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दवा-डिप्लोमैसी को कारगर कार्ड बनाने में जुटा भारत

कोविड-19 के खिलाफ टीका तैयार करने में यूं तो दुनिया के कई देश जुटे हैं. इसमें अमेरिका, ब्रिटेन, रूस जैसे महारथी भी शामिल हैं.

नई दिल्ली: कोरोना महामारी से जूझती दुनिया में बेसब्री से हो रहे वैक्सीन इंतज़ार के बीच भारत ने एक अनूठी पहल की. दुनिया का दवाखाना कहलाने वाले भारत ने अपनी वैक्सीन निर्माण और उत्पादन क्षमताओं की एक बानगी विश्व के आगे रखने का सिलसिला बुधवार को शुरू किया. दवा-डिप्लोमेसी की कड़ी में दुनिया के 64 देशों के राजनयिकों को हैदराबाद ले जाकर भारतीय काबिलियत का नमूना दिखाया गया.

कोविड-19 के खिलाफ टीका तैयार करने में यूं तो दुनिया के कई देश जुटे हैं. इसमें अमेरिका, ब्रिटेन, रूस जैसे महारथी भी शामिल हैं. लेकिन यह अपने आप में एक खास पहल थी क्योंकि इससे पहले किसी भी मुल्क ने अपनी वैक्सीन निर्माण क्षमताएं दिखाने के लिए इस तरह विदेशी राजनयिकों के लिए अपने वैक्सीन हब के दरवाजे नहीं ख़ोले हैं.

हालांकि भारत की यह कवायद एक सोची-समझी कूटनीतिक रणनीति और आपदा को अवसर बनाने की कोशिशों का भी हिस्सा है. आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक इस तरह के राजनयिक दौरों के सहारे भारत की कोशिश देश में तैयार कोविड-रोधी टीकों के लिए नए विदेशी बाजार तलाशने की है. इस तरह की यात्राओं और दौरों से लौटने के बाद राजनयिक मिशन अपने मुख्यालयों को रिपोर्ट भेजेंगे तो उसमें इस बात का भी उल्लेख होगा कि किस तरह भारत में कोविड के खिलाफ वैक्सीन तैयार करने और उसके व्यापक उत्पादन की व्यवस्था मौजूद है.

यह बात सभी जानते हैं कि पूरी दुनिया में जहां कोविड-19 के खिलाफ टीके की ज़रूरत है वहीं किसी भी एक वैक्सीन से इसको पूरा करना मुमकिन नहीं है. ऐसे में न केवल बहुत से वैक्सीन विकल्पों की ज़रूरत होगी बल्कि बड़े पैमाने पर उनकी ज़रूरत होगी. यह स्थिति भारत-बायोटेक जैसी देसी कंपनियों के लिए एक मौका है, जिसने कोवैक्सीन नामक अपना कोविड-रोधी टीका विकसित किया है.

सूत्र बताते हैं कि भारत अफ्रीका, दक्षिण पूर्व एशिया और मध्य-एशिया का कई मुल्कों में देशी टीकों के लिए बाजार तलाश रहा है. इसी कड़ी में हैदराबाद ले जाए गए विदेशी राजनयिकों के दल में अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया, लैटिन अमेरिका, मध्य-एशिया समेत अनेक इलाकों से छोटे-बड़े कई देशों को आमंत्रित किया गया था.

विदेशी राजनयिकों के इस दौरे के सहारे भारत की कोशिश उन मुल्कों के साथ साझेदारी बनाने की भी है जो अपने वैक्सीन तैयार कर रहे हैं. गौरतलब है कि ओक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राजेन्का वैक्सीन के सह-उत्पादन के लिए पुणे स्थित सीरम इंस्टिट्यूट जैसी कंपनियां साझेदार बन चुकी हैं. वहीं रूस ने भी अपने स्पुतनिक वैक्सीन के लिए रेड्डीज़ लैब कम्पनी के साथ हाथ मिलाया है.

