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जानिए, बाज़ार में लाने से पहले कैसे मारुति सुजुकी ने दी 40 गाड़ियों की आहुति

नई दिल्ली: कर्मकांड में पशुओं की आहुति की बात तो आपने सुनी ही है. आज हम आपको गाड़ियों की आहुति का किस्सा सुनाते हैं. गाड़ियों, चार पहियों वाली गाड़ियों की आहुति. सुनने में अजीब लगा ना. फिर भी सच यही है कि देश की सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति सुजुकी किसी मॉडल को बाजार में उतारने के पहले 40 गाड़ियों की बलि देती है, ताकि सफर के दौरान अगर कोई दुर्घटना हो भी जाए तो आप सलामत रह सके, आपका नुकसान कम से कम हो. इस पूरे वाकये को समझने के लिए आइए आपको लिए चलते हैं दिल्ली के पड़ोस में छोटे से शहर रोहतक में जहां मारुति ने विकसित किया है कि अपना रिसर्च एंड डेवलपमेंट यानी आर एंड डी सेंटर. पहली बार इस सेंटर के दरवाजे मीडिया के लिए खोले गए. करीब 600 एकड़ में फैले इस सेंटर में नई गाड़ियां डिजाइन की जाती हैं, विकसित की जाती है और फिर तमाम तरह की पड़ताल के बाद आपके लिए बाजार में लायी जाती है. 3800 करोड़ रुपये की निवेश योजना के साथ तैयार इस सेंटर का मूल मंत्र ‘मेक इन इंडिया’ के नारे को मजबूत करते हुए ‘क्रिएट इन इंडिया’ है. यकीन नहीं होता तो मारुति के एसयूवी यानी स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल विटारा ब्रेजा को ले लीजिए. 2016 में लांच की गयी गाड़ी, पूरी तरह से यहीं विकसित की गयी. वैसे 2003 में जेन की शक्लो सूरत में तब्दीली की गयी, जबकि 2005 में सुजुकी के वैश्विक आर एंड डी के साथ मिलकर स्विफ्ट तैयार किया गया. 2012 में ऑल्टो का नया स्वरूप यहीं तैयार हुआ था. जानिए, बाज़ार में लाने से पहले कैसे मारुति सुजुकी ने दी 40 गाड़ियों की आहुति रोहतक स्थित सेंटर में एक और जहां 31 किलोमीटर लंबा ट्रैक है. जहां अलग-अलग तरह की सड़कें बनायी गयी है और वहां 31 तरह के टेस्ट होते हैं, वहीं दूसरी ओर क्रैश लैब हैं जहां अलग-अलग तरीके से गाड़ियों की पड़ताल कर उन्हे सुरक्षा के लिहाज से और बेहतर बनाया जाता है. शुरुआती खाका खींचे जाने से लेकर पूरी तरह से विकसित होने में एक गाड़ी को तीन से चार साल तक का वक्त लगता है और इस दौरान उसे 35 से 40 तरह की कड़ी परीक्षा से गुजरना पड़ता है. क्रैश लैब में गाड़ियों की चार तरह से पड़ताल की जाती है-
  • जब बिल्कुल सामने से टक्कर लगे यानी Full Frontal Impact,
  • आमने-सामने की टक्कर बचाने की कोशिश में आगे के किसी एक हिस्से की टक्कर हो यानी Offset Frontal Impact,
  • बगल से टक्कर हो यानी Lateral/Side Impact, या फिर
  • राहगीर की सुरक्षा यानी Pedestrian Protection
लैब में हमने दो तरह की टक्कर का परीक्षण देखा. राहगीर की सुरक्षा और गाड़ी के सामने के हिस्से की किसी दूसरे वाहन या दीवार या फिर ऐसी ही किसी और साधन से टक्कर. राहगीर से टक्कर के लिए एक मशीनी पांव गाड़ी से टकराया और ये फिर ये जानने की कोशिश की गयी कि किस हिस्से पर ज्यादा असर पड़ता है. परीक्षण के नतीजों के आधार पर गाड़ी के आगे का हिस्सा कुछ इस तरह से विकसित किया जाता है जिससे राहगीर को नुकसान ज्यादा घातक साबित नहीं हो सके. कंपनी कहती है कि दुर्घटना नहीं होगी, ये कहना सही नहीं, लेकिन दुर्घटना घातक साबित नहीं हो, इसका इंतजाम करना ज्यादा जरुरी है. इस पूरे परीक्षण के दौरान हाई स्पीड कैमरे के इस्तेमाल किया गया गया जो बेहतरीन रोशनी में हजारों फ्रेम निकालकर देती है जिससे एक-एक फ्रेम पर नजर जमाया जाए और उस आधार पर आगे की रणनीति तैयार की जाए. जानिए, बाज़ार में लाने से पहले कैसे मारुति सुजुकी ने दी 40 गाड़ियों की आहुति दूसरा परीक्षण ज्यादा हैरान करने वाला था. बिल्कुल नयी गाड़ी इग्निस लायी गयी. वही इग्सिन जिसे अभी-अभी बाजार में उतारा गया है और जिसकी कीमत 4.59 लाख रुपये से 7.80 लाख रुपये (एक्स शो रुम-दिल्ली) के बीच पड़ती है. गाड़ी में इंसानी चमड़े और हड्डियों की नकल के साथ दो डमी रखे गए. 88 किलो वजन था, एक डम्मी का. हर डम्मी का तापमान 22 डिग्री के करीब था जो आम तौर पर सामान्य परिस्थितियों में इंसानी शरीर का होता है. डम्मी के अलग-अलग हिस्से पर 40 सेंसर लगाए गए थे जिनसे बाद में डाटा लिया जाना था. आगे बढ़ने के पहले आपको डमी के बारे में आपको बता दे. शुरु-शुरु में वॉलिएंटर के साथ बहुत ही सीमित तरीके से परीक्षण होता था. कुछ समय सूअर के जरिए भी क्रैश टेस्ट किया गया. दलील थी कि सूअर के रेशे, इंसानी रेसे से मेल खाते हैं. 