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MP Election 2023: 2018 में मध्य प्रदेश की इन एसटी रिटर्व सीटों पर पड़े थे सबसे ज्यादा नोटा वोट, जानिए क्या है वजह

MP Election 2023 Date: पिछले चुनाव में शाहपुर (एसटी आरक्षित), जुन्नारदेव (एसटी आरक्षित) व झाबुआ (एसटी आरक्षित) सीट पर क्रमशः 6543, 6245 और 6188 नोटा वोट पड़े थे. इन आंकड़ों ने सभी को हैरान कर दिया था.

Madhya Pradesh Election 2023: मध्य प्रदेश आगामी विधानसभा चुनाव के लिए तैयार है. 17 नवंबर को यहां मतदान करके लोग नई सरकार चुनेंगे. इस राज्य की गिनती भारत में सबसे अधिक आदिवासी आबादी वाले राज्य के रूप में होती है. यहां विधानसभा की 230 सीटे हैं. इनमें से 47 अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित हैं, जबकि 34 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं.

पर 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में इन सीटों पर नोटा का वोट शेयर तेजी से बढ़ा. 2018 के चुनाव में यहां की 18 सीटों पर 5000 से अधिक नोटा वोट दर्ज किए गए. इन 18 में से 13 एसटी आरक्षित सीटें थे, जबकि एक अनुसूचित जाति (एससी) आरक्षित सीट थी.

कहां पड़े थे कितने नोटा वोट?

पिछले चुनाव में बैतूल जिले के अनारक्षित निर्वाचन क्षेत्र भैंसदेही सबसे अधिक नोटा वोट पड़े थे. यहां करीब 3.6 प्रतिशत नोटा वोट (7948 वोट) डाले गए थे. वहीं, शाहपुर (एसटी आरक्षित), जुन्नारदेव (एसटी आरक्षित), और झाबुआ (एसटी आरक्षित) सीट पर क्रमशः 6543, 6245 और 6188 नोटा वोट पड़े थे.

ये हो सकते हैं कारण

इन सीटों पर नोटा के वोट बढ़ने से कई सवाल खड़े होते हैं. पहला सवाल ये कि क्या नोटा का उपयोग किसी राजनीतिक वर्ग के प्रति या किसी विशेष जाति और समूह के राजनेताओं के प्रति असंतोष व्यक्त करने के उद्देश्य से किया जा रहै है?

- इस पर एक्सपर्ट कहते हैं कि आरक्षित सीट पर नोटा को चुनने वाला आदिवासी नहीं होगा. हो सकता है कि गैर आदिवासी किसी आदिवासी को वोट देने के बजाय नोटा विकल्प पर जोर दे रहे हों.

- कुछ एक्सपर्ट मानते हैं कि नोटा का बढ़ना आरक्षण के खिलाफ ऊंची जाति के विरोध का प्रतीक हो सकता है.

- हालांकि यह भी एक पहलु है कि पिछले कुछ साल से आदिवासी बीजेपी से नाराज हैं. ऐसे में हो सकता है कि कुछ आदिवासी भी नोटा चुनते हों.

- डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, इस तरह का ट्रेंड सिर्फ मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि मध्य भारत के कई अन्य राज्यों में भी देखने को मिला है. रिपोर्ट में किंग्स कॉलेज लंदन की गरिमा गोयल की ओर से किए अध्ययन का भी जिक्र किया गया है, जो इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में प्रकाशित हो चुका है. इस स्टडी में यह देखा गया है कि जाति समूह मुख्य रूप से बेहतर प्रतिनिधित्व की वकालत करने के लिए नोटा का उपयोग कर रहे हैं. शोध में महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले और छत्तीसगढ़ के बस्तर के वास्तविक साक्ष्य भी शामिल हैं, जहां अन्य पिछड़ा वर्ग ने स्पष्ट रूप से अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों को खारिज कर दिया और इसके बजाय अपने समुदाय के लिए बढ़े हुए प्रतिनिधित्व की मांग की.

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