बीते दिनों ब्रिक्स देशों के शिखर सम्मेलन में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी कहा था कि भारत और चीन मिलकर ही पूरी दुनिया की ज़रूरत का वैक्सीन उत्पादित कर सकते हैं. प्रधानमंत्री मोदी भी लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि भारत की वैक्सीन निर्माण क्षमताएं पूरी मानवता की मदद करने के लिए तैयार है.

टीकों के निर्माण को लेकर दुनिया का भरोसे और भारत के आत्मविश्वास को समझने के लिए पहले कुछ आंकड़ों पर नज़र डालना ज़रूरी होगा. दुनिया में बनने वाली 60 फीसद वैक्सीन का उत्पादन भारत में होता है. यानी दुनिया भर में विभिन्न बीमारियों के खिलाफ इस्तेमाल हो रहे तीन में से एक टीके पर मेड इन इंडिया की मुहर लगी है. जाहिर है यह किसी भी भारतीय को फख्र का सबब देने के लिए काफी है.

इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी वैश्विक संस्था अपनी ज़रूरत का 60-80 प्रतिशत वैक्सीन भारत से खरीदती है. भारत की वैक्सीन निर्माण क्षमताओं पर भरोसे का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसके उत्पादों को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने प्री-अप्रूव्ड का तमगा दे रखा है.

भारत की वैक्सीन निर्माण क्षमताओं का बड़ा केंद्र है हैदराबाद, जिसे देश की वैक्सीन राजधानी भी कहा जाता है. हैदराबाद में बड़ी संख्या में भारत-बायोटेक और बायोलॉजिकल-ई समेत अनेक कम्पनियां हैं, जिनके पास पहले से USFDA मंजूरी है. जिसका सीधा अर्थ है कि उनके उत्पाद अमेरिका में भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं. स्वाभाविक तौर पर USFDA मंजूरी वाले किसी भी उत्पाद को गुणवत्ता का मानक माना जाता है और कई देश केवल इसको आधार बनाकर अपने यहां दवाओं और टीकों को इजाजत दे देते हैं.

हैदराबाद गए विदेशी राजनयिकों के दल ने भारत बायोटेक में जहां कोवैक्सीन पर जानकारी और निर्माण क्षमता देखी. वहीं, बायोलॉजिकल-ई जैसी कंपनी ने बड़े पैमाने पर वैक्सीन उत्पादन की अपनी काबिलियत पर प्रेजेंटेशन दिए. बायोलॉजिकल-ई कंपनी के एक प्रतिनिधि के मुताबिक मेहमान राजनयिकों के सामने दिए गए विस्तृत प्रेजेंटेशन के सहारे यह बताया गया कि टीकों के उत्पादन में बेहतर यही होता है कि विशेषज्ञ फैसिलिटीज का इस्तेमाल किया जाए. क्योंकि क़ई छोटे देशों के लिए उत्पादन के लिए ज़रूरी क्षमता बनाने में लगने वाली लागत का बोझ उठाना मुमकिन नहीं होता है. साथ ही इसके मानकों को पूरा करना भी हर जगह सम्भव नहीं. ऐसे में अधिकतर देश व्यापक उत्पादन क्षमता वाली जगहों से अपनी जरूरत के टीकों की सोर्सिंग करते हैं.

ज़ाहिर है विशेषज्ञ उत्पादन क्षमता से जुड़ी ज़रूरतें भी भारत की उम्मीदों को बढ़ाती हैं. ध्यान रहे कि कोविड19 महामारी के दौरान ही भारत ने हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन जैसी दवा की अमेरिका समेत दुनिया के 150 देशों को आपूर्ति की थी. इसके अलावा दुनिया के कई देशों में भारत की जेनेरिक दवाएं इस्तेमाल की जाती हैं.

ऐसे में दवा-डिप्लोमैसी के सहारे भारत की स्वाभाविक उम्मीद अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी आवाज़ का वजन बढ़ाने की होगी. यही वजह भी है कि भारत अब खुलकर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की कमियों और क्षमताओं पर सवाल उठाते हुए उनके सुधार की मुखर मांग कर रहा है. बीते कुछ महीनों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने G20 से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ और SCO की बैठकों में ऐसे सुधारों की बात उठाई जो दुनिया की मौजूदा वास्तविकता की तस्वीर दिखा सके.

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