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Nabanna Rally: 1993 का वो मार्च जिसे पुलिस ने दबा दिया, नबन्ना के एक्शन से कितना अलग

Nabanna Rally News: बीजेपी ने नबन्ना रैली को दबाने के लिए पुलिस के बल प्रयोग को लेकर टीएमसी पर हमला बोला है. बीजेपी का कहना है कि ममता तानाशाही कर रही हैं. प्रदर्शनकारियों को दबाया जा रहा है.

Nabanna Abhijan Rally Latest News: पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बीच 'नबन्ना अभिजन' रैली और उसके बाद हुई हिंसा को लेकर जुबानी जंग जारी है. एक तरफ बीजेपी का कहना है कि राज्य सरकार प्रदर्शनकारियों को दबाने के लिए पुलिस का इस्तेमाल कर रही है, तो वहीं टीएमसी ने बीजेपी पर बंगाल में अराजकता फैलाने के लिए बाहरी लोगों को लाने का आरोप लगाया है.

टीएमसी के कुणाल घोष ने कहा, "पुलिस ने स्थिति को संभालने में असाधारण संयम दिखाया. जो लोग पुलिस की मनमानी का दावा कर रहे हैं, उन्हें 1993 के विरोध प्रदर्शनों को नहीं भूलना चाहिए." बता दें कि आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में ट्रेनी डॉक्टर से रेप और हत्या मामले में पीड़िता को न्याय दिलाने की मांग करते हुए छात्र संगठनों ने 27 अगस्त को राज्य सचिवालय नबन्ना तक मार्च करने की मांग की, लेकिन प्रशासन ने इसकी अनुमति नहीं दी. इसके बाद छात्रों ने 27 को जबरन मार्च निकालने की कोशिश की, जिससे झड़प हुई.

 1993 में क्या हुआ था?

1993 में बंगाल विरोध-प्रदर्शन 1991 के बंगाल विधानसभा चुनाव नतीजों और इसमें धांधली के आरोपों की वजह से शुरू हुए थे. उस वक्त सीपीआई-एम के नेतृत्व में वाम मोर्चे ने 294 सीटों में से 245 सीटों पर जीत हासिल की थी. नतीजों के बाद से शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन करीब डेढ़ साल तक चलता रहा. 21 जुलाई, 1993 को ममता बनर्जी, जो उस समय युवा कांग्रेस की अध्यक्ष थीं, ने कोलकाता में प्रतिष्ठित राइटर्स बिल्डिंग, जो उस समय बंगाल सचिवालय था, तक मार्च का नेतृत्व किया था. तब प्रदर्शनकारी मांग कर रहे थे कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए मतदाता पहचान पत्र अनिवार्य किया जाए. हालांकि, राइटर्स बिल्डिंग से करीब एक किलोमीटर दूर पुलिस ने उन्हें रोक लिया. प्रशासन ने धारा 144 जारी करके सचिवालय के आसपास आवाजाही पर प्रतिबंध भी लगा दिया.

प्रदर्शनकारियों के एक समूह का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही थीं, जबकि दूसरे समूह ने सुबह 11 बजे पुलिस की घेराबंदी तोड़ दी. यह तब हुआ जब कलकत्ता पुलिस के एक जूनियर अधिकारी ने कथित तौर पर अपनी फोर्स को प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आदेश दिया. उस दिन पुलिस की गोलीबारी में तेरह प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी. इस घटना में ममता बनर्जी भी घायल हो गई थीं. इस घटना ने ममता बनर्जी को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया. उन्हें राज्य लोगों का का समर्थन और सहानुभूति मिली. लगभग साढ़े तीन साल बाद, उन्होंने अपने कुछ समर्थकों के साथ कांग्रेस छोड़कर अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का गठन किया.

राज्य की प्रतिक्रिया तब बनाम अब

सीएम ज्योति बसु के नेतृत्व वाली सीपीआई-एम सरकार ने 21 जुलाई 1993 को राइटर्स बिल्डिंग विरोध के खिलाफ पुलिस कार्रवाई का समर्थन यह कहते हुए किया कि पुलिस ने राइटर्स बिल्डिंग पर कब्जा करने से रोककर सही काम किया था.

मंगलवार (27 अगस्त, 2004) को टीएमसी ने भी पुलिस कार्रवाई का समर्थन करते हुए कहा कि पुलिस ने पथराव और रॉड से हमले के बावजूद प्रदर्शनकारियों पर गोली न चलाकर बहुत संयम दिखाया. दोनों ही मौकों पर, सत्तारूढ़ दलों ने दावा किया कि पुलिस ने तभी कार्रवाई की जब प्रदर्शनकारियों ने निषेधाज्ञा की सीमा पार कर ली.

तब और अब की स्थिति कैसे अलग है?

हालांकि, पुलिस कार्रवाई में एक बड़ा अंतर यह है कि 1993 में गोलियों का इस्तेमाल किया गया था, जो निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार पैरों पर नहीं बल्कि सीधे धड़ पर चलाई गई थीं, जबकि 'नबन्ना अभिजन' विरोध प्रदर्शन में पुलिस ने बैरिकेड्स लगाए थे. जब प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स तोड़ दिए, तो पुलिस ने लाठीचार्ज किया. जब विरोध प्रदर्शन और भी हिंसक हो गया, तो पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पानी की बौछारें और आंसू गैस के गोले दागे.

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