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Muharram 2019: जानिए- 1400 साल बाद मुसलमान क्यों मनाते हैं मुहर्रम में मातम, कर्बला की जंग क्या थी?

आज है मुहर्रम, यानि शहादत का दिन, इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले लोगों का मुहर्रम एक प्रमुख महीना है. इस माह की 10वीं तारीख को मुसलमान, खास तौर पर शिया मुसलमान मातम मनाते हैं और शहीद-ए-कर्बला की याद में आंसू बहाते हैं.

नई दिल्ली: मुहर्रम यानी इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार साल का पहला महीना होता है, और इस महीने की 10वीं तारीख का महत्व इस्लाम में बहुत ही ज्यादा है. मुसलमान, खास तौर पर शिया मुसलमान मुहर्रम की 10वीं तारीख (आशूरा) को न सिर्फ मातम मनाते हैं बल्कि कर्बला के मैदान में 1400 साल पहले नवास-ए-रसूल (पैगंबर मोहम्मद के नाती इमाम हुसैन) की शहादत दिवस पर अपने आंसू बहाते हैं. मातनी जुलूस निकालकर 1400 पहले हुए जुल्म की दास्तान को याद करते हैं. भारत में कल मंगलवार को मुहर्रम की 10वीं तारीख है. इस मातमी मौके पर देश में ताज़िए भी निकाले जाएंगे.

इस महीने को इस्लाम में पवित्र महीने के तौर पर मनाया जाता है. यह महीना न्याय और मानवीयता के लिए संघर्षरत हज़रत मुहम्मद के नवासे हुसैन इब्न अली की कर्बला के युद्ध में उनके बहत्तर स्वजनों और दोस्तों के साथ हुई शहादत को याद करने का एक अवसर है. सब कुछ लुटाकर भी कर्बला में इमाम हुसैन ने सत्य के पक्ष में अदम्य साहस की जो रौशनी फैलाई उस रौशनी से आज तक दुनिया रौशन हो रही है.

इस महीने की पहली तारीख से 10 तारीख तक गम मनाया जाता है. इसके पीछे एक कहानी है जो हम आपको बताने जा रहे हैं.

क्या है इमाम हुसैन की कहानी

दरअसल इस महीने के पहले 10 दिन के दरमियान हज़रत मुहम्मद के नवासे हज़रत इमाम हुसैन की जंग धर्म की रक्षा के लिए हुई थी. यह जंग कर्बला शहर में लड़ी गई जो इराक में स्थित है. कर्बला में 680 ईस्वी (60 हिजरी) में यजीद इस्लाम धर्म का खलीफा बन बैठा. वह अपने वर्चस्व को पूरे अरब में फैलाना चाहता था जिसके लिए उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी पैगंबर मुहम्मद के खानदान के चिराग इमाम हुसैन, जो किसी भी हालत में यजीद के सामने झुकने को तैयार नहीं थे.

यजीद अपने भारी सैन्य बल के दम पर इमाम हुसैन और उनके काफिले पर लगातार जुल्म कर रहा था. उस काफिले में उनके परिवार के लोग और अनुयायियों समेत 72 लोग शामिल थे. पहले इमाम हुसैन अपने परिवार और साथियों के काफिले के साथ मदीना से मक्का आए, लेकिन यज़ीद हथियार डालने को तैयार नहीं हुआ तो वो मक्का से इराक के शहर कुफा के लिए निकले, लेकिन रास्ते में यजीद की फौज ने कर्बला के रेगिस्तान में इमाम हुसैन के काफिले को रोक दिया.

इस तपते रेगिस्तान में पानी का एकमात्रस स्त्रोत फरात नदी थी. इस नदी पर यदीज की फौज़ ने पहरा बिठा दिया. इन सभी परेशानियों के बावजूद इमाम हुसैन नहीं झुके और आखिर में युद्ध का एलान हुआ.

Muharram 2019: जानिए- 1400 साल बाद मुसलमान क्यों मनाते हैं मुहर्रम में मातम, कर्बला की जंग क्या थी?

इतिहास के पन्ने में इमाम हुसैन की धर्म को बचाने और असत्य के खिलाफ लड़ने की गाथा दर्ज है. कैसे तकरीबन 80,000 यजीद सैनिकों के सामने 72 बाहदुरों ने निडरता के साथ युद्ध लड़ा. जंग में वह अल्लाह के नाम पर कुर्बान हो गए. उन्होंने अपने खानदान द्वारा सिखाए हुए सदाचार, उच्च विचार, अध्यात्म और अल्लाह से बेपनाह मुहब्बत में प्यास, दर्द, भूख और पीड़ा सब पर विजय प्राप्त कर ली. 10वीं मुहर्रम के दिन तक हुसैन अपने भाइयों और अपने साथियों के शवों को दफनाते रहे. इसके बाद आखिर में अस्र की नमाज के वक्त जब इमाम हुसैन सजदा में थे, तब एक यजीदी ने हुसैन पर धोखे से हमला कर दिया और हुसैन शहीद हो गए.

मुहर्रम में रोजे का महत्व

मुहर्रम महीने की 9 और 10 तारीख को रोजे रखने की परंपरा है. माना जाता है कि रमजान महीने के बाद मुहर्रम के रोजे सबसे खास माने जाते हैं.

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