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राफेल डीलः पीएसी के सामने CAG रिपोर्ट ही नहीं आई तो कैसे कहा कि पीएसी ने देख ली रिपोर्ट-राहुल गांधी

सुप्रीम कोर्ट में आज जो फैसला आया है उसमें कहा गया कि जहाज की दाम की जानकारी सीएजी को दी गई है. सीएजी की रिपोर्ट पीएसी को दी गई है. लेकिन मल्लिकार्जुन खड़गे जो पीएसी के चीफ हैं उन्होंने कहा कि मेरे पास राफेल से जुड़ी कोई जानकारी नहीं आई है. सीएजी की रिपोर्ट नहीं आई. ये रिपोर्ट कहां से आई?

नई दिल्लीः राफेल सौदे पर आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की है. उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी पर यहां भी हमले किए और राफेल सौदों को लेकर कई अहम सवाल पूछे. राहुल गांधी ने पीएम मोदी से सवाल पूछते हुए कहा कि विमान 1600 करोड़ रुपये में क्यों खरीदा गया.? रक्षा मंत्री बार-बार अपना बयान क्यों बदलती रही हैं. उन्होंने पूछा कि अनिल अंबानी की कंपनी को कॉन्ट्रेक्ट क्यों दिया गया? साथ ही राहुल का तीसरा सवाल था कि इस मुद्दे पर पीएम मोदी क्यों नहीं बोलेते. राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि HAL से कॉन्ट्रेक्ट छीना गया. साथ ही उन्होंने पूछा CAG की रिपोर्ट PAC में क्यों नहीं आई ? CAG को पूरी जानकारी नहीं दी गई. सीएजी को पूरी जानकारी नहीं दी गई. जेपीसी जांच की मांग नहीं मानी गई और पीएसी को राफेल की कीमत क्यों नहीं बताई गई. राहुल गांधी ने इसके अलावा पीएम मोदी पर जमकर हमला बोलते हुए कहा कि जिस दिन जांच हो गई उस दिन दो नाम सामने आएंगे और वो होंगे पीएम मोदी और अनिल अंबानी. कीमत के मुद्दे पर राहुल गांधी ने कहा कि पीएम मोदी की पीएसी अलग है क्या? क्योंकि मल्लिकार्जुन खड़गे पीएसी के सदस्य हैं और उन्हें कोई रिपोर्ट नहीं दी गई है. बता दें कि आज कीमत को लेकर लगाए गए आरोपों पर कोर्ट ने कहा है, "हमें सरकार ने विमान की मूल कीमत और आधुनिक उपकरण लगाने के बाद की कीमत की जानकारी दी है. सरकार ये जानकारी CAG और पब्लिक एकाउंट्स कमिटी को भी दे चुकी है. हमने सीलबंद लिफाफे में दी गई जानकारी को देखा है. हम इस बात पर आश्वस्त हैं कि विमानों की इस खरीद में देश को व्यवसायिक लाभ हुआ है. कोर्ट का ये काम नहीं कि वो कीमतों की तुलना करे." वहीं मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि जब सीएजी के पास रिपोर्ट नहीं है, संसद के पास नहीं है तो ये रिपोर्ट आई कहां से? सुप्रीम कोर्ट में आज जो फैसला आया है उसमें कहा गया कि जहाज की दाम की जानकारी सीएजी को दी गई है. सीएजी की रिपोर्ट पीएसी को दी गई है. लेकिन मैं पीएसी का चीफ हूं तो मेरे पास राफेल से जुड़ी कोई जानकारी नहीं आई है. सीएजी की रिपोर्ट नहीं आई. ये रिपोर्ट कहां से आई? पीएसी को लेकर जो कहा गया वो झूठ है. ऑफसेट पार्टनर के चुनाव के बारे में कोर्ट ने कहा है कि DPP 2013 के मुताबिक ऑफसेट पार्टनर का चयन मूल विदेशी कंपनी करती है. इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं है. फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रंस्वा ओलांद के एक बयान को आधार बना कर कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गईं. लेकिन दसॉल्ट और रिलायंस उस बयान का खंडन कर चुके हैं. इसलिए, सिर्फ मीडिया रिपोर्ट के आधार पर मामले में दखल देना उचित नहीं लगता. कोर्ट ने फैसले में इस बात को भी दर्ज किया है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज और दसॉल्ट के बीच 2012 में ही आपसी सहयोग का एक व्यवसायिक करार हुआ था. ऐसे में हो सकता है कि पुराने व्यवसायिक संबंध के चलते दसॉल्ट ने 2017 में रिलायंस एयरोस्ट्रक्चर को पार्टनर बनाया हो. लेकिन ऑफसेट पार्टनर के बारे में दसॉल्ट ने अभी तक भारत सरकार को कोई आधिकारिक सूचना नहीं दी है. तीनों बिंदुओं का जवाब देने के बाद कोर्ट ने निष्कर्ष के तौर पर लिखा है, "सभी पहलुओं को विस्तार से देखने के बाद हम ये नहीं समझते कि मामले में दखल की ज़रूरत है. कुछ लोगों की धारणा जांच का आदेश देने का आधार नहीं बन सकती. हम सभी याचिकाओं को खारिज करते हैं." सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में तीन मुख्य सवाल उठाए गए थे :- 1. जिस तरह पुराने सौदे को दरकिनार कर, प्रधानमंत्री ने नया सौदा किया. उसमें तय प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ. 2. विमान पहले से ज्यादा कीमत पर खरीदे जा रहे हैं. इसे लेकर कोई पारदर्शिता नहीं है. 3. विमान बनाने वाली फ्रांस की कंपनी दसॉल्ट को इस बात के लिए विवश किया गया कि वो भारत में रिलायंस डिफेंस को अपना ऑफसेट पार्टनर चुने. यानी रिलायंस को फायदा पहुंचाने के लिए पुराना सौदा रद्द कर नया सौदा किया गया. सुप्रीम कोर्ट ने 29 पन्नों के अपने फैसले में तीनों बिंदुओं का सिलसिलेवार जवाब दिया है. कोर्ट ने माना है कि 2012 से चल रही 126 राफेल विमानों की खरीद की बातचीत अंजाम तक नहीं पहुंच रही थी. इसकी वजह थी दसॉल्ट को भारतीय ऑफसेट पार्टनर के तौर पर हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की क्षमता पर भरोसा न होना. इस बीच भारत के प्रतिद्वंद्वी देश अपने हवाई बेड़े को मजबूत करने में लगातार लगे हुए थे. चौथी और पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की कमी भारत की सुरक्षा को खतरे में डाल रही थी. ऐसे में पुराने सौदे को रद्द कर सीधे फ्रांस की सरकार के साथ समझौता करना सरकार का एक विवेकपूर्ण फैसला था कोर्ट ने कहा है कि सरकारों के बीच हुआ समझौता डिफेंस प्रोक्यूरमेंट प्रोसिजर (DPP) 2013 के प्रावधानों पर खरा उतरता है. इसमें साफ लिखा है कि रक्षा ज़रूरत को पूरा करने के लिए सीधे किसी मित्र देश की सरकार के साथ हुए समझौते में साधारण रक्षा खरीद की तरह एक एक प्रक्रिया का पालन ज़रूरी नहीं. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 3 जजों की बेंच ने ये भी कहा है कि इस बात पर सवाल खड़े नहीं किए जा सकते कि 126 विमानों की जगह 36 विमान ही क्यों खरीदे गए. ये भी सरकार का एक फैसला है जो उसने देशहित में लिया. कोर्ट इसमें दखल नहीं देगा.
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