1971 में पहली बार जीएम ने डमी का इस्तेमाल करना शुरु किया जिसके बाद से लगातार डमी में सुधार होता रहा. अब तो थर्ड जेनरेशन डमी आ चुका है. रोहततक सेंटर में डमी का पूरा परिवार मिला, मां-बाप और बच्चे. हर क्रैश टेस्ट के बाद डमी के यदि कोई अंग में खराबी आ जाती है तो उसे बदल भी दिया जाता है. जानिए, बाज़ार में लाने से पहले कैसे मारुति सुजुकी ने दी 40 गाड़ियों की आहुति अब वापस लौटते है परीक्षण पर. गाड़ी से इंधन समेत दूसरे तरल पदार्थ निकाल दिए गए थे, उनकी जगह अलग-अलग रंग के पानी भर दिए गए. ये इसीलिए किया गया, ताकि टक्कर के बाद गाड़ी में आग नहीं लग सके. इसके बाद गाड़ी 56 किलोमीटर प्रति घंटे से कुछ ज्यादा की रफ्तार के साथ 129 मीटर की दूरी तय करते हुए आयी. सामने के दाहिने हिस्से पर जोरदार टक्कर हुई. आगे का एक हिस्सा बिल्कुल पिचक गया. गाड़ी थोड़ी उछली. फिर सीधी आ रही गाड़ी टेढ़ी हो गयी. कुलैंट से थोड़ा तरल निकला. आगे का बंपर निकल आया. इंजन को नुकसान हुआ. टायर सुरक्षित था, आगे का शीशा सुरक्षित था. आगे बैठे दो डमी सीट बेल्ट से बंधे थे. वो आगे झुके. लेकिन डैश बोर्ड पर लगे एयरबैग के खुलने की वजह से सीधे सिर नहीं टकराया. गाड़ी के चारों दरवाजे बिना किसी परेशानी के खुल गए. गाड़ी के अंदर कोई नुकसान नहीं हुआ था. अरे हां एक बात बता दूं. अब ये गाड़ी मरम्मत के लिए वर्कशॉप नहीं जाएगी, बल्कि कबाड़ में जाएगी. और ये सिर्फ एक बार नहीं होता. हर गाड़ी के परीक्षण में 35-40 गाड़ियां कबाड़ में चली जाती है. यही है गाड़ियों की आहूति. ये आहूति इसीलिए दी गयी, ताकि आपके पास जो गाड़ी पहुंचे, वो सुरक्षित हो और यदि दुर्घटना हो तो गाड़ी के अंदर बैठे हुए लोगों के लिए कम से कम घातक साबित हो. कोशिश ये भी है कि दुर्घटना की मार ज्यादा से ज्यादा गाड़ी उठाए, गाड़ी के अंदर बैठे लोग नहीं. लेकिन ये तभी संभव होगा, जब आप भी कुछ करें. जानिए, बाज़ार में लाने से पहले कैसे मारुति सुजुकी ने दी 40 गाड़ियों की आहुति अब ये जान लीजिए कि अगर छोटी गाड़ी में ड्राइवर समेत यदि सभी पांच यात्रियों ने सीट बेल्ट बांध रखी है तो घातक असर 50 फीसदी तक कम हो जाता है. एयरबैग से घातक असर 10 फीसदी और भी कम हो जाता है. एक और बात केवल एय़रबैग आपके लिए दुर्घटना का असर कम नहीं कर सकता. एक और बात राहगीर को चोट कम लगे, इसका इंतजाम गाड़ी के मॉडल में सुधार कर एर हद तक ही किया जा सकता है. अगर राहगीर उछलने के बाद सड़क पर सिर के बल गिरे, डिवाइडर से सिर टकरा जाए या फिर सड़क किनारे के पत्थर से चोट खा जाए तो फिर कहानी कुछ अलग ही होगी, यहां पर रोहतक का सेंटर कुछ नहीं कर सकता. जानिए, बाज़ार में लाने से पहले कैसे मारुति सुजुकी ने दी 40 गाड़ियों की आहुति अंत में आपको बता दे कि इग्निस के सभी वैरिएंट इन तमाम परीक्षणों से गुजरने के बाद बाजार में लाए गए. पिछले कुछ महीनों के दौरान दूसरे मॉडल एस क्रॉस, सियाज, बलेनो और आर्टिगा की भी जांच हुई. सरकार का नया नियम कहता है कि सभी नए मॉडल को पहली अक्टूबर 2017 से और मौजूदा मॉडल को 1 अक्टूबर 2019 से तीन पैमानों, Full Frontal Impact,  Offset Frontal Impact, और Lateral/Side Impact के आधार पर पड़ताल कराना जरुरी होगा जबकि Pedestrian Protection का पैमाना नये मॉडल के लिए 1 अक्टूबर 2018 और मौजूदा मॉडल के लिए 1 अक्टूबर 2020 से लागू होगा.. मारुति का दावा है कि उसके तमाम मॉडल साल भर पहले ही ये समय सीमा हासिल कर लेंगे.

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