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महाराष्ट्र की सियासत में कितने प्रासंगिक रह गये हैं राज ठाकरे?

साल 2009 में राज ठाकरे की पार्टी ने जब पहली बार महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव लड़ा तो उसके 13 उम्मीदवार जीतकर विधायक बने. पांच साल बाद साल 2014 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने सिर्फ एक सीट जीती. इस एक विधायक ने भी साल भर पहले राज ठाकरे से नाता तोड़ लिया.

मुंबई: अब तक महाराष्ट्र में चाहे लोकसभा के चुनाव हो रहे हों या फिर विधानसभा के, राज ठाकरे की चर्चा जरूर होती रही है. राज ठाकरे के बयान चुनावी मौसम में खबरों में रहते हैं. वे किससे मिल रहे हैं और क्या कर रहे हैं इसपर चुनावी पंडितों की नजर रहती आई है. लेकिन इस वक्त राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना जिस दौर से गुजर रही है, उसे देखकर ये सवाल उठ रहा है कि क्या अब राज ठाकरे महाराष्ट्र की सियासत में प्रासंगिक रह गये हैं? राज्य की राजनीति में क्या उन्हें गंभीरता से लिया जायेगा?

साल 2009 में राज ठाकरे की पार्टी ने जब पहली बार महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव लड़ा तो उसके 13 उम्मीदवार जीतकर विधायक बने. उससे साल भर पहले राज ठाकरे ने परप्रांतीय विरोध का मुद्दा बड़े ही आक्रमक ढंग से उठाया था. माना जाता है कि शिवसेना के पारंपरिक वोटरों और मराठी युवाओं को एक नया विकल्प मिल गया था, जिसकी वजह से चुनावी मैदान में राज ठाकरे का खाता खुल गया. राज ठाकरे की एमएनएस शिवसेना के लिये एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी. शिवसेना को अपने गढ़ दादर में एमएनएस के सामने हारना पड़ा. कई सीटों पर एमएनएस के उम्मीदवारों ने शिवसेना के वोट काटे जिससे शिवसेना के उम्मीदवार हार गये. इसके बाद राज ठाकरे को बडी कामयाबी नासिक महानगरपालिका चुनाव में मिली जहां उनका मेयर चुना गया.

राज ठाकरे की शुरूआती कामयाबी ने महाराष्ट्र की सियासत में उनका कद बढ़ा दिया लेकिन आगे जाते हुए कामियाबी ने उनका साथ नहीं दिया. 2014 के लोकसभा चुनाव में राज ठाकरे ने बीजेपी के उम्मीदवारों के खिलाफ अपने उम्मीदवार नहीं उतारे और नरेंद्र मोदी का समर्थन किया. हालांकि बीजेपी और शिवसेना में गठबंधन था लेकिन शिवसेना के प्रति अपनी सियासी खुन्नस के चलते उन्होने शिवसेना उम्मीदवारों के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतारे.

2014 में ही अक्टूबर में जो विधानसभा चुनाव हुए उसमें राज ठाकरे की पार्टी को बेहद करारा झटका लगा. उसका सिर्फ एक उम्मीदवार ही चुना जा सका. इस एकमात्र विधायक ने भी साल भर पहले पार्टी छोड़ दिया. इस तरह से एमएनएस महाराष्ट्र की जीरो विधायक वाली पार्टी बन गई.

नासिक महानगरपालिका के पिछले चुनाव में भी राज ठाकरे को हार झेलनी पड़ी और नासिक का मेयर पद उनसे छिन गया. 2017 के मुंबई महानगपालिका चुनाव में एमएनएस के सात पार्षद चुने गये लेकिन उनमें से छह पार्षद छोड़ कर चले गये. एमएनएस की दुर्गति यहीं खत्म नहीं हुई. शिशिर शिंदे जैसे आक्रमक नेता जो साल 2006 में शिवसेना छोड़कर उनके साथ एमएनएस में आये थे, वे भी वापस शिवसेना में चले गये.

बीते लोकसभा चुनाव में राज ठाकरे ने कांग्रेस-एनसीपी के साथ गठबंधन तो नहीं किया लेकिन परोक्ष रूप से उनके लिये प्रचार जरूर किया. ठाकरे ने राज्यभर में घूम-घूम कर बीजेपी के खिलाफ रैलियां कीं और इन रैलियों में पीएम नरेंद्र मोदी के वीडियो दिखाकर समझाने की कोशिश की कि वे किस तरह अपने वादों से मुकर गये हैं. राज ठाकरे को सुनने के लिये इन रैलियों में बड़ी भीड़ जुटती थी. अखबारों और टीवी चैनलों में उनकी चर्चा भी खूब हुई लेकिन जो नतीजे आये उनसे साफ हो गया कि ठाकरे भीड़ को कांग्रेस-एनसीपी के वोटों में नहीं तब्दील कर पाये.

अब राज ठाकरे ईवीएम विरोध के नाम पर तमाम गैर बीजेपी पार्टियों से मिल रहे हैं. ये देखना होगा कि कांग्रेस-एनसीपी के लिये लोकसभा चुनाव के वक्त राज ठाकरे ने जो किया उसके बदले विधानसभा चुनाव में दोनो पार्टियां उसे क्या देतीं हैं. जिन पार्टियों से राज ठाकरे मेहनताने की उम्मीद लगा रहे होंगें खुद उनकी हालत पतली है. कांग्रेस और एनसीपी से लगातार बड़े छोटे नेताओं का बीजेपी में जाना जारी है. ऐसे में ये भी खबर आ रही है कि ईवीएम का मसला उठाकर राज ठाकरे चुनाव का बहिष्कार करने की सोच रहे हैं.

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