Explained: 2002-04 में कैसे हुआ था पिछला SIR? इस बार क्या अलग और क्या कमियां
पहले यदि कोई परिवार किसी स्थान से स्थानांतरित हो गया था, तो उनके नए पते पर सत्यापन किया जाता था और उसी प्रक्रिया के दौरान उनके नाम नए पते पर दर्ज कर लिए जाते थे, बिना पुराने नाम को सीधे हटाए.

भारत में मतदाता सूची को अपडेट करने और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा विशेष सघन पुनरीक्षण ( SIR) प्रक्रिया चलाई जाती है. हाल ही में, वर्तमान में चल रही SIR प्रक्रिया और वर्ष 2002-04 के दौरान आयोजित SIR के बीच तुलना को लेकर कई कानूनी और प्रशासनिक सवाल खड़े किए गए हैं.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीशों ने 2025-26 की इस प्रक्रिया के तौर-तरीकों पर चिंता जताई है. विशेषज्ञों का तर्क है कि 2002-04 की तुलना में वर्तमान प्रक्रिया में कई ऐसी कमियां हैं, जिनसे लाखों योग्य नागरिक गलती से मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं.
SIR क्या है और यह क्यों आयोजित किया जाता है?
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) भारत निर्वाचन आयोग को यह अधिकार देती है कि वह किसी भी समय, किसी भी निर्वाचन क्षेत्र या उसके हिस्से में विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) का आदेश दे सकता है. इसी अधिकार के तहत निर्वाचन आयोग ने जून 2025 से पूरे देश में तीन चरणों में SIR कराने का फैसला लिया था. जिसमें पहला चरण बिहार, दूसरा चरण असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी और तीसरा चरण मई 2026 में संपन्न हुआ, जिसमें 12 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश शामिल थे.
मई 2026 में, सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि निर्वाचन आयोग का SIR आयोजित करने का संवैधानिक जनादेश वैध है.
2002-04 में कैसे हुआ था पिछला SIR?
वर्ष 2002 और 2004 के बीच आयोजित पिछला SIR वर्तमान प्रक्रिया से कई मायनों में अलग और अधिक पारदर्शी था. 2002 में प्रगणकों (वे अधिकारी या कर्मचारी होते हैं, जो घर-घर जाकर सही और पूरी जानकारी जुटाते हैं) द्वारा घर-घर जाकर नया डेटा एकत्र करने के बाद प्राथमिक सूची प्रकाशित की गई. इसके बाद ही दावे और आपत्तियां आमंत्रित की जाती थीं.
प्रगणकों द्वारा एकत्र किए गए डेटा का 25% हिस्सा पर्यवेक्षकों द्वारा सत्यापित किया जाता था. यदि किसी विशेष घर पर ताला लगा मिलता था, तो पर्यवेक्षक को खुद उस स्थान पर जाकर दोबारा सत्यापन करना पड़ता था.
पहली बार नाम जुड़वाने वालों से नागरिकता का प्रमाण स्पष्ट दिशा-निर्देशों के तहत मांगा जाता था. यदि कोई परिवार किसी स्थान से स्थानांतरित हो गया था, तो उनके नए पते पर सत्यापन किया जाता था और उसी प्रक्रिया के दौरान उनके नाम नए पते पर दर्ज कर लिए जाते थे, बिना पुराने नाम को सीधे हटाए.
2025-26 की वर्तमान SIR प्रक्रिया की मुख्य कमियां
विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों ने वर्तमान SIR प्रक्रिया में निम्नलिखित प्रमुख समस्याओं को उजागर किया है.
पहला ये कि लाखों वोटर्स ने अपनी वोटिंग का अधिकार खो दिया. वर्तमान अभ्यास के कारण तीनों चरणों में लगभग 1.25 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए या 'ASDD' (अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत, डुप्लिकेट) श्रेणी के तहत चिन्हित किए गए हैं.
जो लोग घर पर नहीं मिले या स्थानांतरित हो गए, उन्हें सूची से हटा दिया गया और उनसे नए फॉर्म जमा करने को कहा गया. यह आयोग के अपने 'मैनुअल ऑन इलेक्टोरल रोल्स' के खिलाफ है, जिसमें कहा गया है कि जब तक नए पते का सत्यापन न हो, पुराना नाम नहीं काटा जाना चाहिए.
कमजोर पर्यवेक्षण
2002 में 25% पर्यवेक्षण की तुलना में, इस बार केवल 10% रैंडम सत्यापन बीएलओ (BLO) द्वारा किया गया, जिससे प्रक्रिया की गुणवत्ता प्रभावित हुई. नागरिकों पर खुद अपनी नागरिकता या सामान्य निवास स्थान का प्रमाण प्रस्तुत करने की कठोर शर्त रखी गई.
अतार्किक विसंगतियां: 15 से 45 वर्ष की आयु वर्ग के ऐसे मतदाताओं के नाम भी हटाए गए जहां एक घर में एक ही माता-पिता दर्शाए गए थे. बिना उचित कारण और सत्यापन के थोक में फॉर्म-7 (नाम कटवाने का आवेदन) जमा करने की शिकायतें आईं, जिससे वैध मतदाताओं के नाम अनधिकृत तरीके से कट गए.
आगे का रास्ता क्या हो सकता है?
1-पुनः शामिल करने की प्रक्रिया को आसान बनाना: वर्तमान SIR में नाम कटने के बाद पुन: पंजीकरण की प्रक्रिया बहुत जटिल है. इसे आसान बनाया जाना चाहिए ताकि कोई भी वास्तविक नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न रहे.
2-घर-घर जाकर सत्यापन: जिन मतदाताओं के नाम 'स्थानांतरित' या 'अनुपस्थित' श्रेणी में डाले गए हैं, उनका घर-घर जाकर पुन: भौतिक सत्यापन होना चाहिए.
3-दावों का पारदर्शी निस्तारण: दावे और आपत्तियों के निस्तारण की अवधि (30 अक्टूबर तक) के दौरान पारदर्शी सार्वजनिक सुनवाई आयोजित की जानी चाहिए.





















