Analysis: 'चुनाव से पहले बदल जाते हैं भाषणों के तेवर', पीएम-गृह मंत्री को गद्दार बताने वाले बयान के क्या हैं मायने?
वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ने कहा कि नेताओं को अतीत के मुद्दों की बात करके लोगों को जोड़ना चाहिए. उग्रता से बोलना कोई मुश्किल काम नहीं है.

कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के एक बयान ने बवाल खड़ा कर दिया है. उन्होंने बुधवार (20 मई, 2026) को रायबरेली में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) को गद्दार कहकर संबोधित किया. इसे लेकर उनके खिलाफ दिल्ली में एफआईआर भी दर्ज हो गई है. भारतीय जनता युवा मोर्चा के दिल्ली प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक दुबे ने एफआईआर में कहा कि पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ आपत्तिजनक और अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल किया गया इसलिए राहुल गांधी के खिलाफ कार्रवाई हो.
राहुल गांधी ने अपने बयान में कहा था, 'जब आप घर वापस जाओगे और आरएसएस कार्यकर्ता आपके सामने आएंगे, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की बात करेंगे, उनके सामने आप उनसे कहो कि आपका प्रधानमंत्री गद्दार है, आपका गृह मंत्री गद्दार है, आपका संगठन गद्दार है. आपने हिंदुस्तान को बेचने का काम किया है. आपने हमारे संविधान पर आक्रमण किया है. आपने आंबेडकर जी, गांधी जी पर आक्रमण किया है.' उनके इस बयान पर वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ने कहा है कि चुनाव आने से पहले भाषणों के तेवर तेज हो जाते हैं. उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होना है.
एबीपी न्यूज से खास बात करते हुए अनिल चमड़िया ने कहा, 'कोई भी ऐसा चुनाव नहीं है जहां की राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के जो भाषण थे वो उग्र नहीं थे. मतलब ये माना जा रहा है कि भारतीय राजनीति में कि हम विरोध के लिए केवल उग्रता का इस्तेमाल करके ही अपने पक्ष में स्थिति को कर सकते हैं. और मैं यह समझता हूं कि यह भारतीय राजनीति का यह शून्य काल है. शून्य काल... मैं इसलिए ये बात कह रहा हूं कि मैं 1990 के आसपास से ये देख रहा हूं और उस समय मेरी कई पार्लियामेंट में या विधानसभाओं में जो लोक प्रतिनिधि चुन के जाते थे, उनसे हमारी मेरी बातचीत होती थी, तो उन लोगों के भीतर एक मैं ट्रेंड देखता था और यह ये ट्रेंड यह था कि वे सदन में शून्य काल का इंतेजार करते थे ताकि वे जोरजोर से अपनी किसी बात को रख सकें और उसके बाद वे प्रेस के गलियारे की तरफ देखते थे.'
उन्होंने कहा कि प्रेस का ध्यान आकृष्ट करने का मतलब यह हुआ कि हम समाज के और देश के लोगों का ध्यान आकृष्ट कर सकते हैं. तो ये धारणा जो है लगातार मजबूत होती चली जा रही है और एक तरह से बेलगाम होने की स्थिति में पहुंचती जा रही है. अनिल चमड़िया ने कहा, 'देखिए मैं यह समझता हूं कि जो चुनाव होते हैं उस समय पहले जो हम लोगों ने अनुभव किया है कि चुनाव का अवसर होता था लोगों को जागरूक करना, लोगों को शिक्षित करना लोगों को जो आने वाले जो खतरे हो सकते हैं, जो संकट हो सकते सकते हैं, उसके बारे में संवेदनशील बनाना, लोगों को शिक्षित करना या लोगों के भीतर एक भावना पैदा करना ताकि समाज को बनाने और गढ़ने की जरूरत में उनकी जो भागीदारी जरूरी होती है वो उसमें भागीदार हो सकें, लेकिन अब चुनाव का सारा गणित बदल गया है.
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उन्होंने कहा, 'चुनाव के गणित में अब हम यह देखते हैं कि लोगों की भागीदारी उस तरह से नहीं होती है. लोगों की बहुत दिलचस्पी भी नहीं होती है. वोट डालना है क्योंकि 5 साल में है. संसदीय व्यवस्था है तो वोट डालना है, लेकिन कोई बहुत प्यार से मोहब्बत से और बहुत ही कोई एक सपने को बुनकर कोई बूथ पर नहीं जाता है, तो एक तरह से मैं यह कह रहा हूं कि जैसे अभी उत्तर प्रदेश में धर्म विशेष के खिलाफ बोलने के लिए आपको उग्रता की जैसे जरूरत होती है. ठीक उसी के उलट अगर कोई यह समझता हो कि किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ हम बहुत ही उग्रता से बोलकर और उसके पक्ष का में माहौल जो बना है या जो माहौल अभी है उस वो अपनी तरफ हम उसको खींच सकते हैं, तो मैं ये समझता हूं कि ये समझदारी नहीं है.'
