीं जानता. नगर निकायों को नियमों, कार्य प्रणालियों और निर्देशों का सख्ती से पालन करना होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने नगरीय निकायों द्वारा नियमों और निर्देशों का अनुपालन न करने की ओर ध्यान दिलाते हुए बुधवार (7 जनवरी, 2026) को कहा कि देश में न सिर्फ कुत्तों के काटने से बल्कि सड़कों पर आवारा जानवरों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं से भी लोगों की मौत हो रही है.
डॉग लवर्स और आदेशों के कड़े अनुपालन की मांग करने वालों द्वारा दायर कोर्ट के पूर्व आदेशों में संशोधन की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि वह सुनवाई इसलिए कर रही है, क्योंकि कई वकीलों और पशु कार्यकर्ताओं ने दावा किया है कि सात नवंबर को आदेश पारित होने से पहले उनकी बात नहीं सुनी गई थी.
पीठ ने कहा, 'सड़कों पर कुत्ते और आवारा जानवर नहीं होने चाहिए. कुत्तों के काटने की घटनाएं ही नहीं, बल्कि सड़कों पर आवारा जानवरों का घूमना भी खतरनाक साबित हो रहा है और दुर्घटनाओं का कारण बन रहा है. सुबह-सुबह कौन सा कुत्ता किस मूड में होगा, यह कोई नहीं जानता. नगर निकायों को नियमों, कार्य प्रणालियों और निर्देशों का सख्ती से पालन करना होगा.'
जस्टिस मेहता ने बताया कि पिछले 20 दिनों में राजस्थान हाईकोर्ट के दो जज दुर्घटनाओं का शिकार हुए हैं और उनमें से एक न्यायाधीश अब भी रीढ़ की हड्डी की चोटों से जूझ रहे हैं. उन्होंने मामले में पेश हुए वकीलों से कहा, 'यह एक गंभीर मुद्दा है.'
मामले में अदालत के पूर्व आदेश में संशोधन का अनुरोध करने वाले याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कहा कि समाधान सभी कुत्तों को पकड़ना नहीं है, बल्कि पशु-मानव संघर्ष को कम करने के लिए विश्व स्तर पर स्वीकृत वैज्ञानिक फार्मूला अपनाना है.
उन्होंने तर्क दिया कि अदालत आवारा कुत्तों की आबादी के प्रबंधन और नियंत्रण के लिए सीएसवीआर (पकड़ना, नसबंदी करना, टीकाकरण करना और छोड़ना) के फार्मूले को अपना सकती है, जिससे धीरे-धीरे कुत्ते के काटने की घटनाओं में कमी आएगी.
जस्टिस नाथ ने कहा, 'इलाज से परहेज बेहतर है', और बताया कि इस मामले में बहस करने के लिए कुछ खास नहीं है क्योंकि अदालत ने केवल संस्थागत क्षेत्रों से आवारा कुत्तों को हटाने का निर्देश दिया है और उसने किसी भी नियम और विनियम में हस्तक्षेप नहीं किया है.
पीठ ने कहा कि इस मामले में वह राज्यों और नागरिक निकायों द्वारा नियमों, विनियमों, मॉड्यूल और मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) के सख्त प्रवर्तन की कोशिश कर रही है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'कुछ राज्यों ने हमारे आदेशों का पालन करने और तर्कों को लागू करने में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. हम उन राज्यों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेंगे. सभी नियमों, विनियमों और मानक प्रक्रियाओं का पालन करना अनिवार्य है.'
जब विभिन्न पक्षों की ओर से पेश हुए कुछ वकीलों ने यह बताया कि कुत्तों के हमले हो रहे हैं, तो पीठ ने कहा कि वह समझती है कि बच्चों और वयस्कों को कुत्ते काट रहे हैं और उनकी जान जा रही है. शुरुआत में, इस मामले में ‘न्याय मित्र’ के रूप में नियुक्त किए गए वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने अदालत के आदेश को लागू करने के लिए एक मानक प्रक्रिया (एसओपी) तैयार की है.
अग्रवाल ने कहा, 'उन्होंने 1,400 किलोमीटर सड़क को संवेदनशील क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया है. हालांकि, पहचान के बाद, एनएचएआई का कहना है कि इसकी देखभाल राज्य सरकारों को करनी होगी.' पीठ ने सुझाव दिया कि आवारा पशुओं को सड़कों पर आने से रोकने के लिए सड़कों और एक्सप्रेस-वे पर बाड़ लगाई जाए.
अग्रवाल ने कहा कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और पंजाब जैसे राज्यों ने अभी तक अनुपालन हलफनामे दाखिल नहीं किए हैं, जबकि कुछ राज्यों ने बेहद “निराशाजनक” हलफनामे दाखिल किए हैं. जस्टिस नाथ ने कहा कि अदालत उन राज्यों से निपटेगी.
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