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भारत-चीन के बीच बनी 7 सहमति, PM मोदी-जिनपिंग महामुलाकात से बदल गए रिश्तों के आयाम

भारत और चीन के बीच रिश्ते बेहतर करने की कोशिशों के बावजूद दो बड़े मुद्दे अब भी बने हुए हैं. पहला मुद्दा वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर स्थायी शांति और स्थिरता का है.

दिल्ली का भारत मंडपम इस समय ग्लोबल साउथ की नई ताकत का केंद्र बना हुआ है. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में जहां पहले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात चर्चा में रही, वहीं दूसरे दिन दुनिया की नजरें प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक पर टिक गईं. सात साल बाद भारत आए जिनपिंग की यह यात्रा सिर्फ एक औपचारिक दौरा नहीं, बल्कि भारत-चीन संबंधों की दिशा तय करने वाली महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटना मानी जा रही है.

7 साल बाद भारत आए जिनपिंग

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की यह भारत यात्रा कई मायनों में खास है. प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में यह उनकी चौथी भारत यात्रा है. इससे पहले वे 2014 में अहमदाबाद, 2016 में गोवा और 2019 में महाबलीपुरम आए थे. हालांकि उनकी पिछली दोनों यात्राओं के बाद भारत-चीन संबंधों में तनाव बढ़ा था. 2017 में डोकलाम और 2020 में गलवान संघर्ष ने दोनों देशों के रिश्तों को गंभीर नुकसान पहुंचाया था.

लेकिन इस बार माहौल अलग है. दुनिया की बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों और ग्लोबल साउथ की बढ़ती भूमिका के बीच दोनों देश रिश्तों को स्थिर और व्यावहारिक आधार पर आगे बढ़ाने की कोशिश करते दिखे.

भारत मंडपम में हुई अहम बैठक

भारत मंडपम में हुई द्विपक्षीय बैठक में प्रधानमंत्री मोदी के साथ विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल मौजूद थे. वहीं राष्ट्रपति जिनपिंग के साथ चीन के वरिष्ठ अधिकारी और प्रतिनिधिमंडल शामिल था. बैठक के बाद विदेश मंत्रालय की ओर से जारी जानकारी के अनुसार दोनों देशों के बीच सात प्रमुख बिंदुओं पर सहमति बनी—

संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखा जाएगा.

मतभेदों को विवाद में नहीं बदलने दिया जाएगा.

सीमा विवाद का निष्पक्ष और स्वीकार्य समाधान तलाशा जाएगा.

व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों को आगे बढ़ाया जाएगा.

दोनों देशों के लोगों के बीच आवाजाही को बढ़ावा दिया जाएगा.

आर्थिक और व्यापारिक चिंताओं का समाधान तलाशा जाएगा.

क्षेत्रीय और वैश्विक चुनौतियों पर सहयोग बढ़ाया जाएगा.

प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट कहा कि सीमा पर शांति और स्थिरता ही द्विपक्षीय संबंधों के सामान्य और सकारात्मक विकास की बुनियाद है. उन्होंने मौजूदा समझौतों और सहमतियों के पालन पर भी जोर दिया.

ग्लोबल साउथ की नई तस्वीर

बैठक के दौरान एक दिलचस्प प्रतीकात्मक संदेश भी देखने को मिला. प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति जिनपिंग की मुलाकात के दौरान पृष्ठभूमि में रामेश्वरम स्थित रामनाथस्वामी मंदिर के भव्य गलियारे की तस्वीर थी. इसे भारत की सांस्कृतिक विरासत और ग्लोबल साउथ की उभरती ताकत के प्रतीक के तौर पर देखा गया. ब्रिक्स मंच पर भारत, चीन और रूस का एक साथ दिखना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि वैश्विक शक्ति संतुलन में विकासशील देशों की भूमिका लगातार बढ़ रही है.

आतंकवाद पर चीन का बदला रुख?

इस बार ब्रिक्स घोषणा पत्र में आतंकवाद के मुद्दे पर भी महत्वपूर्ण संदेश देखने को मिला. घोषणा पत्र में पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की गई और आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति का समर्थन किया गया. घोषणा पत्र में- आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने, आतंकी फंडिंग पर कार्रवाई, संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकी संगठनों के खिलाफ कदम उठाने, और आतंकवाद पर दोहरे मानदंडों को खारिज करने की बात कही गई. विशेषज्ञ इसे चीन के रुख में बदलाव का संकेत मान रहे हैं, हालांकि घोषणा पत्र में पाकिस्तान का नाम सीधे तौर पर शामिल नहीं किया गया.

रिश्तों के सामने अब भी दो बड़ी चुनौतियां

भारत और चीन के बीच रिश्ते बेहतर करने की कोशिशों के बावजूद दो बड़े मुद्दे अब भी बने हुए हैं. पहला मुद्दा वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर स्थायी शांति और स्थिरता का है. भारत लगातार यह संदेश देता रहा है कि सीमा पर शांति के बिना संबंध सामान्य नहीं हो सकते. दूसरा बड़ा मुद्दा व्यापार असंतुलन है. भारत लंबे समय से चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे को लेकर चिंतित है. वर्तमान में भारत का चीन से आयात उसके निर्यात की तुलना में कई गुना अधिक है. नई दिल्ली चाहती है कि भारतीय उत्पादों को चीनी बाजार में अधिक अवसर मिलें. इसके अलावा क्वाड में भारत की भागीदारी और पाकिस्तान को लेकर चीन का रवैया भी दोनों देशों के बीच अविश्वास के कारण बने हुए हैं.

क्या नई शुरुआत का संकेत है यह मुलाकात?

सात साल बाद भारत आए शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात ने कम से कम इतना संकेत जरूर दिया है कि दोनों देश टकराव के बजाय संवाद के रास्ते को आगे बढ़ाना चाहते हैं. सीमा विवाद जैसे जटिल मुद्दे अभी भी मौजूद हैं, लेकिन दोनों पक्षों ने यह स्वीकार किया है कि मतभेदों को रिश्तों पर हावी नहीं होने दिया जा सकता. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हुई यह मुलाकात भारत-चीन संबंधों को "भाई-भाई" के पुराने नारों की ओर नहीं, बल्कि व्यावहारिक साझेदारी, आर्थिक सहयोग और नियंत्रित प्रतिस्पर्धा वाले नए दौर की तरफ ले जाने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है. आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि दिल्ली में हुई यह कूटनीतिक गर्मजोशी स्थायी भरोसे में बदलती है या नहीं.

राजेश कुमार पत्रकारिता जगत में पिछले करीब 14 सालों से ज्यादा वक्त से अपना योगदान दे रहे हैं. राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों से लेकर अपराध जगत तक, हर मुद्दे पर वह स्टोरी लिखते आए हैं. इसके साथ ही, किसी खबरों पर किस तरह अलग-अलग आइडियाज के साथ स्टोरी की जाए, इसके लिए वह अपने सहयोगियों का लगातार मार्गदर्शन करते रहे हैं. इनकी अंतर्राष्ट्रीय जगत की खबरों पर खास नज़र रहती है, जबकि भारत की राजनीति में ये गहरी रुचि रखते हैं. इन्हें क्रिकेट खेलना काफी पसंद और खाली वक्त में पसंद की फिल्में भी खूब देखते हैं. पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मास्टर ऑफ ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म किया है. राजनीति, चुनाव, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर राजेश कुमार लगातार लिखते आ रहे हैं.
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