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पीएफआई को चंदे पर मिली हुई है इनकम टैक्स से छूट, सरकारी दस्तावेज़ों से हुआ खुलासा

इसी जांच के दौरान बड़ा खुलासा हुआ कि जिस संगठन पर दंगे के लिए फंड देने के आरोप लग रहे हैं वास्तव में उस संगठन को मिलने वाले चंदे को सरकारी छूट मिली हुई है.

नई दिल्ली: सरकारी दस्तावेजों की जांच के दौरान बड़ा खुलासा हुआ है. खुलासा ये कि पीएफआई नामक जिस संगठन के जरिए देश के विभिन्न हिस्सों में दंगाइयों और हिंसा करने वालों को सहायता दिए जाने की जांच की जा रही है, उसी पीएफआई संगठन को उसके यहां मिलने वाले चंदे को आयकर विभाग की तरफ से मिलने वाले चंदे पर छूट मिली हुई है. संगठन इस छूट का फायदा पिछले 8 सालों से उठा रहा है और उसे विदेशों से भी चंदा मिल रहा है. दूसरी तरफ संगठन पर दंगे के लिए चंदा दिए जाने के आरोप की जांच भी की जा रही है.

पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई. दस्तावेजों के हिसाब से यह संगठन साल 2010 में बना और धीरे धीरे इस संगठन का नाम कट्टरपंथी संगठनों के तौर पर देखा जाने लगा, क्योंकि इस संगठन के खाते में अपराध से जुड़े अनेकों कारनामे दर्ज होने लगे चाहे वो केरल में एक प्रोफेसर के हाथ काटने का मामला हो या फिर बंगलुरू में हुए दंगे या फिर उत्तर प्रदेश के दंगे या फिर दिल्ली के दंगे आलम यह रहा कि दंगे के मामलों में इस संगठन का नाम तेजी से जुड़ने लगा. पीएफआई के लोगों के हाथ केवल आपराधिक घटनाओं तक ही नहीं रहे. यह भी आरोप लगे कि यह संगठन दंगे और हिंसा के लिए फंडिंग कर रहा है और इस आरोप की जांच कई जांच एजेंसियों ने शुरू भी कर दी.

इसी जांच के दौरान बड़ा खुलासा हुआ कि जिस संगठन पर दंगे के लिए फंड देने के आरोप लग रहे हैं वास्तव में उस संगठन को मिलने वाले चंदे को सरकारी छूट मिली हुई है. यानि पीएफआई को यदि आप चंदा दे रहे हैं तो आपको उस रकम पर इंकम टैक्स नहीं देना होगा. सूत्रों के मुताबिक सरकारी एजेंसियों के सामने इस भेद का तब खुलासा हुआ जब पीएफआई को मिलने वाली फंडिंग की जांच की जाने लगी. एजेंसियों को जो दस्तावेज मिला, वह दस्तावेज खुद पीएफआई का ही था, जिसमें वो साफ तौर पर लिख रहा है कि उसे आयकर विभाग की धारा 12ए और 12एए के तहत छूट मिली हुई है, क्योंकि उसने अपना पंजीकरण यह कह कर कराया हुआ है कि यह संगठन गरीब लोगों को मदद देने और शिक्षा का काम करने में लगा हुआ है.

आयकर विभाग मे 12ए से जुड़ा पंजीकरण कराने और छूट लेने का मतलब है कि आप विदेशों से भी चंदा ले सकते हैं. साथ ही आप सरकार से भी चंदा ले सकते हैं और सबसे अहम बात ये कि एक बार इस धारा के तहत पंजीकरण मिल जाए तो यह छूट लगातार जारी रहती है और इसमें कभी भी नवीनीकरण नहीं कराना होता और ना ही सरकार उसका ऑडिट करा सकती है.

पीएफआई के दस्तावेजों के मुताबिक उसे यह छूट साल 2012 से लगातार जारी है यानी यदि कोई शख्स पीएफआई को चंदा दे रहा है तो सरकार उसे टैक्स में छूट दे रही है. दिलचस्प यह भी है कि सरकार लगातार यह भी कह रही है कि पीएफआई की भूमिका की जांच की जा रही है और कई राज्य सरकारें तो खुलेआम उसपर प्रतिबंध लगाने की बात भी कह चुकी हैं और केंद्र सरकार को प्रस्ताव भी भेज चुकी हैं. इनमे झारखंड सरकार ने तो उसके खिलाफ एक बार प्रतिबंध लगा भी दिया था, लेकिन बाद में झारखंड कानूनी लड़ाई हार गया था. बंगलुरू दंगों के बाद वहां की सरकार ने भी पीएफआई का नाम खुलेआम लिया था और पीएफआई की राजनीतिक इकाई एसडीपीआई के नेता मुजामिल पाशा को बंगलुरू दंगों में गिरफ्तार भी किया गया था.

दिल्ली दंगों में तो पीएफआई का नाम और खुलकर सामने आया और उसके पदाधिकारियों की गिरफ्तारी भी हुई. दिलचस्प यह भी है कि ईडी ने अपनी जांच के दौरान पाया कि पीएफआई के खातों में 2 से 10 हजार रुपये नकदी जमा होने के अनेकों मामले हैं, क्योंकि 10 हजार रुपये तक की रकम चंदा देने वाले का कोई रिकॉर्ड नहीं रखना पडता.

ईडी का दावा है कि पीएफआई के खातों में 100 करोड़ रुपये से ज्यादा जमा हुए और उसके हिसाब किताब की अब जांच की जा रही है. सरकारी दस्तावेज में साफ तौर पर दिखाया गया है कि पीएफआई के लोग किस तरह से दंगों मे सहायक रहे हैं. सीडीआर कॉल डिटेल की जांच में साफ तौर पर दिखाया गया है कि उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों का एक बड़ा चेहरा किस तरह से पीएफआई से जुड़ा हुआ था. यानि पर्दे के पीछे से उसे पीएफआई सारी सहायता मुहैया करा रहा था. इस दस्तावेज में जिन लोगों के नाम आए हैं, उनमे से इलियास और परवेज की गिरफ्तारी भी हुई है. सांसद मनोज तिवारी भी पीएफआई पर बैन लगाने की बात कह रहे हैं.

एक तरफ केद्रीय गृह मंत्रालय पीएफआई पर राज्यों से रिपोर्ट मांग रहा है यानि उसे बैन करने की तैयारी हो रही है. दूसरी तरफ उसे मिलने वाले चंदे में आयकर विभाग लगातार छूट दे रहा है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि एक ही मुद्दे पर सरकार के दो विभागों के अलग-अलग रूख कैसे हो सकते हैं.

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