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क्या दो गज जमीन भी सरकार हिंदू-मुस्लिम देखकर देती है?

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूपी में एक चुनावी रैली में कहे कि गांव में अगर कब्रिस्तान बनता है तो गांव में श्मशान भी बनना चाहिए. अगर रमजान में बिजली मिलती है, तो दीवाली में भी बिजली मिलनी चाहिए. अगर होली पर बिजली मिलती है तो ईद पर भी बिजली मिलनी चाहिए. भेदभाव नहीं होना चाहिए. सरकार का काम है भेदभाव मुक्त शासन चलाने का. किसी के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए. धर्म के आधार पर तो बिल्कुल नहीं होना चाहिए. सबका साथ, सबका विकास की बात करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब अपने इसी मंत्र को फतेहपुर की रैली में कब्रिस्तान और श्मशान की जमीन पर खड़ा किया तो वोट के लिए हिंदू-मुस्लिम रंग देने का आरोप लगने लगा. यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि हम पर आरोप लगा रहे हैं कि हमने कब्रिस्तान और केवल उनके लिए काम किया है.. पता नहीं कौन खबर दे देता है प्रधानमंत्री जी को. कांग्रेस प्रवक्ता मीम अफजल ने कहा कि डिवाइड और रूल का काम करते हैं, ये धुर्वीकरण नहीं है तो और क्या है? ये तो कब्रिस्तान और श्मशान की सियासत आपने देखी. पर आज वो बात जानिए जो नेता आपको बताते नहीं. इसीलिए सबसे पहले जानें कि आखिर उत्तर प्रदेश में क्या वाकई कब्रिस्तान के लिए सरकार हाथ खोलकर और श्मशान के लिए हाथ बंद करके खर्च करती है. क्या दो गज जमीन भी सरकार हिंदू-मुस्लिम देखकर देती है? सबसे पहले यूपी में कब्रिस्तान के लिए अखिलेश के खजाने से क्या निकला, हमने ये खंगाला तो पता चला कि 2015-16 में कब्रिस्तान के चारों तरफ दीवार बनाने का बजट सरकार ने 200 करोड़ रखा था. 2016-17 में कब्रिस्तान की चहारदीवारी बनाने के लिए बजट दो गुना बढ़ाकर 400 करोड़ हो गया. 87,694 कब्रिस्तान इसके लिए चुने गए थे. लेकिन 5314 कब्रिस्ताओं की ही बाउंड्री वॉल बनवाई जा सकी. यानी कब्रिस्तान की दीवार बनाने के लिए दो गुना बजट बढ़ा दिया गया. लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि अगर 2015 में उत्तर प्रदेश में 65255 वारदाते दंगे की हुईं तो इनमें करीब 15 फीसदी दंगों के पीछे वजह कब्रिस्तान की जमीन रही. क्योंकि ज्यादातर जगहों पर कब्रिस्तान की दीवार तय ना होने के कारण धार्मिक जुलुस निकालने के दौरान तनाव की स्थिति पैदा हुई. इतना सच पता लगाने के बाद हमने ये जानना चाहा कि आखिर कब्रिस्तान के मुकाबले श्मशान बनाने में सरकार ने कितना खर्च किया? एबीपी न्यूज ने जानकारी इकट्टा की तो पता चला कि 2014-15 में श्मशान के लिए यूपी में 100 करोड़ का बजट था. 755 श्मशान बनाए गए. 2015-16 में 100 करोड़ के बजट से 755 श्मशान बनाए जाने थे. सभी बन गए. 2016-17 में 127 करोड़ के बजट से 521 श्मशान बनाए जाने थे. अभी 138 बन गए हैं. बाकी बचे 383 श्मशान मार्च तक बन जाने का दावा है. इन आंकड़ों से देखकर ये बात साफ हुई कि श्मशान से ज्यादा कब्रिस्तान के लिए सरकार ने बजट रखा है. लेकिन असली मुद्दा क्या है ? श्मशान-कब्रिस्तान या फिर इंसान ? जनता को नेताओं की श्मशमावादी विकास की राजनीति नहीं चाहिए. और जो उसे चाहिए वो ना तो अखिलेश यादव मुख्यमंत्री रहते दे रहे हैं और ना ही प्रधानमंत्री रहते नरेंद्र मोदी. भरोसा ना हो तो कुछ आंकड़ें देख लीजिए. मोदी और अखिलेश यादव की सरकार मिलकर भी यूपी में जो प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर खर्च करती है वो देश के औसत से कहीं नीचे है. गोवा जैसे छोटे राज्य में भी यूपी से पांच गुना ज्यादा प्रति व्यक्ति की सेहत पर खर्च होता है. यूपी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 84 प्रतिशत स्पेशलिस्ट्स की कमी है. देश में बच्चे को जन्म देने के दौरान मां की मौत के मामले में यूपी दूसरे नंबर पर है. 31200 सरकारी डॉक्टरों की जरूरत है, लेकिन सिर्फ 20400 डॉक्टर मौजूद हैं. 