BJP की सियासत का जो अब तक रहा 'हथियार', कैसे विपक्ष उसी को ढाल बना कर रहा वार
राम मंदिर के चढ़ावे और चंदे का मुद्दा बीजेपी के खिलाफ विपक्ष का बड़ा हथियार बनता जा रहा है. राम मंदिर में चढ़ावे को लेकर उठे सवालों पर दिल्ली से लेकर लखनऊ तक सियासत गर्म है.

राम मंदिर, जिसके नाम पर बीजेपी ने दशकों तक अपनी सियासत का सबसे मजबूत नैरेटिव तैयार किया. अब उसी राम मंदिर के चढ़ावे और चंदे का मुद्दा बीजेपी के खिलाफ विपक्ष का बड़ा हथियार बनता जा रहा है. राम मंदिर में चढ़ावे को लेकर उठे सवालों पर दिल्ली से लेकर लखनऊ तक सियासत गर्म है. संसद में विपक्ष सरकार को घेर रहा है, सड़क पर प्रदर्शन हो रहे हैं और समाजवादी पार्टी लगातार इस मुद्दे को 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से जोड़कर बीजेपी पर हमला कर रही है.
आज यानी 10 अगस्त को संसद परिसर में सपा सांसदों का प्रदर्शन इसी सियासी रणनीति की नई तस्वीर लेकर आया. कुछ दिन पहले तक हाथों में सांकेतिक दान पात्र था, लेकिन आज वही प्रदर्शन दूध और पानी की बोतल तक पहुंच गया. सपा सांसदों ने संसद परिसर में दान पात्र के सामने एक हाथ में दूध और दूसरे हाथ में पानी की बोतल लेकर प्रदर्शन किया. इस प्रदर्शन के पीछे सीधे यूपी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पुराना बयान था, जिसमें उन्होंने चंदे से जुड़े आरोपों की जांच के संदर्भ में कहा था कि दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया जाएगा.
दूध का डब्बा लेकर संसद पहुंचीं डिंपल यादव
इसी बयान को याद दिलाते हुए डिंपल यादव भी संसद परिसर में दूध से भरा डब्बा लेकर पहुंचीं. डिंपल यादव ने कहा कि मुख्यमंत्री ने खुद दूध का दूध और पानी का पानी करने की बात कही थी, लेकिन कमेटी गठित होने के बावजूद अब तक पूरे मामले का हिसाब सामने नहीं आया है. उन्होंने राम मंदिर ट्रस्ट की जमीनों की खरीद और चढ़ावे से जुड़े सवाल उठाते हुए सरकार और मुख्यमंत्री से स्पष्टीकरण की मांग की. यानी सपा अब सीएम के पुराने बयान को ही बीजेपी सरकार के खिलाफ सवाल बनाने में जुटी है.
सपा उठा रही राम मंदिर चढ़ावा चोरी का मुद्दा
राम मंदिर चंदा और चढ़ावे से जुड़े आरोपों का मुद्दा जून महीने में सामने आने के बाद से सपा इसे यूपी विधानसभा से लेकर संसद तक लगातार उठा रही है. यूपी में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में सपा की कोशिश साफ दिखाई दे रही है कि इस मुद्दे को चुनाव तक राजनीतिक बहस के केंद्र में बनाए रखा जाए. सपा को लगता है कि राम मंदिर से जुड़ा ये विवाद बीजेपी के उस सबसे मजबूत राजनीतिक नैरेटिव को चुनौती देने का मौका दे सकता है, जिसके सहारे पार्टी ने यूपी की राजनीति में लंबे समय तक बढ़त बनाए रखी.
क्या है सपा की रणनीति?