अनिल चमड़िया ने कहा कि एक-दूसरे के खिलाफ इस तरह बयान-बाजियां करने के बजाय तथ्यों के साथ अपने आरोपों को जनता के सामने रखें. उन्होंने कहा, 'ये समझदारी उचित नहीं है. भारतीय राजनीति में ये जो उग्रता का जो दौर चल रहा है. इससे समाज बनेगा नहीं, ये समाज को एक बनाने का काम नहीं करेगा बल्कि बिगाड़ने का काम करेगा. सत्ता में पार्टियां आती हैं, जाती हैं, लेकिन समाज को तो निरंतर चलते रहना है. अब जैसे मान लीजिए कि राहुल गांधी ने रायबरेली में भाषण अभी दिया और जिस तरह से उन्होंने जो सत्ताधारी पार्टी के जो लोग हैं, नेता हैं उनके खिलाफ जिस तरह से वह बोल रहे हैं तो मैं यह समझता हूं कि इससे कोई माहौल को अपने पक्ष में आप नहीं कर सकते. अगर उनके खिलाफ कोई शिकायत या आरोप है तो ऐसे भाषण देने के बजाय आप लोगों को फैक्ट्स के आधार पर जो सच है, उसको आप बताइए.'
अनिल चमड़िया ने यह भी कहा कि नेताओं को अतीत के मुद्दों की बात करके लोगों को जोड़ना चाहिए. उग्रता से बोलना मुश्किल काम नहीं है, लेकिन लोगों को अतीत में ले जाना, एहसास कराना, उन स्थितियों को फिर से याद दिलाना जो बहुत परेशानी भरी थीं, ये काम पेनफुल है और एक नेता को इसे बेहतर तरीके से करना चाहिए.
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उन्होंने कहा, 'जैसे मान लीजिए आप कह रहे हैं नोटबंदी में ये हुआ, कोरोना में ये हुआ, कोविड-19 के समय में ये हुआ. मुझे लगता है कि इसी बात को अगर आप रिपीट करें, बहुत ही शालीन तरीके से करें, लोगों को याद दिलाएं. अतीत की चीजों से बोलना पड़ता है और यह थोड़ा मुश्किल काम होता है. उग्रता में बोलना मुश्किल काम नहीं होता है, लेकिन लोगों को अतीत में ले जाना, एहसास कराना, स्थितियों को उससे जोड़ना और उस हालात में जिसमें कि आप जैसे आज मौजूदा स्थिति आपकी बहुत ही परेशानी भरी है और वैसी स्थिति को आप पुरानी स्थितियों से जोड़ना चाहते हैं तो जाहिर सी बात है कि यह बहुत पेनफुल काम है. बहुत ही चुनौती है और राजनेता का ही काम होता है कि वह इस चुनौती को और इस जो पेनफुल काम जो है उसको किस तरह से बेहतर तरीके से अंजाम दे सके.'
अनिल चमड़िया ने कहा, 'मैं यह समझता हूं कि उत्तर प्रदेश में इसके आधार पर कोई चुनावों का गणित इधर-उधर नहीं होगा कि आप ज्यादा से ज्यादा एक दूसरे के खिलाफ उग्र बोलें. मुझे लगता है कि तथ्य तथ्यात्मक रूप से बताएं, स्थितियों के बारे में ठीक-ठीक आप लोगों के बीच में एक्सप्रेस कर सके, बता सकें, उनको उनसे जोड़ सके तो मुझे लगता है कि यह काम कर सकता है. पिछले चुनाव में भी हम लोगों ने देखा कि जैसे मान लीजिए कि संविधान के बारे में बात हो रही थी. संविधान खतरे में, संविधान एक अलग मसला है, लेकिन देखिए संविधान के बारे में भी तो आप अगर बोल रहे हैं तो सवाल ये है कि क्या आप उन लोगों के बीच में बोल रहे हैं जो संविधान से पूरी तरह जुड़ चुके हैं? अगर संविधान से जुड़ी उनकी भावनाओं से लोगों का जुड़ाव ही नहीं हो पाया है तो आप उनके खतरे की बात कितनी भी करेंगे जाहिर सी बात है कि उसका कोई असर ज्यादा नहीं दिखाई देगा.'
उन्होंने कहा, 'जरूरत तब यह होगी कि संविधान से लोगों को जोड़ने की क्या-क्या कवायद हो सकती हैं यह हम क्या कर सकते हैं और देखिए राजनीति में केवल प्रतिक्रिया नहीं होती है. क्रिया की तरफ भी आपको जाना होता है अभी के दौर में हम सिर्फ और सिर्फ यह देख रहे हैं कि पक्ष विपक्ष की ओर से प्रतिक्रियाएं लोग देते हैं एक दूसरे के खिलाफ. मेरा यह कहना है कि आप क्रिया यानी क्या कर रहे हैं? क्या करना चाहते हैं? इस पर बात हो तो ज्यादा बेहतर होगा और उत्तर प्रदेश का चुनाव एक नई संस्कृति को जन्म दे. शून्य काल का जो ये दौर चल रहा है राजनीति का उससे निकालने की कोशिश हो तो बेहतर होगा.'
Source: IOCL