20 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में सिर्फ 4% के पास ही हेल्थ इंश्योरेंस है. सत्तर फीसदी लोगों को साफ पानी पीने के लिए नहीं मिलता. 18 से 29 साल के बीच प्रति 1,000 लोगों पर 237 लोग ग्रेजुएट डिग्री के साथ बेरोजगार हैं. यानी जिन मुद्दों को उठाकर जनता को स्वस्थ जिंदगी राजनीति दे सकती हैं, उन्हें पीछेकर नेता व्यस्त हैं श्मशानवादी सियासत में. जिससे राजनीतिक दलों के लिए भले कुछ वोटों का विकास हो जाए. लेकिन जनता का विकास होना मुश्किल है. अपनी चुनावी रैली में प्रधानमंत्री ने सिर्फ श्मशान और कब्रिस्तान को लेकर हिंदू-मुस्लिम विभेद ना करने की बात ही नहीं कही. बल्कि बिजली को धर्म के खंभे से उतारकर वोट का करंट दौड़ाना चाहा. जो बात चौबीस घंटे बिजली देने का वादा करके कही जा सकती थी. उसके लिए रमजान की बिजली अलग, दीवाली की बिजली अलग करने की नौबत क्यों आई ? और क्या वाकई उत्तर प्रदेश में बिजली भी धर्म के आधार पर सप्लाई की जाती है ? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि अगर रमजान में बिजली मिलती है, तो दीवाली में भी बिजली मिलनी चाहिए. अगर होली पर बिजली मिलती है तो ईद पर भी बिजली मिलनी चाहिए. भेदभाव नहीं होना चाहिए. अखिलेश यादव बोले कि प्रधानमंत्री काशी से आते हैं, गंगा मैय्या की कसम बताएं, कि काशी में चौबीस घंटे बिजली कौन दे रहा है. दीवाली, रमजान, सब पर दी है. उत्तर प्रदेश में बिजली एक बड़ा मुद्दा है. बिजली के मुद्दे पर कभी सरकारें गिरीं तो नहीं लेकिन बनाने की कोशिश अब जरूर हो रही है. लेकिन क्या प्रधानमंत्री मोदी और अब उनके फायर ब्रांड नेता योगी आदित्यनाथ जानबूझकर बिजली के मुद्दे को वोटों के धुर्वीकरण के लिए इस्तेमाल किया. क्या बिजली की सप्लाई पर बीजेपी सच बता रही है? इसीलिए ये जरूरी हआ कि पहले ये तो पता करें कि क्या उत्तर प्रदेश में ईद और दीवाली पर बिजली सप्लाई करने में यूपी सरकार भेदभाव करती है. तो सच सामने आया कि 6 जुलाई 2016 को ईद थी. उस दिन यूपी में 13500 मेगावॉट बिजली की सप्लाई हुई. जबकि 28 अक्टूबर धनतेरस से एक नवंबर भैया दूज के बीच दीवाली के मौके पर 15400 मेगावॉट बिजली की सप्लाई पांचों दिन हुई. इन आंकड़ों को देखने के बाद यही पता चला कि बिजली सप्लाई में भेदभाव नहीं किया गया. तो फिर क्यों प्रधानमंत्री मुस्लिमों को ज्यादा बिजली, हिंदुओं को कम बिजली की बात कर रहे हैं. तो इसके लिए आपको मुरादाबाद चलना होगा. कुंवर सर्वेश सिंह मुरादाबाद से बीजेपी सांसद हैं. मोदी के बिजली वाले बयान के पीछे इनका अहम रोल है. क्योंकि 2015 में बीजेपी सांसद कुंवर सर्वेश सिंह ने प्रधानमंत्री से शिकायत की थी. आरोप लगाया था कि मुरादाबाद में मुस्लिमों के घर बिजली कनेक्शन आसानी से दी जा रही है, लेकिन गरीब हिंदुओं के घर नहीं दी जाती. इसके बाद बकायदा जांच बैठाई गई थी. और ये वही रिपोर्ट में जिसमें जिसमें सामने आया था कि इन इलाकों में दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के नियमों के विपरीत धार्मिक आधार पर भेदभाव करते हुए बिजली कनेक्शन दिए गए थे. इसीलिए बीजेपी अब यूपी के चुनाव में धर्म के आधार पर बिजली आपूर्ति को मुद्दा बना रही है. बिजली मुद्दा है तो क्या उसे बिना हिंदू-मुस्लिम किए वोट नहीं मांगा जा सकता, जबकि 2016 के अंत तक यूपी के गांवों में रहने वाले 1 लाख 77 हजार परिवारों के पास बिजली का कनेक्शन नहीं है. यूपी में अभी कुल 1 करोड़ 60 लाख घरों में बिजली कनेक्शन होना बाकी है. 2012 से 2015 के बीच यूपी में बिजली की आपूर्ति 26 फीसदी बढ़ी है. जिनमें मुस्लिम बाहुल्य इलाके भी हैं तो हिंदू बाहुल्य इलाके भी. प्रधानमंत्री और बीजेपी के दूसरे नेता चाहते तो सिर्फ इतना कहकर भी अपनी बात रख सकते थे कि यूपी में सबको चौबीस घंटे बिजली देंगे. लेकिन बिजली को भी धर्म के खंभे में बांटकर शायद वोटों का ज्यादा करंट दौड़ाना चाहते हैं ?

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