दरअसल, राम मंदिर सिर्फ आस्था का विषय नहीं रहा है, बल्कि बीजेपी की चुनावी राजनीति का भी सबसे बड़ा प्रतीक रहा है. अयोध्या आंदोलन से लेकर राम मंदिर निर्माण तक बीजेपी ने इसे अपने हिंदुत्व के नैरेटिव का केंद्र बनाया, लेकिन अब समाजवादी पार्टी उसी पिच पर बीजेपी के खिलाफ बैटिंग करना चाहती है. सपा की रणनीति है कि जिस राम मंदिर ने बीजेपी को राजनीतिक बढ़त दिलाई, उसी मंदिर के चढ़ावे और चंदे का हिसाब मांगकर बीजेपी को बैकफुट पर लाया जाए.
अखिलेश यादव इस मुद्दे पर एक्टिव
अखिलेश यादव भी इस मुद्दे पर लगातार बीजेपी को घेर रहे हैं. उन्होंने बीजेपी को भूमाफिया पार्टी बताते हुए अयोध्या में जमीनों और आस्था से जुड़े मामलों पर सवाल उठाए. अखिलेश का आरोप है कि अयोध्या जैसी पावन धरती पर आस्था के साथ खिलवाड़ हुआ और जमीनों के दाम तेजी से बढ़े. यानी चढ़ावे के सवाल के साथ समाजवादी पार्टी ने अयोध्या की जमीनों का मुद्दा भी जोड़ दिया है, ताकि राम मंदिर के साथ-साथ अयोध्या की जमीन की राजनीति को भी बीजेपी के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके.
अब ये लड़ाई सिर्फ संसद परिसर के प्रदर्शन तक सीमित नहीं है. लोकसभा में भी विपक्ष की तरफ से चंदे और राम मंदिर से जुड़े सवाल उठाए गए. सदन में चंदा चोर, गद्दी छोड़ जैसे नारे सुनाई दिए. विपक्ष सरकार से जवाब की मांग कर रहा है. सरकार की तरफ से गृह मंत्री के सदन में जवाब देने की बात कही गई है, लेकिन अखिलेश यादव का कहना है कि राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़े सवालों पर भी जवाब देना होगा. उनका आरोप है कि ये चोरी नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा गंभीर मामला है और सरकार को इस पर जवाब देना चाहिए.
सपा को मिला कांग्रेस का साथ
इस मुद्दे पर कांग्रेस भी समाजवादी पार्टी के साथ खड़ी नजर आ रही है. कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने कहा कि बच्चों से जुड़े मुद्दे और अयोध्या राम मंदिर में कथित भ्रष्टाचार से जुड़े सवाल दोनों महत्वपूर्ण हैं और सरकार को दोनों विषयों पर अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए. यानी संसद में विपक्षी दलों के बीच इस मुद्दे पर एकजुटता की तस्वीर दिखाई दे रही है.
बीजेपी का पलटवार
बीजेपी का पलटवार भी उतना ही तीखा है. बीजेपी का कहना है कि विपक्ष के पास कोई मुद्दा नहीं है और वह राम मंदिर जैसे संवेदनशील विषय को राजनीतिक नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहा है. बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने विपक्ष पर मुद्दाविहीन होने का आरोप लगाते हुए कहा कि राम मंदिर को लेकर राजनीतिक नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश की जा रही है. वहीं बीजेपी सांसद जगदंबिका पाल का कहना है कि जब सरकार गृह मंत्री के जवाब के लिए तैयार है और चर्चा की बात कह रही है, तो विपक्ष सदन को चलने क्यों नहीं दे रहा. बीजेपी इसे विपक्ष की सोची-समझी रणनीति बता रही है.
इसी बीच संसद से बाहर भी राम मंदिर चढ़ावे का मुद्दा सड़क पर उतर आया. साधु-संतों ने मंडी हाउस से प्रधानमंत्री आवास की तरफ मार्च किया. इस मार्च में निर्दलीय सांसद पप्पू यादव भी साधु-संतों के साथ दिखाई दिए. पप्पू यादव ने केंद्र सरकार को निशाने पर लिया और राम मंदिर से कथित तौर पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को दूर करने की मांग की. प्रदर्शन के दौरान पप्पू यादव साधुओं के साथ जमीन पर बैठते और उनके चरणों में लेटते भी दिखाई दिए. उन्होंने कहा, 'सदन में राहुल गांधी, अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी समेत विपक्षी नेता इस मुद्दे को उठा रहे हैं, लेकिन सरकार की तरफ से स्पष्ट जवाब नहीं आ रहा है.'
