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Mumbai: नवनीत राणा राजद्रोह केस के बाद फिर उठा कानून पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट भी जता चुका है बदलाव की ज़रूरत

IPC की धारा 124A के दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट कई बार चिंता जता चुका है.

मुंबई में सीएम उद्धव ठाकरे के घर के बाहर हनुमान चालीसा का पाठ करने के मामले में गिरफ्तार सांसद नवनीत कौर और उनके पति विधायक रवि राणा के खिलाफ राजद्रोह की धारा भी जोड़ी गई है. IPC की धारा 124A के दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी कई बार चिंता जता चुका है. कोर्ट कह चुका है कि राज्य सरकारें अपने विरोधियों के ऊपर बिना सोचे-समझे इस धारा का इस्तेमाल कर रही हैं. इस पर लगाम लगाने की ज़रूरत है, पिछले साल केंद्र सरकार ने भी संकेत दिए थे कि वह इस बारे में कोई व्यवस्था बनाना चाहती है.

आईपीसी की धारा 124 A का मतलब है सेडिशन यानी कि राजद्रोह. अगर कोई अपने भाषण या लेख या दूसरे तरीकों से सरकार के खिलाफ नफरत फैलाने की कोशिश करता है तो उसे तीन साल तक की कैद हो सकती है. कुछ मामलों में ये सज़ा उम्रकैद तक हो सकती है. यहां ये साफ करना ज़रूरी है कि सरकार का मतलब संवैधानिक तरीकों से बनी सरकार से है, न कि सत्ता में बैठी पार्टी या नेता.

नेहरू ने भी IPC की धारा 124A को हटाने की वकालत की
 
भारत का संविधान बनाए जाते समय संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने अंग्रेजों के ज़माने के इस कानून पर सवाल उठाए थे. इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के खिलाफ माना था. लेकिन उस वक़्त संविधान सभा अभिव्यक्ति के अधिकार को पूरी तरह से खुला छोड़ना सही नहीं माना. संविधान बनाने वालों ने अनुच्छेद 19 (2) के तहत इस अधिकार की सीमाएं तय कर दीं. इसके तहत भारत की संप्रभुता को नुकसान पहुँचाने वाले बयान मौलिक अधिकार का हिस्सा नहीं माने गए. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने बाद में कई बार आईपीसी की धारा 124A को हटाए जाने की वकालत की. 

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले

राजद्रोह पर 1962 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया था. केदारनाथ सिंह बनाम बिहार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने वैसे तो इस धारा को बनाए रखा, उसे असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर देने से मना कर दिया. लेकिन इस धारा की सीमा तय कर दी, कोर्ट ने साफ कर दिया कि सिर्फ सरकार की आलोचना करना राजद्रोह नहीं माना जा सकता है. जिस मामले में कुर्सी भाषण या लेख का मकसद सीधे सीधे सरकार या देश के प्रति हिंसा भड़काना हो, उसे ही इस धारा के तहत अपराध माना जा सकता है. बाद में 1995 में बलवंत सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने खालिस्तान के समर्थन में नारे लगाने वाले लोगों को भी इस आधार पर छोड़ दिया था कि उन्होंने सिर्फ नारे लगाए थे.

दुरुपयोग पर कोर्ट के सवाल

सुप्रीम कोर्ट में इस कानून के खिलाफ मणिपुर के पत्रकार किशोरचन्द्र वांगखेमचा, छत्तीसगढ़ के पत्रकार कन्हैयालाल शुक्ला, सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल एस जी बोम्बतकरे, एडिटर्स गिल्ड सहित 8 याचिकाएं लंबित हैं. पिछले साल 15 जुलाई को चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था कि इस कानून का उपयोग अंग्रेजों ने महात्मा गांधी और बाल गंगाधर तिलक जैसे नेताओं के खिलाफ किया था. आश्चर्य है कि आजादी के लगभग 75 साल बाद भी सरकार इस कानून को बनाए रखने की ज़रूरत समझती है.

'लकड़ी की बजाय पूरा जंगल काटने जैसा कानून'

चीफ जस्टिस ने आगे कहा था, "यह कानून ऐसा है जैसे किसी बढ़ई को लकड़ी का एक टुकड़ा काटने के लिऐ आरी दी गई और वह पूरा जंगल काटने लग गया. सरकार कई पुराने कानूनों को खत्म कर रही है. राजद्रोह कानून पर अब तक उसका ध्यान क्यों नहीं गया?" सुनवाई के दौरान एटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कोर्ट की चिंता से सहमति जताते हुए कहा था, "निश्चित रूप से इस कानून के दुरुपयोग पर रोक लगनी चाहिए. इसे सिर्फ देश की सुरक्षा और लोकतांत्रिक संस्थाओं को सीधे आघात पहुंचाने के मामलों तक सीमित रखने की ज़रूरत है."

सरकार ने दिए कानून में बदलाव के संकेत

केंद्र की तरफ से कोर्ट का नोटिस स्वीकार करते हुए सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने भी संकेत दिए थे कि सरकार इस कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए कदम उठाना चाहती है. मेहता ने कहा, "सरकार की तरफ से जवाब दाखिल होने दीजिए, कोर्ट की बहुत सारी चिंताएं कम हो जाएंगी."

पटना हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस वी एन सिन्हा ने एबीपी न्यूज़ से बात करते हुए यह संभावना जताई है कि केंद्र सरकार राजद्रोह कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए दिशानिर्देश बना सकती है. उन्होंने कहा कि अगर सरकार ऐसा सुझाव कोर्ट में रखती है तो कोर्ट सभी पक्षों के विचार सुनने के बाद इसकी अनुमति देते हुए औपचारिक आदेश दे सकता है.
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