पप्पू यादव के इस प्रदर्शन की तस्वीर इसलिए भी चर्चा में रही क्योंकि इससे पहले संसद परिसर में उनके साधु भेष को लेकर भी राजनीतिक विवाद हो चुका है. अब वही पप्पू यादव साधु-संतों के साथ राम मंदिर से जुड़े चढ़ावे के मुद्दे पर सड़क पर दिखाई दे रहे हैं. यानी संसद में विपक्ष के नेता सवाल उठा रहे हैं और सड़क पर साधु-संत सरकार से निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं.
सपा की रणनीति साफ
कुल मिलाकर लखनऊ से दिल्ली तक समाजवादी पार्टी की रणनीति अब साफ नजर आ रही है. पार्टी चाहती है कि राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़े आरोपों और सवालों की चर्चा लगातार बनी रहे और 2027 के विधानसभा चुनाव तक ये मुद्दा यूपी की जनता के बीच राजनीतिक बहस का हिस्सा बना रहे. समाजवादी पार्टी को उम्मीद है कि जिस मंदिर आंदोलन ने बीजेपी की राजनीति को ताकत दी, उसी मंदिर के चढ़ावे को लेकर उठे सवाल बीजेपी के खिलाफ राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकते हैं.
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राम मंदिर ट्रस्ट में बड़े प्रशासनिक बदलाव की तैयारी
इस पूरे सियासी घमासान के बीच राम मंदिर ट्रस्ट के भीतर भी बड़े प्रशासनिक बदलाव की तैयारी की खबर सामने आ रही है. जानकारी के मुताबिक राम मंदिर के संचालन के लिए जल्द ही एक CEO की नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है. CEO पद के लिए करीब 5200 लोगों ने आवेदन किया है, जिनमें से 18 उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किए जाने की बात सामने आई है. इन 18 उम्मीदवारों के इंटरव्यू 11 और 12 अगस्त को होने हैं. इसके बाद तीन नामों का पैनल तैयार किया जाएगा और इन तीन नामों में से किसी एक को राम मंदिर ट्रस्ट का CEO चुने जाने की संभावना है.
चर्चा है कि 2 सितंबर को होने वाली ट्रस्ट की बैठक में CEO के नाम पर मुहर लग सकती है. माना जा रहा है कि प्रशासनिक कामकाज का लंबा अनुभव रखने वाले व्यक्ति को प्राथमिकता मिल सकती है और किसी सेवानिवृत्त IAS अधिकारी को मंदिर के संचालन की जिम्मेदारी दिए जाने की संभावना है. इसके साथ ही इसी बैठक में ट्रस्ट को पूर्णकालिक महासचिव मिलने की भी उम्मीद जताई जा रही है. यानी एक तरफ राम मंदिर के चढ़ावे को लेकर राजनीतिक विवाद तेज है, तो दूसरी तरफ मंदिर के प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने की कवायद भी चल रही है.
बीजेपी ने अभियान को बताया चुनावी स्टंट
यानी इस वक्त राम मंदिर का मुद्दा एक बार फिर सियासत के केंद्र में है. संसद में विपक्ष हिसाब मांग रहा है, समाजवादी पार्टी प्रदर्शन के जरिए योगी सरकार को घेर रही है, कांग्रेस समर्थन दे रही है, साधु-संत सड़क पर उतर रहे हैं और बीजेपी विपक्ष के पूरे अभियान को राजनीतिक स्टंट बता रही है.
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